उदासी का कोना

यह कहानी आउटलुक में छपी थी, पिछले साल, मई 2015 में….यहाँ लेट लतीफी में एक साल से भी ज््यादा अरसे  के बाद….

 

उदासी का कोना।

 

उमेश शोक-सभा में आ तो  गया था, लेकिन बेमन से। उसे कवि का ना कवित्व पसंद था, ना व्यक्तित्व; ना परिवार पसंद था, ना परिधान। उमेश भी साहित्य की दुनिया का नागरिक था; लेकिन स्वर्गीय कवि और उमेश के नागरिकता-कार्डों के रंग जुदा-जुदा थे।

कवि को उमेश ने साहित्य से परिचय के शुरुआती दिनों में पढ़ा था। वे दिन प्रेम से परिचय के भी शुरुआती दिन थे। वे दिन बचपन और किशोरावस्था के मध्यांतर के दिन थे। ऐसे दिनों में पढ़े गये कवियों के साथ पाठकीय संबंध सूख जाने के बाद भी, कुछ नमी तो छोड़ ही जाता है।  लेकिन, यहाँ आने के पीछे वह नमी नहीं, सामाजिक मजबूरी थी। बाबूजी कहते थे ना, ‘किसी के अच्छे-बुरे में नहीं जाओगे तो तुम्हारे यहाँ कौन आएगा? समाज ऐसे घरघुसरेपन से नहीं चलता…’

सच्ची बात। घरघुसरे बने रहे तो तुम्हारे संग्रह के लोकार्पण और तुम्हारे जीवन के शोकार्पण में कौन आएगा?

शोक-सभा वैसी ही थी, जैसी होती है। क्षति भाषण देने वालों के लिए भी अपूरणीय थी, लेने वालों के लिए भी। हालाँकि उपस्थितों की संख्या से लग रहा था कि कुछ ही दिन बाद खुद साहित्य की शोक-सभा होने वाली है। कवि का कवित्व और व्यक्तित्व वैसे ही अद्वितीय था, जैसे पिछले दिनों स्वर्गीय हुए लेखक का था; जैसे अगले दिनों स्वर्गीय होने वाले आलोचक का होने वाला था। जैसे कुछ बरस बाद खुद उमेश का होने वाला था।

‘बशर्ते कोई अकादमी या लेखक संघ या हिन्दी विभाग अपन को शोक-सभा लायक माने…’

उमेश शोक-मग्न मुद्रा अपनाने के बहाने, कलाई माथे के पास लाकर दो-तीन बार घड़ी देख चुका था। यह अनुभवसिद्ध निष्कर्ष था कि एक घंटा शोक-मग्न रहने के बाद सभा से पलायन कर जाएँ तो आपकी लोक-प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। इससे कम समय में चल देना लोकाचार का उल्लंघन है।

भाषणों से ऊबी  घड़ी की सुइयाँ भी सुस्त ढंग से घिसट रहीं थीं। उस वक्त तो एक-एक पल एक-एक युग जैसा लगने लगा जब एक भाषणकर्ता ने कवि की निहायत छद्म-आध्यात्मिक कविताएँ ताबड़तोड़ उद्धृत करना शुरु कर दिया। भाषणकर्ता उन कविताओं में मनुष्य की आध्यात्मिक प्यास बुझाने वाली रस-धार देख रहा था; उमेश की चेतना ऊब के रेगिस्तान में भटक रही थी…

एकाएक रेत की खुरदुरी जलन के बीच स्मृतियों का सोता फूट पड़ा। स्टैंडिंग-लैंप की हल्की पीली रोशनी के नीचे, उमेश की जिज्ञासु आँखों के सामने बैठी वह इन्हीं कविताओं को पढ़ रही थी। उमेश को छद्म-अध्यात्म नहीं, अपनी बेचैनियाँ सुनाई पड़ रही थीं। लैंप की पीली रोशनी के नीचे बिताईं कृतज्ञता की शामें शोक-सभा से ऊबी  शाम को हौले से परे करतीं, उमेश की स्मृति में बहने लगीं। अभी तक बनावटी लग रही काव्य-पंक्तियों में जीवन के सच्चे अनुभव और पंक्तियों के बीच की खाली जगह में स्मृति की व्याप्तियाँ गूंजने लगीं।

उसी ने पढ़वाया था इस तथा अन्य कई कवियों को। उस प्रेम में जितनी दमित कामनाएं थीं, उतनी ही जिज्ञासा भी। उमेश के साथ उसके संबंध में जितनी चाहत वर्जित फल चखने की थी, उतनी ही साहित्य, कला, संगीत में साझेदारी करने की। उमेश के बचपन और किशोरावस्था के मध्यांतर के वे दिन ऐसे थे जिनमें उमेश नदी का द्वीप था, और वह उसे आकार देने वाली स्रोतस्विनी।

नदी द्वीपों को आकार देती आगे बढ़ जाती है, द्वीप पीछे छूट जाता है।

‘नदी नहीं, आगे बढ़ता है नदी का पानी। जो पानी पीछे से आ रहा है, वह भी तो नदी ही है ना? नदी कहाँ बढ़ी आगे? वह तो वहीं है, द्वीप के साथ; उसे सहलाती, उसे आकार देती’। कहती थी वह, ढाढस बँधाती हुई, जब उमेश संबंध की परिणति की कल्पना कर घबराता था।

पूरे पंद्रह बरस बड़ी थी वह उमेश से।

वे दिन चालीस बरस पहले थे। नदी भी आगे बढ़ गयी, द्वीप भी। दिशाएं भी बदल गयीं, गंतव्य भी। स्मृतियों की कौंध फीकी पड़ती गयी। जिन लकीरों के बारे में विश्वास था कि अंत तक जस की तस खिंची रहेंगी, वे अंत की ओर बढ़ती यात्रा में धुंधलाती-धुंधलाती अदृश्य सी होती गयीं। हम कैसी कैसी कामनाओं, कल्पनाओं का बोझ स्मृति पर डालना आरंभ कर देते हैं कि अंत तक सँभाल कर रखे। क्यों रखे, भई?

  कहाँ होगी वह? उसी नगर में? किसी और नगर, देश में? या…

अब शोक-सभा में बैठे रहना असंभव था, एक घंटा पूरा हुआ हो, ना हुआ हो। उमेश यों फुर्ती से उठा कि बाहर निकलेगा और वह मिल जाएगी; या आधा मील चल कर उसके घर पहुँचा जा सकेगा। चालीस साल का फासला सड़क पर चलकर नहीं, केवल यादों में चलकर ही तय होता है …जानता था, उमेश। इस वक्त बस वह एकांत चाहिए जो स्मृति का अभयारण्य बन सके। बैठूँ कहीं जाकर एकदम अकेला। छू लूँ  कृतज्ञता की शामों की, आवेश भरे आलिंगनों की, अप्राप्ति के विषम सुखों की, विफल कामनाओं और निष्फल प्रार्थनाओं की, पंद्रह बरस बड़ी स्त्री से प्रेम पाने-करने के रोमांच और अटपटेपन की स्मृतियों की नदी को—जो फिर से द्वीप को सहलाने, आकार देने चली आई है।

सीढ़ी तक भी नहीं पहुँच पाया था कि टीं..ईं…ईं। यह कोई मैसेज था, सीढ़ी उतरते उमेश का हाथ अपने आप जेब तक पहुँच गया; फोन हाथ में। मैसेज में आश्वासन था, स्मार्ट सब-सिटी में बढ़िया फ्लैट कौड़ियों के मोल दिलाने का। उमेश इस वक्त उदास स्मृतियों के नगर जाना चाहता था, स्मार्ट सिटी की तरफ नहीं। उसने इतनी जोर से डिलीट बटन दबाया जैसे आश्वासन-दाता का गला घोंट रहा हो। फोन जेब में रखा ही था कि टिड़िंग…टिड़िंग…यह फेसबुक पर किसी ने कुछ किया था। उमेश से रहा नहीं गया, आखिर आज दोपहर में ही तो उसने अपनी ताजा कविताएं फेसबुक पर जारी की थीं, पाठकीय प्रतिक्रिया की उपेक्षा कैसे कर दे? लेकिन, यह तो किसी जलकुकड़े की बकवास थी—‘क्या मुसीबत है, यार, आदमी सलीके से उदास तक नहीं हो सकता…’ फेसबुक से बाहर निकलते उमेश ने सोचा… ‘कुछ देर के लिए आभासी संसार से बाहर ही चला जाए’।

‘ लेकिन अगर उस फेलोशिप एप्लीकेशन के बारे में ईमेल आ गयी तो…?’

टिंग..टिंग…यह आवाज ईमेल की ही सूचना दे रही थी। उमेश से रहा नहीं गया। देखा, एप्लीकेशन के बारे में नहीं, यह तो हिन्दू भारत के लिए तड़पते-तड़पते अमेरिका में जा बसे किसी देशभक्त की ईमेल थी, ‘तुम जैसे स्यूडो-सिकुलरों के कारण ही तो भारत देश और सनातन धर्म की यह हालत हो गयी है…’

धत्तेरे की…फोन बंद किये बिना उदासी में जाना असंभव है। उमेश अभी इमारत के लॉन तक ही पहुँचा था। यह शाम वैसी नहीं थी जैसी उसे याद आ रही थी। यह बदले वक्त की, बदले मौसम की शाम थी। आज दिन भर जरा धूप क्या चमकी, बादलों ने शाम को घेर लिया था। बेमौसम बारिश की मार से फसल मर रही थी; संभ्रांत लोग मौसम के सुहावनेपन पर रीझ कर, सोशल मीडिया पर ‘आओ थोड़ा रोमांटिक हो जाएं’ के आव्हान कर रहे थे। हद है असंवेदनशीलता की। फोन बंद ही करना होगा, तभी उन शामों तक लौटा जा सकता है जो अगस्त में अगस्त की शाम थीं, और अप्रैल में अप्रैल की। लौटना ही है उन शामों की ओर, पाना ही है अपना उदास एकांत।

बाहर आते ही—सामने कावेरी…’हाय..उमेश…’,

‘ अरे, कावेरी, इतने दिनों बाद…’।

लिपट गये दोनों। इतनी अच्छी दोस्त…इतनी प्यारी स्त्री।

‘कॉफी पियें?’

‘ हाँ, हाँ, क्यों नहीं…’कहते कहते उमेश को  झटका सा लगा…नहीं, इस वक्त नहीं। इस वक्त वह एकांत जो बरसों से नहीं नसीब हुआ है…वे यादें जो इसरार कर रहीं हैं।

‘ फिर कभी, कावेरी। कल ही। फोन करता हूँ, अभी कहीं जाना है…’

‘ऐज यू विश, बॉस…इंतजार करूंगी…’

कावेरी—कितनी प्यारी, कितनी बिंदास। लेकिन आज तो बस उन मासूस दिनों की यादों का दिन है। कविगण कहते आए हैं ‘लरिकाई कौ प्रेम’ भुलाए नहीं भूलता…आज इस कविसमय को सिद्ध करने का दिन है। पीली रोशनी के उस नीम-अंधेरे कोने में प्रवेश करने का दिन, उसके स्वर में इन्हीं ‘छद्म-आध्यात्मिक’ कविताओं को सुनने का दिन…

अपने प्रिय बार के अलावा कहाँ वैसा कोना? चंद कदम की दूरी ही तो है उदासी के नीम-अंधेरे कोने और बैमौसम अंधेरे से सने सड़क के टुकड़े के बीच…

उस कोने तक पहुँचने के पहले ही वह कृपादृष्टि उस पर पड़ी जिसकी प्रतीक्षा बरसों से थी, ‘आइये, उमेशजी, आइये… क्या कविताएँ लिखी हैं इधर आपने…अगला लेख आप पर ही लिखना है…’

‘विश्वास नहीं हो रहा…’ उमेश का मन था उस नीम-अंधेरे कोने की तरफ…दिमाग था, इस कोने में । उस कोने में एक नीची कुर्सी पर स्मृति बैठी थी, इस कोने में ऊँचे बार-स्टूल पर आलोचना विराजमान थी। उस कोने में लरिकाई के प्रेम का शोक-गीत था, इस कोने में शानदार शोक-सभा  की संभावना थी।

‘मैंने मैसेज करके तारीफ की है, अभी कुछ ही देर पहले तो… मैसेज मिला नहीं क्या?’

‘मैसेज?’ फोन तो मैंने बंद कर रखा है, कभी नहीं करता…आज इस उदासी के चक्कर में…बाद में देखेंगे उदासी…आलोचक की कृपादृष्टि हो गयी तो अपनी उदासी में और न जाने कितनी उदासियाँ गूँज उठेंगी…बैठा जाए। स्मृति के उदास कोने का क्या? वह तो अपने हाथ है, कभी भी जा बैठेंगे उदासी के कोने में’।   

स्मृति का नीम-अंधेरा कोना विस्मरण के अंधेरे में चल दिया है, लरिकाई का प्रेम हमेशा की तरह इंतजार में ठिठक गया है। उमेश ने बार-स्टूल खिसकाया है, फोन ऑन कर लिया है, आलोचक की ओर कृतज्ञ मुस्कान रवाना करते हुए ड्रिंक ऑर्डर कर दिया है।   

  

   

 

नाकोहस..

नाकोहस नावल की पहली प्रति दिसंबर 2015 के पहले दिन हाथ में आई थी, अगले ही दिन अलीगढ़ मुस््लिम यूनिवर्सिटी में इसके कुछ हिस््सों का पाठ किया था…और पिछले सप््ताह सूचना मिली कि राजकमल इसके दूसरे संस््करण की तैयारी कर रहा है…पाठकों का आभार। नाकोहस जब कहानी के रूप में आया था, इस  बार काफी बहस हुई थी, कुछ लोगों को बहुत अच््छी लगी थी कहानी तो कुछ को इस लायक भी नहीं कि कहानी कहला सके। खैर, अपनी अपनी राय। 

इतना जाहिर है कि समाज में नाकोहस किस््म का मानस तो बनाया गया है, बनता जा रहा है, हम में से कुछ लोग इसे देखना ना चाहें, उनकी मर्जी, आहत भावनाओं के नाम पर समाज को एक डरावने अंधेरे में ठेलने की कोशिशें जारी तो हैं। उपन्यास के रूप में नाकोहस को बहुत सराहा गया है, कुछ मित्रों ने विस््तृत तो कुछ ने संक्षिप््त टिप््पणियों के जरिए इसका विश््लेषण भी किया है। इन टिप््पणियों को यहाँ आपसे साझा कर रहा हूँ, एक एक करके…

इस तरह, यह इस बेवसाइट की फिर से शुरुआत भी है, जिसे पिछले कई महीनों में मैंने अपडेट ही नहीं किया था। 

तो, सबसे पहले, श्रेष््ठ कवि, प्रखर आलोचक और समर्पित समाज-कर्मी अशोक कुमार पांडेय का आलोचनात्मक लेख। यह पाखी के मई 2016 अंक में छपा है, और जनपक्ष ब्लॉग पर भी है। 

नाकोहस पढ़ते हुए कुछ फुटकर नोट्स

मगर चिराग़ ने लौ को संभाल रखा है[1]

  • ·        अशोक कुमार पाण्डेय

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नाकोहस जब कहानी के रूप में आई थी तब इस पर टिप्पणी करते लिखा था – “समय का बदलना अक्सर महसूस नहीं होता. उसे कुछ प्रतीकों के सहारे पढ़ना होता है. और यह “पाठ” भी क्या होता है? दरअसल यह जितना पढ़ी जाने वाली चीज़ में होता है उतना ही उस ज़मीन में भी जिस पर खड़ा हो के उसे पढ़ा जा रहा है. यानी हमारी अपनी “नज़र” पर. बकौल साहिर “ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है/ क्यूं देखें ज़िन्दगी को किसी की नज़र से हम.” यू आर अनंतमूर्ति की मृत्यु के बाद के उल्लास और पटाखों को कोई गौर से देखे तो यह किताब जालाये जाने, लेखकों पर हमलों, मक़बूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग्स फाड़े जाने के क्रम में तो थे लेकिन अपनी अभिव्यक्ति और सार में यह एक “गुणात्मक छलांग” थी. महात्मा गांधी की मृत्यु पर बंटी मिठाइयों के बाद यह पहला सार्वजनिक गिद्धभोज था, याद कीजिए हुसैन के मरने पर भी यह दृश्य नहीं देखा गया था. इस तरह यह एक पुख्ता प्रतीक था, हमारी ज़मीन से देखें तो फासिज्म के विजय उद्घोष का और उनकी ज़मीन से देखें तो अच्छे दिनों का.  “नाकोहस” इसी नई हकीक़त का एक आख्यान है.”

और देखिये इन कुछ महीनों में कितना कुछ बदल गया. अपने देश मे दादरी से जे एन यू तक, रोहित वेमुला से ऋचा सिंह तक, पटियाला कोर्ट परिसर से बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और ग्वालियर तक फ़ासीवाद अपनी विजय का उन्मुक्त उद्घोष करता विचर रहा है तो अमेरिका जैसे मुक्त बाज़ार वाले देश मे डोनाल्ड ट्रम्प खुलेआम अपनी घोर दक्षिणपंथी नीतियों के साथ ताल ठोंक कर भूमंडलीय नेता बनने की रेस मे है. अम्प्टन सिंक्लेयर ने फासीवाद को“पूंजीवाद + हत्या” कहा था और आज चार सू जो मंज़र है वह इसकी सख्त ताक़ीद करता नज़र आता है. ऐसे में नाकोहस अब जब उपन्यास के रूप में आया है और अपने फलक को और व्यापक करता हुआ वक़्त की तस्वीर और उसके पाठ, दोनों को और अधिक स्पष्ट करता है, तो इस पर ज़रा तफ़सील से बात करना ज़रूरी हो जाता है.

देखें तो नाकोहस की कहानी मुख़्तसर सी है. एक कॉलेज के अलग अलग धर्मों के तीन प्रोफ़ेसर दोस्त जो धर्मनिरपेक्ष हैं, मुखर हैं और लगातार साम्प्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ हैं, सत्ता के एक गोपनीय संगठन नाकोहस यानी  नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटीमेंट्स द्वारा गिरफ़्तार किये जाते हैं, उनका उत्पीड़न होता है और फिर उन्हीं हालात में चेतावनी के साथ उन्हें वापस छोड़ दिया जाता है. तीन लाइनों की इस कहानी के कोई एक सौ साठ पन्नों में आप किसी ‘औपन्यासिक’ उतार चढ़ाव और रहस्य रोमांच की उम्मीद करते हों तो निराश होने की पूरी संभावना है. नाकोहस की कथा इसके विषय वस्तु सी खुरदुरी है, जिसमें घटनाएँ नहीं एक मुसलसल बहस और जद्दोजेहद है. यह पूरा उपन्यास हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन की इस विडंबना को आहिस्ता आहिस्ता दर्ज़ करता जाता है और उसकी भयावहता को पाठक के दिल-ओ-दिमाग में पैबस्त करता जाता है. पन्ना दर पन्ना यह देश के लोकतांत्रिक ढाँचे में लगती दीमकों और उसके ढहते कंगूरों की शिनाख्त करता चलता है. असहमतियों को देशद्रोह में तब्दील कर देने वाले समय के तमाम बिम्ब असुन्दर होने के लिए अभिशप्त हैं तो यह उपन्यास अपने खुरदुरे शिल्प के साथ, जो न क्लासिकल अर्थों में फैंटसी या जादूई यथार्थवाद जैसी तकनीकों से परिभाषित किया जा सकता है, न ही सपाटबयानी कहा जा सकता है, एक प्रतिरोध की तरह, एक प्रतिआख्यान की तरह उपस्थित है जहाँ बहसें कथा का स्थान लेती जाती हैं, क्रूरताएं और उनसे उपजी आशंकायें रोमांच का. अपनी पूरी संरचना में यह शिल्प नया भले न हो लेकिन इस समय की भयावहता को उसकी सूक्ष्म पदचापों के साथ पहचानने और पाठकों तक संप्रेषित करने में काफी हद तक सफल है. उपन्यास की भाषा पर थोड़ी बात आगे की जायेगी.

नाकोहस का कोई अर्थ नहीं बनता. अर्थ बनाने की कोई सचेत कोशिश भी नहीं दिखती. इसके कारिंदों के लिए उपयोग किया गया पदबंध “बौनेसर” भी क्लबों में अनियंत्रित होने वाले अतिथियों को नियंत्रित करने वाले समानधर्मी“बाउंसर” से ध्वनि साम्य के बावजूद कोई अर्थ नहीं देता.  पर कहानी में ये अपनी उपस्थिति से, अपने नाम मात्र से जैसे रीढ़ की हड्डियों में एक सिहरन पैदा कर देते हैं, इसके विपरीत ये वस्तुतः अर्थहीन पदबंध हैं. यही इसकी व्यंजना है. दक्षिणपंथ के अपने तंत्र में उपस्थित ऐसी संरचनाएं, जो बाहर से दिखती ही नहीं, जिनका अस्तित्व एक सभ्य समाज में निरर्थक है, पूरे समाज को इतने गहरे प्रभावित करती हैं. आप देखिये प्रशांत भूषण पर आक्रमण करने वालों के हाथ में भगत सिंह सेना का बैनर था. भगत सिंह और साम्प्रदायिक ताक़तों का बैनर! मनसे को याद कीजिए. तर्कबुद्धि कहेगी,एकदम निरर्थक, एकदम बकवास. अनुभव कहेगा, हिंसक, भयानक, हत्यारे! यहाँ कथा की अनुपस्थिति  इस नए समय की उपस्थिति है. जहाँ सब कुछ इतना आवेगहीन, ठंढा और पूर्वनिर्धारित है कि कोई कुतूहल नहीं जगाता,कोई कथानक, कोई उतार चढ़ाव नहीं, एक सीधी सपाट रेखा पर चलता हुआ वह स्वाभाविक सा लगता चला जाता है. धीरे धीरे फासिज्म का दर्शन सहज स्वीकार्य होता चला जाता है. हम मान कर चलते हैं कि “भड़काऊ भाषणों” या“दंगों” या “स्नूपिंग” के कितने भी सबूत आ जाएँ, केस हो जाएँ लेकिन कुछ होना नहीं है. हम न पुलिस की कार्यवाही की प्रतीक्षा करते हैं न अदालत के आदेश का. अब फैसले टीवी बहसों और सड़क की गुंडागर्दी से होते हैं जहाँ संत-साध्वी-महंत-मौलवी अपने विषाक्त धर्मादेश बेखटके देते रहते हैं. गोएबल्स की ज़रुरत तक ख़त्म होती जाती है और लोग पहली बार ही आत्मविश्वास से बोला गया झूठ स्वीकार कर लेते हैं, भले ही सच की तरह नहीं. चंद टीवी चैनल और अखबार पूरे विश्वास से झूठ को लगातार दिखाते हैं और एक भीड़ सड़कों पर नारे लगाते उतर आती है जो किसी पर कहीं भी हमला कर सकती है, उनके लिए क़ानून और पुलिस उपस्थित होकर भी अनुपस्थित हैं या यह कहें कि उनके द्वारा छोड़ा गया स्पेस जिन्होंने साधिकार कब्ज़ा कर लिया है. वे सत्ता के बगलगीर हैं और न्याय के स्थानापन्न. उनके पास तर्क नहीं हैं परन्तु निष्कर्ष हैं- अप्रश्नेय निष्कर्ष. इस उपन्यास पुरुषोत्तम अग्रवाल ने बहुत गंभीरता से संचार माध्यमों के हमारे मानस और स्पेस पर कब्ज़े को रेखांकित किया है, जिस पर आगे विस्तार से बात की जाएगी. ज़ाहिर है, इस आख्यान को भी ऐसा ही होना था. यह न उतार चढ़ाव और किस्सागोई की शक्ल में आ सकता था, न ही किसी एकालाप की शक्ल में. चेखव की एक कहानी एक क्लर्क की मौत याद आती है. कोई मार्केज की क्रानिकल भी याद कर सकता है और कामू की द स्ट्रेंजर भी. नाकोहस का निरर्थक होना और उसका इस क़दर वर्चस्व अपने आप में एक व्यंजना रचता है.

नाओमी क्लेन अपनी किताब द शॉक थेरापी में अर्जेंटीना के यातना शिविर में चार महीने गुज़ारने वाले मारियो बिलानी को उद्धृत करती हैं. वह कहते हैं, “मेरा सिर्फ़ एक लक्ष्य था – अगले दिन तक ज़िंदा रहना. लेकिन सिर्फ़ ज़िंदा रहना नहीं, बल्कि जैसा हूँ वैसे बने रहना. जैसा हैं वैसा बने रहना – यह चुनौती सुकेत की भी है, रघु की भी और शम्स की भी. नाकोहस के यातना शिविर मे गुज़ारे कुछ घंटों मे ही नहीं बल्कि अपने सुरक्षित घरों के हर झरोखे मे आँख लगाए बौनेसर आँखों के बीच रहते भी।  यह यातना शिविर  किसी एक जगह तक महदूद नहीं है बल्कि हमारे पूरे पब्लिक और प्राइवेट स्पेस मे पसर गया है। नाकोहस सिर्फ़ शरीर को चोटिल नहीं करता. वह दिमाग और दिल पर भी कब्ज़ा करता जाता है. लोकतंत्र के भ्रम के भीतर चेतनाओं पर नियंत्रण का हिंसक उपक्रम करती दक्षिणपंथी राजनीति सुनहले लबादों, पवित्र शब्दों और ख़ूबसूरत प्रतीकों की आड़ में आती है. उपन्यास के शुरू में ही शम्स कहता है, “जो भी आमादा है, वह गले में कुत्तोंवाला पट्टा पहनाने पर आमादा है…हिल डुल पर कोई रोक नहीं, बशर्ते दुम साथ में हिलती रही…भौंकने की भी इजाज़त, बशर्ते चेन मज़बूती से उसके हाथ में थमी रहे…’ उसके बाद आये रघु के “लेकिन” के बाद के वाक्य को पूरा करने वाले शब्द कहीं नहीं थे. यह जो निःशब्दता है, जो बेबसी और बेचैनी है, यह उपन्यास उस बेबसी और बेचैनी का ज़िंदा दस्तावेज़ है तो उसके बाद का जो हँसी मजाक है वह इस अमानवीय वातावरण में मुखालिफ़त करते लोगों की लाचारी भी है और हिम्मत भी.  नियंत्रण की ये कोशिशें कई कई स्तरों पर चलती हैं. घर घर में पहुँचे टी वी चैनल और हर हाथ को काम की जगह मिले मोबाइल सेट चौबीसों घंटे आपकी चेतना के चोर दरवाज़े तलाशते रहते हैं, रिमोट के सहारे नियंत्रण का आपका भ्रम टूट जाता है. याद कीजिये जे एन यू की हालिया घटना जब फ़र्ज़ी वीडियोज और चयनित रिपोर्टिंग के सहारे टीवी चैनल्स ने उन्माद का ऐसा माहौल बना दिया है कि जे एन यू के लिए ऑटो करने पर ऑटो वाला कहता है सीधे पाकिस्तान क्यों नहीं जाते? याद कीजिये मेरठ के पास बनाई जा रही हिन्दू सेना से जुडी कोई बीस साल की लड़की का वह बयान जिसमें सेकंड्स में व्हाट्सेप के ज़रिये कई लाख लोगों तक अपने ज़हरीले सन्देश पहुँचा देने की गर्वोक्ति है. मुजफ्फरपुर दंगों के समय पकिस्तान के एक वीडियो के सहारे रातोरात दंगों की आग लगा देने की घटना याद कीजिये. सुकेत जब कोशिशों के बावज़ूद टीवी चैनल नहीं बंद कर पाता है या मोबाइल की स्क्रीन पर नाकोहस का कब्ज़ा कुछ ऐसा होता है कि वह उसके मन की बात भी जान लेता है तो याद कीजिये फेसबुक की टाइमलाइन पर दर्ज वह सवाल : आपके दिमाग में क्या है? अस्सी के दशक में लिखी नोम चोमस्की की विश्वप्रसिद्ध किताब “मैन्यूफेक्चरिंग कंसेंट” इस अवधारणा को बहुत विस्तार से बता चुकी है. वियतनाम युद्ध सहित तमाम घटनाओं के दौरान जनता की अवधारणा को कैसे मिथ्या या अर्ध सत्यों और दुष्प्रचारों  के सहारे सत्ता के पक्ष में निर्मित किया जाता है इसे तबसे आज तक दुनिया भर में लगातार देखा गया है. अभिव्यक्ति की आज़ादी के नारे के  साथ अस्तित्व में आये “मुक्त” संचार माध्यम मुक्त बाज़ार की तरह ही अपने मालिक के ग़ुलाम होते हैं और उसकी विचारधारा को लगातार इकलौती सही विचारधारा तथा बाक़ी सबके विरोधी नहीं शत्रु होने का जो द्वैत रचते हैं वह अंततः समाज में स्वतंत्र सोच और प्रतिरोध की सारी संभावनाओं के दमन के लिए आवश्यक जनमत निर्मित करता है. यही वह जनमत होता है जो खुलेआम पटियाला कोर्ट में कन्हैया की पिटाई से लेकर कलबुर्गी की हत्या तक को नज़रंदाज़ करता है. यह खाना, पहनना, बोलना, लिखना सब नियंत्रित करने की हिंसक हठ लिए संस्कृति के उद्धारक के वेश मे आई सांस्कृतिक सेना को न्यायसंगत सिद्ध करने वाला जनमत है, और उसे सही न मानते हुए भी चुप रह जाने वाला भी।

कमाने, खाने और आनंद मनाने को नाकोहस मनुष्य के लिए ज़रूरी और पर्याप्त काम घोषित करता है तो सुखवाद के इस दर्शन की मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था में विन्यस्त जड़ें साफ़ दिखती हैं. आखिर मुसोलिनी ने खुद कहा था – “फ़ासीवाद को बेहतर तरीके से कारपोरेटवाद कहा जा सकता है. क्योंकि वह राज्य और कार्पोरेट शक्ति का सम्पूर्ण विलयन है.” यहाँ निकोलस लामेर साउटे का उपन्यास ‘द वाटर थीफ़’ याद आना स्वाभाविक है. तो यह सुखवाद नाकोहस के लिए सबसे मुफ़ीद दर्शन है जो एक तरफ़ जनता को चौबीसों घंटे कमाने और खर्च करने के चक्र में उलझा देता है तो दूसरी तरह परम्परा,इतिहास और दर्शन की जड़ों से पूरी तरह काटकर ज्ञान की जगह सूचना पर निर्भर एक संवेदनहीन मनुष्य में तब्दील कर देता है. उपन्यास की एकदम शुरुआत देखिये . सुकेत स्वप्न में गजग्राह के मिथक का नया रूप देख रहा है. इसमें नया क्या है? नया है गज की हत्या के इर्द गिर्द ज़िन्दगी का हस्ब मामूल चलते रहना.” कुछ भी हो जाये ज़िन्दगी हस्ब मामूल चलती रहती है. आहत भावनाओं के पोषण के लिए सुकेत के घर आई गुंडा छात्रों की भीड़ शिक्षकों की उस कॉलोनी में बाक़ी लोगों के लिए सिर्फ़ एक व्यवधान है, खाए अघाए संपन्न लोगों के जीवन में एक अवांछित व्यवधान. टीचर्स असोसिएशन की बैठक में वबाल से दूर रहने की सलाहें आम शिक्षकों की हैं तो प्रगतिशील बख्शी जी के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं भावनाओं का आहत होना बड़ा मुद्दा है. कॉलेज से लेकर मध्यवर्गीय सोसायटी और सड़क तक सब अपने अपने समझौतों में मशरूफ़.  आपस मे बतियाते जब ये दोस्त कहते हैं कि यह अब वह देश नहीं रहा जिसकी आदत पड़ चुकी थी हमें, तो इस बदले हुए देश मे नाकोहस के लिए इससे अच्छा माहौल क्या हो सकता है? और इस माहौल में सबसे बड़ा ख़लल है – स्वतन्त्र सोच. दुनिया भर में ऐसी ताक़तों ने सबसे पहले स्वतन्त्र सोच पर हमला किया है और दुनिया भर के लेखकों ने इसे दर्ज किया है. ओरहान पामुक के उपन्यास ‘स्नो’ में एक प्रसंग है। देश में सर उठा रहे दक्षिणपंथ के दौर में एक छोटे से कस्बे में ‘हिज़ाब पहनने वाली लड़कियों को कालेज में प्रतिबंधित करने’ वाले सरकारी आदेश का सख़्ती से पालन करने वाले कालेज के निदेशक की हत्या के इरादे से आया एक धर्मांध युवा उनसे पूछता है – ‘क्या संविधान के बनाये नियम ख़ुदा के बनाये नियम से ऊपर हैं?’ निदेशक के तमाम तर्कों का उस पर कोई असर नहीं पड़ता और वह उसकी हत्या कर देता है। हिटलर या मुसोलिनी के मॉडल ही नहीं अमेरिका में ओवरमैंन कमिटी या हाउस कमिटी ऑन अन-अमेरिकन एक्टिविटीज़ जैसी संस्थाएं नाकोहस की पूर्वपीठिका हैं. अगर वामपंथी मित्र अति संवेदनशील न हों तो स्टालिन की सत्ता संरचना भी. सन चौरासी से बयानबे तक हमारा समाज लगातार और बीमार और संवेदनहीन होता चला गया है और प्रत्यक्ष सत्ता में आने से पहले ही फासीवाद जनमानस में अपना वर्चस्व विभिन्न रूपों में स्थापित कर चुका है. इस उपन्यास मे ही नेल्ली के नरसंहार का ज़िक्र है। फरवरी, 1983 मे असम मे हुए इन दंगों मे 2000 से ज़्यादा मुसलमानों को मार दिया गया था (यह आधिकारिक संख्या है, स्वतंत्र रिपोर्टों मे यह संख्या दस हज़ार तक बताई गयी थी)। चौदह से अधिक गांवों मे एक तरह का नस्ली सफाया। सरकारें आती जाती रहीं लेकिन जांच के लिए बनी तिवारी समिति की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गयी। कोई सात सौ केस दर्ज़ हुए थे लेकिन आधे से अधिक सबूतों के अभाव मे रद्द हो गए। जीवन हस्बे मामूल चलता रहा। जातीय नरसंहारों की तो एक लंबी सूची है। बाबरी मस्जिद विवादित ढाँचा बनती गयी और अब तो मुख्यधारा के तमाम माध्यम इसे विवादित ढांचा कहने लगे हैं। सुकेत के लेख मे जिन बातों से भावनाएं आहत हुई हैं उनमें से एक यह भी थी।

यहाँ सुकेत को गिरफ्तार करने आये चौड़ा सिंह के चरित्र को अगर थोड़ा सा विवेचित कर लें तो चीज़ें और साफ़ होंगी. संवेदना से पूरी तरह से खाली वह साक्षर लेकिन अनपढ़ नौजवान जब एक क्षण के लिए द्रवित होता है तो उसका साथी उसे तुरंत सावधान करता है. और उसकी संवेदना को हरने वाले टूल्स क्या हैं?बेरोज़गारी, इतिहास-दर्शन-साहित्यहीन शिक्षा, चारों तरफ़ बजता निरर्थक संगीत. एरिक हाब्स्बाम एज ऑफ़ एक्स्ट्रीम्स में बताते हैं – ’फासीवादी और ग़ैरफासीवादी दक्षिणपंथ में असली अंतर यह है कि फासीवाद निचले तबके की भीड़ को आंदोलित करके अस्तित्वमान होता है। यह निश्चित तौर पर लोकतांत्रिक और लोकलुभावन राजनीति के युग से जुड़ा हुआ है। पारंपरिक प्रतिक्रियावादी इन राजनैतिक व्यवस्थाओं का फ़ायदा उठाते हैं और ‘जैविक राज्य’ के समर्थक इनके अतिक्रमण का प्रयास करते हैं। फासीवाद अपने पीछे जनता को भारी संख्या में ले आने में गौरवान्वित महसूस करता है’… ये‘पीले बीमार चेहरे’ ही हिटलरी फरमानों को पूरी आस्था से कोई सवाल किये बिना पालित करने वाले लोग होते हैं. कला, विद्या, ज्ञान आदि से काट दिए गए पुच्छ विषाण हीन पशु में तब्दील कर दिए गए ये युवा आज हमें हर सड़क पर नहीं दिखाई देते? और इनके नेतृत्व मे दिखते हैं गिरगिट। वह अपढ़ नहीं है। खूब पढ़ा लिखा है।  पर तीनों उसे छेड़ते हैं और शम्स कहता है, “ऐन मुमकिन है, शे’र अभी भी फरमाते हों”  इस पर उसकी प्रतिक्रिया “” आई एब्हार एवरीथिंग ऑफ माई पास्ट…बीत चुके वक्त के एक एक पल से नफरत है मुझे…” इस बौद्धिक कौम का एक सिरा है भावनाओं केआहत होने को लेकर संवेदित प्रगतिशील बख्शी जी तो दूसरा सिरा है अपने अतीत मे अर्जित सारे लोकतान्त्रिक संस्कारों और ज्ञान को पूरी तरह सत्ता के पक्ष मे उपयोग करने वाला गिरगिट। बक़ौल रसूल हमजातोव अतीत पर पिस्तौलें दागते समय पर भविष्य की तोपों के गोले गिरने लाज़िम हैं, लेकिन उनकी जद मे जाने क्या क्या नष्ट होगा।टीवी की बहसों से अखबारों के पन्नों मे फासीवाद का वैचारिक आधार पुख्ता करते और उसकी कार्यवाहियों को अपने (कु) तर्कों का वैचारिक कवर देते तमाम बुद्धिजीवियों और उनके अतीत को देखते इन “गिरगिटों” की एकदम भौतिक उपस्थिति हाल के दिनों मे और मुखर होकर सामने आई है।

तो अगर एक उपन्यास वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की इस क़दर भविष्यवाणी करने लगे तो यह लेखक की सफलता भले हो, समाज की भयावह असफलता भी है.

इन सब कथाओं के बीच सुकेतु के टूटे विवाह और एक प्रेम का किस्सा है. दोस्तों के हँसी मजाक हैं. नशा है. स्त्रियाँ हैं. उनकी अपनी महत्त्वाकांक्षाएं और रुमान हैं. ये सहज मानवीय कमज़ोरियाँ जो यह बताती हैं कि सच के पक्ष में खडा मनुष्य कोई परफेक्ट मनुष्य नहीं होता रेमंड के विज्ञापन की तरह, वह हमारे आपके ही तरह एक आम मनुष्य होता है बस उसने तर्क से दुनिया को देखना सीख लिया है. चरित्र को जिस तरह से प्रगतिशील ताक़तों पर हमला करने के लिए हथियार बना लिया जाता है उसे हमने नेहरू और गांधी ही नहीं हमारे अपने समय में खुर्शीद अनवर से कन्हैया तक देखा है. तर्कों का जवाब तर्कों से देने की जगह चारित्रिक हत्याएं,अफवाहें, झूठ और दुष्प्रचार सबसे बड़े औज़ार होते हैं प्रतिक्रियावादी ताक़तों के.

मार्क्स ने कहा था कि किसी भी समय की संस्कृति उस समय के वर्चस्वशाली वर्ग की संस्कृति होती है. व्यवस्था अपने सहजबोध (कॉमन सेन्स) निर्मित करती है और उसे हर तरह से स्थापित करती है. भाषा से लेकर नाम तक उस सहजबोध का हिस्सा होते चले जाते हैं. ऑन लिटरेचर में अपने लेख ‘फंक्शन्स ऑफ़ लिट्रेचर” में अम्बर्तो इको इटली के फासीवादी समय में भाषा के साथ हुए व्यवहार का विस्तार से विवेचन करते हैं. हमारे समय में भी यह सहज बोध लगभग स्थापित सा ही है. उर्दू यानी मुसलमान, संस्कृतनिष्ठ हिंदी यानी द्विज, लोकभाषा यानी गँवार (देहाती को लगभग गँवार के पर्यायवाची की तरह उपयोग किया जाता है). फ़िल्में इस सहज बोध को स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम हैं तो पाठ्य पुस्तकों से लेकर कथित लोकप्रिय संचार माध्यम इसे बहुत बारीक़ी से स्थापित करते हैं और यह आम जीवन में जितनी स्वीकार्य होती जाती है, वर्चस्वशाली वर्ग की जकड़न उतनी मज़बूत होती जाती है. अभी एकदम हाल की घटना है कि मेट्रो में एक आयोजन का उर्दू ब्रोशर पढ़ती महिलाओं को पाकिस्तानी कहकर लगभग धमकाया गया. पुरुषोत्तम अग्रवाल इस उपन्यास में भाषा के इस सहजबोध का दो स्तरों पर प्रतिवाद करते हैं. पहला इस उपन्यास की अपनी भाषा और दूसरा इसके कथ्य में विन्यस्त भाषा और संस्कृति का सवाल. यहाँ रघु एक ईसाई पिता की संतान है,सेना में ब्रिगेडियर रहा पिता, योग और ध्यान का अभ्यासी पिता, नैष्ठिक ईसाई और रामायण-महाभारत का जानकार पिता जिसने पुत्र का नाम राम के पितामह राजा रघु से प्रभावित होकर रखा था. कहानी के रूप में पाखी में प्रकाशित होने पर एक आलोचक मित्र ने इसे हिन्दू साम्प्रदायिकता से जोड़ कर देखा था. यह आरोप मुझे वैसे है जैसे कोई कहे कि शरद जोशी रिवर्स लव जिहाद के संघी नारे से प्रभावित होकर इरफाना जी से विवाह को उद्धत हुए थे. अव्वल तो क्या किसी ईसाई का रघु या ऐसा कोई नाम होना सचमुच इतना अस्वाभाविक है? खुशवंत सिंह के उपन्यास अ ट्रेन टू पाकिस्तान में एक पात्र है इक़बाल. वह गाँव के भाई जी को इक़बाल सिंह, एक मोना सिख लगता है लेकिन सब इन्स्पेक्टर को इक़बाल खान. क्यों लगता है, प्रबुद्ध पाठकों को यह बताना मुझे ज़रूरी नहीं लगता. कबीर खान और दीपक कबीर और कबीर राजोरिया और कबीर बेदी हमारे समाज में जाने कितने हैं. अब किसी रसखान की कृष्णभक्ति या रघुपति सहाय के फ़िराक हो जाने या किसी ब्राह्मण शायर के शीन काफ़ निज़ाम हो जाने का क़िस्सा क्या सुनाना? मेरी गुजरात पोस्टिंग के दौरान मेरी सहकर्मी थी मनीषाबेन क्रिश्चियन. दिल्ली में मेरे एक सहकर्मी हैं विजय दीप मसीह. मेरी अपनी बेटी वेरा के नाम से ही अधिक जानी जाती है. हिन्दू मिथकों से प्रभावित ईसाइयों/मुसलमानों या इसके उलट के किस्से भी हमारे समाज में इतने अनुपस्थित तो नहीं तो रघु मसीह या रघु क्रिश्चियन नाम से इस क़दर चौंका जाए? यह चौंकना दरअसल नाकोहस के उस गिरगिट की याद दिलाता है जो कहानी में एक जगह कहता है, “एक आरोप तुम पर अपनी पहचान छिपाने का है.” गुलजार की काफी पहले लिखी कहानी धुंआ में मुसलमान चौधरी चाहता है कि मरने के बाद दफनाने की जगह उसे जला दिया जाय. यह किन्हें नागवार गुजरता है?  गरबा नवरात्रों में देवी दुर्गा की पूजा अर्चना है. उसमें बुतपरस्ती से इंकार करने वाले मुसलमानों का शामिल होना जिन्हें आपत्तिजनक लगता है वे कौन लोग हैं?  कम्युनिस्ट उमर खालिद की जो पहचान इसे स्वीकार्य है वह मुसलमान की है. पहचानों के नशे में इस क़दर मदहोश हो जाना कि उनमें किसी अंतरण, किसी व्यतिक्रम के होने को अस्वीकार कर देना या संदेह की नज़र से देखना तो नाकोहस का ही नज़रिया है!  असल में उसके लिए सामने यह पहचान ओढ़े लोग होना ज़रूरी है जिससे वह “हम” और “वे” की बाइनरी पैदा कर सके. तरल पहचानें उसके लिए एक संकट की तरह हैं. इसके उलट यह होना और इस होने को रेखांकित करना उस खाई के अस्तित्व का अस्वीकार और प्रश्नांकन है जिसकी उपस्थिति दक्षिणपंथ की उपस्थिति के लिए प्राण तत्व है. ईसाई होकर अपनी कविता में रघु का महाभारत के चरित्र के सहारे बात करना प्रगतिशील उमानाथजी को भी नहीं पच पाता. इसलिए जब पंडित शुक्ल जी रघु नाम जानने पर उपहास करने के लिए पूछते हैं कि “नाम ही नाम के रघु हैं, या कुछ ज्ञान भी है महाराज रघु के बारे में’ तो वह इस सहजबोध के वाहकों के प्रतिनिधि बन जाते हैं और रघु जब अपनी ईसाई पहचान को साफ़ करते हुए उन्हें शास्त्रार्थ में धाराशायी करता है तो यह उस साम्प्रदायिक सहजबोध का एक प्रतिपक्ष रचता है. इसी तरह जब खुर्शीद कहता है, “मेरे नाम को लेके उर्दूआइये मत” या जब सुकेत अपने सपनों में मिथकों के सहारे दुहस्वप्नों से गुजरते हुए देखता है कि मनुष्यों की ज़िन्दगी तो हस्ब मामूल चल ही रही है, देवताओं को भी उस गज को बचाने की कोई फ़िक्र नहीं तो यह एक तरफ़ उन पार्थक्य के उन बाड़ों को तोड़ते हैं जिनके बिना दक्षिणपंथ का कोई अस्तित्व ही नहीं तो दूसरी तरफ़ उस संवेदनहीन हो चुके समाज को रेखांकित  करते हैं जिसके लिए एक लेखक की मृत्यु पर हो रहे नृत्य में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं.  दूसरे स्तर पर यह काम लेखक ने उपन्यास की भाषा से किया है. जैसा कि मैंने शुरू में ही ज़िक्र किया, बेहद गंभीर विषय पर लिखे इस उपन्यास में एक पात्रों के बीच के लम्बे लम्बे संवादों में भी एक बेफ़िक्री है. शम्श ख़ासतौर बेहद मजाहिया है. हालांकि कई बार यह भाषा को हलके स्तर पर और फूहड़ मजाकों तक भी ले जाता है. मेरे लिए इसकी एक अपनी व्यंजना है. यह शत्रु को हलके में लेना नहीं है बल्कि प्रतिरोध को किसी उदास आख्यान की जगह एक ज़िंदादिल संघर्ष की तरह ज़िंदा रखना है. लोकभाषा से लेकर सोशल मीडिया और टीवी पर निर्मित हुई “नई वाली हिंदी” तक का बखूबी प्रयोग साजिशों की व्याप्ति के बरक्स उन स्पेसेज पर प्रतिरोध की आवश्यकता को बड़े सटल तरीके से इंगित करता है. और इन सबके साथ हर खंड की शुरुआत जिस तरह के काव्यात्मक वाक्यों या कहें कविता की दो पंक्तियों से हुई है वह संवेदना की आतंरिक तहों तक दस्तक देती है. लम्बी बहसें कई जगह ऊबाऊ हुई हैं, कई जगह इनमें उपन्यासकार पर आलोचक हावी होता दिखा है लेकिन अपनी सम्पूर्ण निर्मिति में भाषा प्रतिरोध के एक आदमक़द आख्यान के निर्माण के ज़रूरी टूल की तरह सामने आई है.

एक आखिरी उल्लेखनीय बात यह कि इस उपन्यास में कोई कृत्रिम उम्मीद नहीं. हाल में मुक्तिबोध को पढ़ते यह लगा है कि उनकी निराशा कितनी ईमानदार थी और उसी दौर में दस साल में क्रान्ति हो जाने की आशाएं कितनी निरर्थक. एक तरह का क्रांतिकारी नियतिवाद भी होता है जो अतिउत्साहों की जड़ में होता है. पामुक के उपन्यास ‘अ स्ट्रेंजनेस इन माई माइंड’ में वामपंथी युवा फ़रहत भीतर भीतर आसन्न संकट और हार को जानता है लेकिन प्रत्यक्ष में कहता है हम जीतेंगे. एक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए यह ज़रूरी हो सकता है लेकिन एक लेखक के लिए यह असल में बेईमानी है. उसे निराशाओं को भी उनकी पूरी भयावहता के साथ दर्ज़ करना होता है जैसे अम्पटन सिंक्लेयर ‘जंगल’ में करते हैं या मुक्तिबोध ‘अँधेरे में’ जैसी कविता में. इस निराशा और नाउम्मीदी का स्वीकार ही सामने खड़ी चुनौती का असली आकार देखने को मजबूर करता है और उसके बरक्स ज़रूरी लड़ाइयों की हदें भी।‘नाकोहस’ में जो अँधेरा है उसमें उम्मीद की इकलौती मद्धम रौशनी तीन दोस्तों की बेफ़िक्र हँसी में है, ज़िद में है, पागलपन में है, बेबसी में है, उदासी में है.इसलिए यह उपन्यास महान उपन्यास हो न हो आज एक बेहद ज़रूरी उपन्यास है. अपने समय का एक ज़िंदा दस्तावेज़ जो जितनी जल्दी अप्रासंगिक हो जाए, समाज के लिए उतना ही प्रासंगिक होगा.

[1] अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रखा है /मगर चिराग़ ने लौ को संभाल रखा है (अहमद फ़राज़)

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पाखी के मई अंक से साभार

प्रस्तुतकर्ता Ashok Kumar Pandey पर 9:14 pm

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लेबल: नाकोहस, पुरुषोत्तम अग्रवाल, समीक्षा, साम्प्रदायिकता

 

Why Should Bar Council act against these two lawyers..

Yesterday I Signed and put up a petition on my FB wall  asking Bar Council of India to initiate action aginst the defence lawyers in Nirbhaya case for their horrendous statements…

My inquistive friend Aalok Mishra raised the questions of freedom of holding on to one’s opinion

here is his  my response and his later comment…

 

@ Aalok Mishra, I was just coming to your comment dear. No need to refrain from commenting. just try to understand, in this case it is not a matter of their personal opinion. They are practicing law under some shared legal parameters. In law, every opinion has implications. In this case, the implications being that the onus of rape is not on the rapist but on the victim. Moreover by saying the he would burn his daughter alive, one of these characters is openly declaring his intent to murder. let hm just mention the name and it will be a full blown criminal offence. I hope it is clear by now that they are violating their professional code hence the Bar Council action is very much called for. They are of course at liberty to play, what may be called ‘lawyers’ games’ in favour of their clients, but they cannot violate the professional code. Let me give you one telling example. In Jessica murder case, the defence lawyer Ram Jethmalani argued that it was not his client, but “a tall Sikh gentleman” who shot at Jessica. It was of course laughable, but part of what I called “lawyers’ game.’Now, imagine him arguing that the murdered girl was to be blamed for murder since she chose to do the bar-tending at a party. Had he argued thus, Bar Council would have been totally justified in initiating action against him as well. generally speaking, lawyers, doctors, teachers, journalists have been traditionally respected as ‘noble professions’ precisely because they are supposed to enlighten society even while earning their bread and butter. These two lawyers have proved to be blots on their profession and must be admonished accordingly.

 

and Aalok’s response to this…

 

Thanks for the response. I had not thought of this angle.about the code of conduct. It might be a breach of professional integrity somehow. I will learn more about that from my friends who practice occasionally. Thanks again for allowing and facilitating dialogue on the timeline. That is a rare virtue which you have. Nice talking to u sir. tk cr….

 

This was a good dialogue…

wasn’t it?

न.प्र. कमल आ रहे हैं, न.प्र. कमल जा रहे हैं….

फेसबुक के लिए लिखा गया नोट – https://www.facebook.com/notes/purushottam-agrawal/नप्र-कमल-आ-रहे-हैं-नप्र-कमल-जा-रहे-हैं/953161794707747

न.प्र. कमल नगर के प्रसिद्ध व्यक्तियों में से थे, कवि, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता। अपना महत्व भी बखूबी पहचानते थे। गल्ला-मंडी के जिस बाड़े में रहते थे, उसके दरवाजे के ऊपर पाँच बाई तीन फुट का काला बोर्ड टँगवा दिया था, जिस पर चमकीले सफेद अक्षरों में लिखा था- न.प्र.कमल।

आप बाड़े के विशाल दरवाजे से अंदर घुसे, दस कदम चलने पर एक पेड़ के तने पर तख्ती देखेंगे- बाँई तरफ इशारा करते तीर के साथ- न.प्र. कमल। थोड़े फासले पर एक और तख्ती दीवार पर दिखेगी- दाँई तरफ बढ़ने का इशारा करती हुई- न.प्र.कमल। दाँई तरफ कुछ कदम चलिए, निश्चिंत रहिए, भटकने की कोई गुंजाइश नहीं, इस बार बाँई तरफ जाना है, तख्ती बता रही है—न. प्र. कमल। चंद कदम चले और एक दुमंजिले मकान के दरवाजे पर तख्ती है—न.प्र. कमल। मकान के आँगन में पहुँचे तो सीढियाँ हैं और तख्ती ऊपर की तरफ इशारा कर रही है—न.प्र. कमल। सीढ़ियाँ चढ़ कर पहुँचे तो बस पहुँच ही गये, सामने दरवाजा है, और वही—न.प्र. कमल।

न.प्र. कमल के इतने सारे बोर्ड और तीर चर्चा का विषय रहते ही थे। कमलजी गोधाजी की कैंटीन पर कभी-कभार ही आते थे, गंभीर आदमी ठहरे, कहाँ रोज-रोज अड्डेबाजी में पड़ते।

उस दिन प्रकाशजी तरंग में थे।  न.प्र. कमल जैसे ही गोधाजी की कैंटीन पर अवतरित हुए, प्रकाशजी चहक उठे। कमलजी ठीक से स्थापित भी ना हो पाये थे कि प्रकाशजी बोले, ‘कमलजी एक सुझाव है…’

‘हाँ, बोलो प्रकाश, बोलो…’

‘जनता की सुविधा के लिए इतने सारे बोर्ड तो आपने लगवा ही रखे हैं…’

‘हाँ भई, लोग इधर-उधर भटकते रहें, अच्छा नहीं लगता …’

‘जी, वही तो, आखिरकार आप का तो जन्म ही  राष्ट्र को सही रास्ता दिखाने के लिए  हुआ है।  बस दो बोर्ड और बनवा लें तो किसी कन्फ्यूजन की गुंजाइश ही न रहे, एक छाती पर लटकाने के लिए- न.प्र. कमल आ रहे है, एक पीठ के  लिए– न.प्र. कमल जा रहे हैं…’

 

नाकोहस…..पीके

‘नाकोहस’ दुख और आशंका के कारण लिखी थी…हर रोज हम उस दु:स्वप्न के निकट सरक रहे हैं जिसने ‘नाकोहस’ लिखवाई….

 

 

“गुंडे कह  कर, आप जिनकी भावनाएं आहत कर रहे हैं,  वे असल में बौनैसर हैं…’ ‘बौने सर या बाउंसर ? जो सर लोग हमें यहाँ लेकर आए हैं, देह से तो बौने के बजाय बाउंसर ही लग रहे थे,  हाँ, बुद्धि से…’‘इतना अहंकार उचित नहीं, मान्यवर। अहसान मानिए कि आपकी लद्धड़ बुद्धि फास्ट डेवलपमेंट के इस तेज-रफ्तार जमाने में अब तक बर्दाश्त की गयी है…बाउंसर नहीं, बौनैसर माने बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक, संक्षेप में बौनैसर…यू सी, हम कोई बुद्धि-विरोधी नहीं, बल्कि बुद्धि के रक्षक हैं…लेकिन यह अब नहीं चलेगा कि स्वयं को बुद्धिजीवी कहने वाले  भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली समाजद्रोही, राष्ट्रविरोधी हरकतें करते रहें…बुद्धि की मनमानी बहुत हो ली, बुद्धिजीवियों के सम्मान का तमाशा बहुत हो चुका, अब जरूरत है, अनुशासन की… भावनाओं की रक्षा की, इसीलिए बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक—बौनैसर—समाज की रक्षा तो करते ही हैं, यह ध्यान भी रखते हैं कि बौद्धिक कर्म अनुशासन-हीनता का रास्ता न पकड़ ले…याद रहे, इन समाज-रक्षकों के बारे में बकवास करना दंडनीय अपराध है..

 

 

 

“लोगों को सिखाने के लिए, उनके सीखने को ‘मॉनिटर’ करने के लिए राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण आयोग, राष्ट्रीय अनुशासन संस्थान, विवेक-पुनर्निर्माण समिति आदि का गठन किया गया ही है….हम नाकोहस वालों का अपना मैंडेट है…कुल मिला कर टारगेट यह—कोई भी नागरिक किसी भी हालत में अपने चरित्र को, दूसरों की भावनाओं को चोट ना पहुँचा पाए। एकांत खतरनाक है, एकांत  में सवाल पैदा होते हैं, सवालों से निजी दुख और सामाजिक उत्पात जन्म लेते हैं, सो….क्या कहते हैं आप इंटेलेक्चुअल लोग उसे…हाँ, कैथारसिस, विरेचन….मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी…सारे समाज के लिए रंग-बिरंगा, सुंदर कैथार्सिस मुहैया कराने के लिए तो छोटे से शुक्रिया के  मुस्तहक तो हम हैं ही…

Life of the text and that of the city…(my presentation to the India-China Writers meet organised by Sahitya Akademi, New Delhi 28th nov. 2014.)

Life of the text and that of the city…

          By Purushottam Agrawal.

 

 

 

Brian Clark’s play, ‘Whose life is it anyway…’ , is about the agency of choice. Who will decide whether a person suffering from paralysis neck down should be ‘allowed’ to end his ‘miserable’ existence or must continue to live, as life per se is ‘sacred’ and under no circumstances the individual himself can be given the authority to end it; even if it is his own.

Why should my mind have gone back to the performance I watched almost three decades back in Delhi? As a matter of fact, whenever I think of life and its inevitable corollary- death, the play comes back to me; even if I am thinking only of the influence of life on the creation of literature.  The question is valid here also- whose life we are thinking about when we talk of the ‘influence’ on literature?

Is it author’s own life or life of the text? The text has a pre-life even before it takes shape in the words chosen and arranged by the author. And, every writer and reader knows for a fact, that once having come into being a work of art surpasses the life of its creator.  We are concerned here with life which influences the process of this coming into being. Hence the question—whose life?

Is it only the author’s life limited as it is both by time and space or is it a life larger than the one experienced by the author? Is it only the ‘real’ life or something ‘more than real’ to recall the title of David Shulman’s recently published, fascinating history of imagination in south India?

Does the life directly experienced by writer alone influence the act of writing? Does the ‘direct’ experience really make a description or reflection more authentic? The ‘authenticity’ claims rooted in the ‘real, direct’ experience of the author are not exactly new. In the late fifties and early sixties, many writers were justifying exclusively middle class concerns and ethos of their writings  in the name of ‘authenticity of feeling’. Once again, it is claimed by many these days that only s/he who has suffered on the margins, as a woman, as a colored person or as a Dalit can relate ‘authentically’ with that experience and reflect upon its cultural importance. This stance might sound politically correct at the first glance, but will it sound so under a serious philosophical scrutiny? So far as literature is concerned, does this ‘aesthetics of authenticity’ really point to the way of authentic creation and reception?

In the first place, any writing is actually writing of the memory. You do not right the experience per se; you commit its recall to words and that with an obvious gap between the moment of experience and the moment of its recall. Some additions and deletions are natural corollaries of such recall. The moment of experience outgrows its raw ‘authenticity’ in the very process of creative recall. A writer might have suffered in his life on the margins of the society, but in most of the cases, at the moment of writing, s/he is already part of the middle classes. Writer’s vocation as a rule is a middle class one, and one’s identity by definition consists of multiple social roles and relations.  Emphasizing only the ‘cultural’ or ‘ethnic’ aspect of identity might be tempting as a strategic stance, and precisely because of this, it hides more than it reveals. The middle class writer recalls the experience of margins from the vintage point of middle class status. Does this fact have a bearing on her choice or not?

Any sense of ‘identity’ (in literature or in politics) is bound to lack in authenticity, if it is confined only to the cultural or ethnic aspects, ignoring the social class part of the story. To be frank, the identity discourse without a reference to the political economy of class-system is bound to end up in the company of historically reactionary politics, because it rejects the very idea of the commonalities of those sufferings which emanate from the social structures, and hence can be ameliorated only by a shared struggle. The politics of cultural identity with its exclusive emphasis on the difference has contributed to waning of shared dreams of emancipation.  Moreover, we all know only too well that a piece of writing is ultimately judged on the basis of the depth and width, which the writer has been able to give her/ his memories of life-experiences.

And it is not just the writer’s life and experience. The whole point of writing is the perspective you put your experience in; perspective which includes your consciousness of the collective memory as codified in the language of your choice, your sense of being in flow of a continuous praxis called tradition, and the acute, mostly agonizing dialogue with the moment of history you are placed in. Realizing the significance of such dialogue, Aristotle tried to make amends for his guru’s act of expelling the poet from the ‘City’. He recognized that, ‘poetry is more subtle and philosophical as compared to history as poem is a universal expression while history expresses a certain context’.

In other words, it is not your individual life, its experiences and memories, but the potential life of the literary work which plays the determining role in the act of writing. The writer has to go beyond his own life to bring creative work to life. The very act of writing and of reading as well, is an act of trans-migration of ‘self’- an act of ‘par-kaya pravesh’ (assuming the body of other) – to recall a telling phrase from the cultural vocabulary of India. (Incidentally, I had articulated this idea way back in 2000, in an essay written in order to ‘face’ the question- ‘what is literature?’).  The primary tool of this act of ‘assuming the body of other’ is of course, imagination which must be in the process of constant refinement. The classical Indian poetics has the right term for such imagination-Pratibha- etymologically signifying ‘illumination’. This illumination works on what the ends of literature and art- creative as well as receptive.

Those who know the Hindi  novel ‘Tamas’  by Bhisham Sahni can never forget the opening sequence wherein a character is slaughtering  a pig and the text is setting the tone of the disturbing narrative the novel is going to unfold. The scene was praised by everyone not only for its metaphoric suggestion but also for its vividness; in fact, it would not be that suggestive if it were not that vivid.

And the writer himself has this to say about the sequence, “I never had the opportunity to know someone in the profession of skinning the animals, neither had I ever witnessed a pig being slaughtered, had no idea of the process at all. In fact, before writing this episode, even after, I continued to try to get some idea, how a pig is actually slaughtered.”

It is the agonised dialogue between the imagination (both at writer’s and reader’s ends); the cultural memory and the sense of location in tradition and the concerns and ambitions of the individual writer that makes the life of the text possible.

Meer Taqi Meer active in the 18th century, witnessing the tumultuous events that condensed in themselves  historical cataclysm put it most succinctly. Let me end with that succinct and poignant admonition from the poet:

“O tearful eye, still in deep slumber/ open the eyelids a bit, deluge has inundated the city”.

(किन नींदों सोती है, चश्म-ए-गिर्यानाक़, मिज़गाँ तो खोल, शहर को सैलाब ले गया।)

We all have to open the eyelids to the deluges that are inundating the city…it is not just my life, but the life of the text and that of the city….

 

 

 

         

 

           

 

         

 

 

 

 

कबीर की कविताई पर व्याख्यान गार्गी कालेज, दिल्ली में

A look at state of higher education under Smriti Irani

http://www.governancenow.com/news/regular-story/a-look-state-higher-education-smriti-irani

my column in Governance Now

 

Asking for the moon…

-Purushottam Agrawal

 

The minister for Human Resource Development along with her mandarins and the vice-chancellors of all central universities was in two days retreat in September in Chandigarh. It is not surprising that the electronic media neither reported nor discussed the event. After all, it has fast ‘evolved’ from infotainment to unabashed comedy and live cockfighting. But, it did come as a surprise that this meeting was not reported adequately even in large sections of the print media.

Well, in defence of our journalistic class one has to say nothing dramatic or curious happened at this retreat. Given Modi’s ballistic campaigning and general pretense that his government is ‘different’ from all regimes independent India has seen (after all, ‘nothing’ happened in 60 years), the media was probably looking for some dramatic departures, some important disjunctions from the UPA policy framework on education.

What we got instead was smooth continuity, informed by a mindless technocracy, as far as higher education policy is concerned.

From the point of view of the future of our higher education, this continuity of perspective is very important. Departures would of course have been interesting, but continuity is curious, to say the least. One recalls the great detective who reminded Inspector Gregory, while working on ‘The silver Blaze’ case, that the fact that the dog ‘did nothing in the night-time’, was in fact the curious incident.

The continuity of UPA and NDA policies in many areas is becoming increasingly clear. In case of education the consensus amongst the ‘forward looking’ ruling elite had become clear decades ago when the nomenclature of the ministry was changed from education to human resources. Now, the state is not looking at educating its citizens, it is not investing in human individuals; rather it is investing in resources which happen to be ‘human’.

The liberal framework gave way to the managerial one even without a whimper in political circles, just as education was sought to be reduced to ‘science, technology and management’. In fact, there is little scope in such an approach even for science in its fundamental sense. There is hardly any enthusiastic encouragement from the official side for fundamental and ‘non-pragmatic’ research in science. For the ruling elite, corporate bosses and most of the middle classes in India these days, ‘science’ is nothing but a euphemism for useful technology.

Another shared trait between the NGO friendly, ‘inclusive’ UPA government and ‘no-nonsense’ nationalist one under PM Modi is the obsession with controlling everything  and propagating the great ideal of  ‘one size fits all’, in the sphere of  ‘human resource development’. The present minister, while paying lip-service to the idea of autonomy of universities, still got a draft ‘single act’ for all central universities circulated for ‘suggestions’. This act is based on the recommendations of the Pathan Committee, which was formed in 2013 (while Kapil Sibal was minister) with the clear mandate of suggesting ways of implementing the ministerial motto of one size fits all and had recommended, inter alia, doing away with the office of Chancellor, and having in its place a council of Vice-Chancellors headed by, no prizes for guessing, the minister for HRD!

There is not even the veneer of autonomy here – the government must control all aspects of university life. Another brain-wave, ostensibly ‘egalitarian’ and ‘democratic’ (and common to UPA and NDA dispensations) is to have common admission and common curriculum for all the central universities in order to facilitate ‘student and faculty mobility’. Again, the idea of only ‘Technology and Management’ being worthy of any serious consideration is implicit here. In the field of Humanities and Social Sciences, it will be an extremely harmful step. Even in science, technology and management, the inclinations and orientations of various departments do and should influence their research programmes and priorities.

In social sciences and humanities, at any rate, interpretations matter a lot, and institutions of higher learning make their distinct marks by offering different interpretations to the same or similar data. This diversity of views and approaches enliven the field of knowledge and enrich the collective wisdom of society. In education systems the world over, individual teachers are encouraged to offer new courses and identify new focus areas in the on-going teaching programmes every semester. In contrast, our political and administrative bosses want forty central universities to teach the same text, same poets, same set of research questions, same priorities to each and every student. If, by ‘common curriculum’, something else is meant, I would love to be enlightened.

Mr. Kapil Sibal also has to his credit the great idea of appointing vice-chancellors through advertisements and interviews. There is a whole world of difference between someone being nominated without having applied, and someone getting through after an interview. The Supreme Court has categorically stated that notwithstanding the funding from government, the relationship between government and university professors and vice-chancellors is not that of master and servant. Under the guidance of Mr. Sibal, for the newly established central universities, the nomination method was replaced with selection method in order to make the master-servant point in a subtle psychological manner to be followed with legal steps in due course. Once the idea of a single act and a council headed by the minister, governing the matters of all the central universities is put in practice, the Sibelian dream of ‘one size fits all’ would be happily realised. The gods of efficiency and good governance would have slayed the demons of independent and critical research and teaching.

If she wants to reform education, Ms Irani would do well to break from this Sibelian mould. Participating in a couple of TV debates about her suitability as the minister of HRD, as she does not possess higher degrees, I had made two points. First, in any democracy, ministers are supposed to provide direction and perspective, and this has nothing to do with higher degrees. In fact, the question of formal qualification is more pertinent in the context of high-level bureaucrats, i.e. IAS officers, who having passed one examination in life supposedly acquire expertise on everything from agricultural policy to rocketry to the finer points of pedagogy. Incidentally, in the mid-fifties, the administration in the education ministry was headed by a professor. Maulana Azad, as education minister, had appointed the distinguished academic Prof. Humayun Kabir as education secretary. It would be interesting to know when and how the IAS lobby captured this position. Ms Irani may look at the idea of reviving the practice of having experts run higher education in the country.

The second point I made, was about the standards of education, I believe that no human being can create more drift and confusion in our education system than what has been achieved by USA trained top class ‘intellectuals’ under the benign guidance of PM Manmohan Singh. Ms Irani can only take things in a better direction, provided she chooses to act differently and see through the designs of control-freak bureaucrats.

But, given the convergence of thinking on higher education between UPA and NDA as reflected during the Chandigarh retreat, one is probably asking for the moon.

talking with darling daughter on Kabir…

How about a national commission for hurt sentiments? – ( My monthly column in Governance Now)

This 23rd August was a sad day. We lost a great writer who was rooted enough in his tradition to interrogate aspects of it with courage and affection, and who was modern enough to challenge the dominant, Euro-centric conceptions of modernity, even while upholding its universal aspects and values both in his creative writing and in his role as a public intellectual. He was openly sceptical of much of ‘Indian writing in English’; and was one of the few non-English writers to be short-listed for the Man Booker award. His Praneshacharya (the hero of the novel, Samskara) typified the traditional/ modern Indian’s search of the moral core of his/her ‘Indian-ness’.  In his long career, U.R. Anantamurthy performed what the Hindi poet Muktibodh had described as Sabhyta Samiksha – a civilizational critique.

Apart from the loss of one of our finest writers and a noble soul, what makes the 23rd even sadder was that the demise of such a figure was ‘celebrated’ by the bursting of fire-crackers by some who wanted to punish him, even in death, for his forthright criticism of the politics of hatred and violence.

Like any reflective human being, Ananthamurthy’s ideas invite debate and criticism and there is no denying his critics their right of disagreeing with any of his ideas or expressions. The question is, whether this disagreement is to be articulated in the grammar of rational argument or in the rhetoric (and attendant violence) of ‘hurt sentiments’?  The matter assumes larger significance than the case of one individual, as we are fast turning our democracy, which is rooted in humane values, into a virulent mobocracy of hurt sentiments.

Those celebrating the demise of Anantamurthy quite expectedly belong to the ‘Hindutvawadi’ groups. The defence, if any, from the Hindutva forces is likely to be on equally expected lines: there was nothing organised or ordered from above, what happened was just ‘local’ and purely ‘spontaneous’. The point is:  this ‘spontaneity’ is much more ominous than a controlled spectacle. A few days back, I published a short story (in Hindi, the language of my creative expression). The story fantasises about a present wherein the discourse of hurt sentiments is systematically turned into pervasive social common sense under the supervision of NACOHUS (National Commission of Hurt Sentiments). In such a setup, people are perennially afraid and unconcerned about any suffering while society marches on following the glittering path of ‘development.’ Let us face it – Nacohus is not merely a fantasy, but a distinct possibility emerging out of the current depravity of thought and the pervasiveness of the discourse and politics of ‘hurt sentiments’.

Given their world-view, the Hindutva forces are more inclined than most others towards stigmatising their critics and opponents. They are also more persistent and systematic in persecuting chosen targets and victims in myriad ways. One can recall many names in this context from Romila Thapar to Habib Tanvir to M. F.  Hussian, and now having tasted success in their ‘pulp the books’ campaign, the Batras of the world are much emboldened under the present political dispensation.

However, I would like to leave aside the extreme Right for the moment, and focus on the role of those who claim a commitment to liberal democracy and take pride in the legacy of fundamental rights enshrined in the constitution? Is it not true that M. F. Hussain was subjected to well organised, country-wide legal harassment by extremist elements while the Congress was in power, and the ‘Padma-Vibhushan’ painter was forced to go into a self-imposed exile, getting no support from the party of Jawaharlal Nehru, or for that matter the party of Rammanohar Lohia?

‘Taslima must fall to her knees and apologise’- this was not a rant of some Maulana, but a statement from a Congress minister for Information and Broadcasting keen on furnishing his ‘secular’ and ‘progressive’ credentials by pandering to minority communalism. Under the same worthy Minister, the film ‘Da Vinci Code’ was pre-screened for the approval of Church ‘elders’. Such an act of ‘secularism’ did not take place even in Italy, the seat of Roman Catholic Church, or in any other Christian majority country. In this context, it is not surprising that the late Rajiv Gandhi took pride in the fact of India being the ‘first’ to ban the ‘The Satanic Verses’ by Salman Rushdie.

The same Salman Rushdie was supposed to attend the Jaipur Literary festival in 2012. Of course, the state government under the competent and politically smart Congress CM Ashok Gehlot did not ban his participation, but merely ‘advised’ him to not visit. The ‘advice’ was put in practice by informing the organizers that the state police could not guarantee Rushdie’s security. Rushdie was not allowed, because his mere presence at the festival (which incidentally he had attended in an earlier edition) was likely to ‘hurt the sentiments’ of the believers. So particular was the government about its benign advice that some authors were booked for the ‘offence’ of reading excerpts from the undesirable author at the festival, and of course, no action was taken against those who ‘purified’ the venue by offering namaz on the last day of the festival! I can personally vouch for the eager expectation and then despondency among the participants at the abdication of responsibility by the State Government, as I had the privilege to deliver the key-note address to this edition of the festival, which was focussed on the Bhakti and Sufi literature. I wondered and continue to wonder: would the secular-liberal congress have advised Kabir also to keep away from this festival and refrain from hurting the religious sentiments of the people?

The congress can also congratulate itself for adding section 66A to the IT act, and can derive satisfaction that after the Lok-Sabha elections, the Kerala Police under Congress leadership has been Numero Uno in booking those who dare say anything ‘offensive’ to the sensibilities of the admirers of the Prime Minister Modi on social media, and even in college magazines.

All this is not merely ‘appeasement’. These actions were a perversion of the idea of democracy and subversion of its functioning. Democracy is by far the best system of social and political organisation, because it is about choice based on informed debate and deliberation. It is distinct from mob-mentality as it not just about numbers and their manipulation but about division of powers amongst various organs of State. It is about the autonomy of individuals and institutions. It is about rule of law, as well as about the norms of civilised behaviour.

Freedom of expression, an essential pillar of democracy, is not some middle class luxury, but a crucial guarantee of an individual’s right to record his or her will. It is about the right to alternative point of view on any given matter. Far from being a privilege claimed by chattering classes, freedom of expression and social respect for creativity is a pre-condition for a truly humane society. The rhetoric of hurt sentiments and its uses for populist politics is bound to turn nightmares of the NACOHUS kind into reality sooner than we might expect