भय और क्रूरता की सांस्कृतिक ठेकेदारी का समकाल: ‘बनास जन’ ( मई-जून 2016) में प्रकाशित नाकोहस की समीक्षा युवा आलोचक शशिभूषण मिश्र द्वारा

भय और क्रूरता की सांस्कृतिक ठेकेदारी का समकाल

                                     

                                                                          शशिभूषण मिश्र

कालजयी रचनाकार की यह खासियत होती है कि वह न केवल अपने समय और परिवेश की बारीक से बारीक हरकतों पर नजर रखते हुए संभाव्य परिवर्तनों को सजगता से पहचानने की कोशिश करता है बल्कि उस समय की अचीन्हीं प्रतिगामी शक्तियों की निशानदेही भी करता है | इस प्रक्रिया में वह व्यथा और पीड़ा से लथपथ मूक विवशताओं को दर्ज करता उन कारणों तक पहुँचता है जिनके फलस्वरूप प्रतिरोध पस्त पड़ चुका है | कई बार रचनाकार को समय की दुरभिसंधियों और जटिलताओं की बहुआयामिता को प्रश्नांकित करने के लिए विधाओं और शैली की बनी बनायी हदबंदियों का अतिक्रमण करते हुए सृजन करना पड़ता है | हिंदी आलोचना में स्थापित हो चुके पुरुषोत्तम अग्रवाल का पहला उपन्यास ‘नाकोहस’ हमारे समय की ऐसी ही निर्मम सचाइयों का संश्लिष्ट विश्लेषण करता एक बहसतलब हस्तक्षेप है | कुछ रचनाएं ऐसी होती हैं जो अपने खोल से बाहर निकलकर हमारे जिए भोगे का हिस्सा बन जाती हैं | ‘नाकोहस’ एक ऐसा ही उपन्यास है जो समय-समाज की नब्ज टटोलता अपने आयतन में न सिर्फ समकाल की भयावहता को समेटे हुए है बल्कि भविष्य के संकटों का संकेतायन भी करता है |

जे.एन.यू.की पूरी घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया है | हाल के दिनों में वहाँ जो कुछ भी घटा है वह उसी सुनियोजित राजनीति का दुष्चक्र है जिसे ‘नाकोहस’ में गहरी अर्थव्यंजनाओं के साथ व्यक्त किया गया है | इसे संयोग कहा जा सकता है कि रचना में जिन दुरभिसंधियों की ओर लेखक ने संकेत किया है ;  वह इसके  प्रकाशन के महज कुछ ही समय बाद जे.एन.यू. में घटित होती हैं किन्तु इसे केवल संयोग मान लेने से यह सच नहीं झुठलाया जा सकता कि एक अंतर्दृष्टिपरक लेखक भविष्यद्रष्टा की तरह आगामी संकटों की अनुगूंजों को महसूस कर हमें पहले से ही आगाह कर देता है | उपन्यास के पूरे विमर्श को जे.एन.यू.के घटनाक्रम से वाबस्ता करने पर हम देख पाते हैं कि कुकुरमुत्ते की तरह उग आए बौनैसर (बौद्धिक-नैतिक समाज रक्षक) तबके ने सांस्थानिक प्रगतिशीलता को अपनी जद में लेने की मुहिम शुरू कर दी है | जे.एन.यू. एक विश्वविद्यालय भर नहीं है वह  इस पूरे राष्ट्र के सम्मान का प्रतीक भी है और निश्चित तौर पर विचारों की स्वतंत्रता को यहाँ हमेशा तरजीह दी जाती रही है | उपन्यास के तीन मुख्य किरदारों –सुकेत,रघु और शम्स को भी इसी विचार स्वातंत्र्य की कीमत चुकानी पड़ती है | जब स्वयं व्यवस्था द्वारा ही इस साजिश को  सुनियोजित ढंग से संचालित किया जा रहा हो ,ऐसे में किसी भी प्रकार के न्याय की उम्मीद करना बेमानी है |

यह समय ही आभासी है ; जो जैसा हमें दिखता है असल में वह वैसा होता नहीं और जो है वह दिख नहीं रहा है | छद्म और चकाचौंध के बीच असलियत छितरा गई है ,रौंद दी गयी है | पूंजी के सूत्रधारों द्वारा छेड़े गए इस भूमंडलीय अभियान में ऐसी मिथ्या निर्मितियां तैयार की गईं हैं जहां सब कुछ गड्ड-म-गड्ड नजर आता है | रचना के शैल्पिक गठन में जो जादुई-सा यथार्थ दिखता है वह केवल एक कलात्मक प्रयास नहीं है बल्कि आभासी सा दिखता इस जगत का प्रतिरूप है | यह बाजार के फैलाए जादू (मिथ्याभाष) का प्रतिपक्ष है जो बहुवचनात्मकता में व्यक्त होता है | सर्ररियलिज्म के प्रतिनिधि चित्रकार के रूप में ख्याति अर्जित करने वाले साल्वेडार डाली के व्याख्याकार आंद्रे ब्रेंतां की महत्वपूर्ण स्थापना को यहाँ रेखांकित करना चाहूंगा-“चेतना का एक स्तर वह भी होता है जहां जीवन और मृत्यु ,वास्तविकता और काल्पनिकता,अतीत और भविष्य के अंतर्विरोध समाप्त हो जाते हैं |” इस रचना को इस सन्दर्भ में भी देखे जाने की जरूरत है | बाजारवादी शक्तियों,सत्ताधारियों और धर्म के महाप्रभुओं की कदमताल की ठोकर से जो ध्वंश हुआ है उसके कारण जीवन के बुनियादी सवाल हाशिए पर चले गए हैं | धर्म ,नस्ल और जाति की अगम्य संरचना का बाहरी खोल कमजोर पड़ने के बजाए और मजबूत हुआ है | रचना की समूची घटनात्मकता में पसरा अँधेरा हमें मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ की  याद दिलाता है , जिसमें चहुँओर  घुप्प अन्धकार की भयावहता का चित्र हमें अन्दर तक हिला देता है |

उपन्यास भय के वातावरण से शुरू होकर लोकतान्त्रिक राष्ट्र के विचारशील नागरिकों की असुरक्षा और विवशता का जायजा लेता पाठक के अन्दर मंत्रबिद्ध बेचैनी छोड़ जाता है | लेखक ने हिन्दू धर्म के एक पौराणिक मिथक का रूपक लिया है जिसमें मगरमच्छ द्वारा हाथी पर प्राणघाती हमला किए जाने पर हाथी की पुकार सुन स्वयं नारायण अवतरित होकर मगरमच्छ का अंत करते हैं | समकालीन सन्दर्भों में इस मिथक का प्रयोग करते हुए लेखक ने सर्वग्रासी शक्तियों के प्रतीक मगरमच्छ के रूप में यह दिखाने की कोशिश की है कि किस तरह  सरेआम गलियों में घुसकर वह अपनी ताकत का बेजा  प्रदर्शन कर रहा है |  राष्ट्र,राज्य, समाज,व्यक्ति सब उसकी शक्ति से डरे हुए हैं | मगरमच्छ उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रतिक्रियावाद  के गर्भ से उपजी सोच का प्रतीक है जिसने अपना सुरसा विस्तार किर लिया  है | यह बर्बरता, भय और असीमित शक्ति का प्रतीक है जिसने नागरिक जीवन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है – “सुरक्षा की छांव तक ले जाने वाली उसी गली से एक मगरमच्छ आ रहा है –दुम इत्मीनान से मटकाता हुआ ,गली की छाती पर मठलता हुआ…| ”(पृष्ठ-09) भाषा की टोन में यहाँ उस तनाव को महसूस किया जा सकता है जो सपने के दौरान  सुकेत के अन्दर पैदा हुआ है | हाथी की एक टांग मगरमच्छ चबाता जा रहा है और  हाथी चीख रहा है,छटपटा रहा है किन्तु उसकी चीख सुनने के बाद भी भीड़ उसे अनसुना कर देती है | हाथी को बुद्धिजीवी-विवेकशील व्यक्ति का प्रतीक माना जा सकता है | इस रूपक के माध्यम से उपन्यास  उत्तर-आधुनिक व्यक्ति-समाज की प्रवृत्ति को लक्षित करता अपनी बढ़त में कई सवालों से मुठभेड़ करता है | मसलन  जिसे हम ‘समाज’ कहते हैं क्या वह अपना अस्तित्व खोता जा रहा है ! क्या मूकदर्शक भीड़ ने समाज को प्रतिस्थापित कर दिया है ! विडंबना यह कि इतना सब होने के बावजूद  सुरुचिसम्पन्न होने का ढोंग करते थकता नहीं |

रचना  का प्रारंभ  सुकेत के इसी डरावने स्वप्न से होता है और नींद खुलने के बाद भी सपने का वह भय  उसका पीछा नहीं छोड़ता | जगने पर वह पाता है कि भीड़ उसके घर को घेरे हुए कभी एंटी नेशनल प्रोफेसर के नारे लगा रही है तो कभी उनके बीच से कोई चीखती आवाज में कहता है- जला दो,मिटा दो | हम कैसे भूल सकते हैं कुछ ही वर्ष पहले उज्जैन में हुई प्रोफेसर सभरवाल की हत्या का वीभत्स खेल | दरअसल सुकेत का दोष यह है कि उसके लेख से लोगों की भावना आहत हुई  है और  इसी की प्रतिक्रिया में उसे सबक सिखाने के इरादे से बौनैसरों की फ़ौज इकट्ठी हुई  है | उपन्यास की  केन्द्रीय समस्या है- अभिव्यक्ति की आजादी और उससे  आहत बौनैसरों का प्रतिशोध | इसी प्रक्रिया का  रणनीतिक हिस्सा है ‘नाकोहस’ यानी  नेशनल कमीशन आफ हर्ट सेंटीमेंट्स का गठन | सुकेत के साथ उसके ईसाई मित्र रघु और मुस्लिम मित्र शम्स भी उसी  युनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं जिन्हें भी  अभिव्यक्ति की आजादी के कारण कई शारीरिक और मानसिक यातनाओं से गुजरना पड़ता है | सुकेत,रघु और शम्स लोकतांत्रिक राष्ट्र की प्रगतिशील सोच का प्रतीक हैं | आलोचना की फार्मूलाबद्ध एप्रोच यहाँ रघु  और शम्स की धार्मिक पहचान पर सवाल उठा सकती है किन्तु यहाँ स्पष्ट कर देना जरूरी है कि ये तीनो चेहरे बाहरी तौर पर धर्म या सम्प्रदाय के रूप में अलग-अलग होते हुए भी एक ही चेतना के हिस्से हैं, तीनो के डी.एन.ए.का रसायन एक-दूसरे से इस कदर घुला-मिला है कि उसे अलगाकर नहीं देखा जा सकता | उपन्यास अपनी बढ़त में दिखाता चलता है कि किस तरह शोध संस्थानों पर हमले हो रहे हैं , बहुमूल्य पांडुलिपियाँ जलाई जा रही हैं | शब्दों से आहत हो जाने वाली भावनाओं के डर से फिल्मों के नाम बदले जा रहे हैं और उनसे गीत हटाए जा रहे हैं , फिल्म रिलीज होने से पहले धर्मगुरुओं से अनुमति ली जा रही है | भावनाओं के आहत होने का विस्फोट सा हो गया है जिधर देखो उधर ही कोई परंपरा के नाम पर तो कोई धर्म या संस्कृति के नाम पर आहत है | सुकेत प्रश्न करता है कि- “ परंपरा,संस्कृति और धर्म के नाम पर चल रही हिंसक राजनीति के विरुद्ध पालिटिकल आर्ग्यूमेंट में हर्ट सेंटीमेंट्स का क्या सवाल है ?” (पृष्ठ-13)

  

सुकेत का भीड़ द्वारा विरोध एक सोची समझी रणनीति की अतिरेकी कार्रवाई का हिस्सा था | इस घटना के साथ हम उसी विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले कई शिक्षकों के माध्यम से यह देख पाते हैं कि सांस्थानिक प्रगतिशीलता के क्षरण के मूल में कौन से कारण विद्यमान हैं | लेखक मारे जा रहे हैं ; पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं ; कार्टून बनाए जाने पर तूफ़ान खड़ा हो जाता है ; पेंटिंग बनाने वाले कलाकारों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है ; आगजनी की घटनाएं हो रहीं है ; और न जाने क्या क्या ! उपन्यास के इन दृश्यों से गुजरते हुए सहसा बाबुषा कोहली की कविता ‘हुसैन की निर्वासित देवी के लिए’  स्मृति में कौंध जाती है,जिसमें वह लिखती हैं –“संसार भर के शब्दकोष उलट पलट दो /तब भी न समझ आएगा नग्नता और नंगई का अंतर /उंगलियाँ कट गिरें या गले रेत दिए जाएं / फिकिर किसे ? / माँ / एक बात बताओ न / सभ्यता के बुनकरों ने कपड़े लत्तों के सिवाय और क्या बुना है ?”  सभ्यता के यही तथाकथित  बुनकर हैं जिन्हें लेखक बौनैसर के रूप में रेखांकित करता है जो हमारे चारो ओर बेतरह उग आए हैं- भारतीय संस्कृति की रक्षा का बीड़ा उठाए | संस्कृति-रक्षा के इस अभियान में शामिल ये आहत बौनैसर लोगों को जिन्दा जलाने में भी संकोच नहीं करते | उपन्यास ऐसी विकृत मानसिकताओं की निर्मितियों की पहचान करने के क्रम में हमें वैश्विक चिंताओं से भी रू-ब-रू कराता है | विचारों के दमन की अतिवादी सोच से उपजा नफ़रत का गारा भौगोलिक सीमाओं को पार कर पूरी दुनिया में फैला हुआ है | यदि हम गत दशक में आस्ट्रेलिया,इटली,इंग्लैण्ड,जर्मनी और यू.एस.ए.में  दूसरे मुल्कों  के लोगों पर हुए हमलों, हत्याओं और मानसिक यातनाओं के मूल में जाएं तो पाएंगे कि मूकदर्शक बना वहाँ का पूरा तंत्र इसी मानसिकता का शिकार है | लेखक प्रश्न करता है – “ क्या कभी ऐसी कोई व्यवस्था बन पाएगी जिसके निर्माण में किसी इंसानी पहचान से नफ़रत का गारा न इस्तेमाल किया गया हो ?” (पृष्ठ-99)

उपन्यास के कथानक का विस्तार इन तीनों मित्रों की आपसी बातचीत और चिंताओं की आवाजाही में होता है | यहाँ प्रेम,आलिंगन,धोखा सिगरेट-शराब और  मस्ती की  स्मृतियों के बीच दलित अत्याचार,हिंसा,मारपीट,धर्म की दुकानदारी,बाबाओं का पाखण्ड,ग्लोबल विलेज की अनुगूंजों को सुना जा सकता है | इन गंभीर चर्चाओं के बीच तीनों ही मित्रों के मन के कोनों में गहराते भय की देह को महसूस किया जा सकता है | नाकोहस की अगली रणनीति  है – अभिव्यक्ति की आजादी  से दूसरों की भावनाओं को आहत करने वाली इस तिकड़ी को जड़ से  उखाड़ फेकना | इसी के मद्देनजर इस तिकड़ी को बौनेसरों द्वारा जबरन उठा लिया जाता है और तब हमारा सामना उस ‘गिरगिट’ से होता है जिसके पास फ़रेब,तिकड़म,गुंडागर्दी,चालाकी, साम्प्रदायिकता के सारे हुनरों  का लम्बा अनुभव है | सुकेत,रघु और शम्स को गिरगिट द्वारा अपने कारिंदों से जबरन घर से उठवाकर इस यातनापूर्ण और घुटन से भरी सुरंग में लाया जाता है | ‘नाकोहस’ के इस ‘नियंता’ गिरगिट द्वारा चेतावनी भरा फैसला सुनाया गया, जिसका सार है – वक्त रहते सुधर जाओ…इंटेलेक्चुअल छोड़ टेक्नेक्चुअल बनने की कोशिश करें…बौनैसरों की सुनें…सदा सुखी रहें…आदि-आदि | तो यही है ‘नाकोहस’ रूपी समकाल-कथा का पाठ जो इस रचना से निकलकर दबे पाँव हमारे भीतर उतर जाता है और ताबड़तोड़ रंग बदलते इस गिरगिट की बेरहम आँखों से टपकती निर्लज्जता और घृणा, फुफकारते थूथन से निकलती हिंसा ,लपलपाती जीभ से बाहर आता जहर और उसकी निर्मम मुस्कान हमें बेचैन कर देती है |

‘नाकोहस’ हमारे समय का संकट है जिसे लेखकीय विकलता के रूप में हम इस उपन्यास की संरचना में विन्यस्त पाते हैं | यहाँ भाषा की अनेकानेक भंगिमाओं में पूरा दृश्य एक दु:स्वप्न–कथा की तरह उभरता है, जहाँ केवल आभास होता है और वह आभास भी उलट-पुलट, अचकचाया-सा है | इस संकट ने समय के सवालों को निरस्त कर नेपथ्य की खूंटी में टंगा दिया है , उलझा दिया है | नाटकीय दृश्यों और शिल्प के बहुविध प्रयोगों में यहाँ तर्क-वितर्क के पल पल बदलते दृश्य हैं | उपन्यास का ढांचा कथा के बने बनाए ढब को तोड़ता है | इसे यथार्थ का जादू कहें या जादुई यथार्थ की उलटबासी या फिर अतियथार्थवाद ! इसका लगभग समस्त  उत्तरार्ध विमर्शपरक और संश्लिष्ट है जिसमें पूरे समकाल का हौलनाक यथार्थ समाया है | यहाँ उपन्यासकार का आलोचकीय नजरिया ज्यादा हावी दिखाई देता है जिसके चलते पाठक कई बार सहज पाठ-बोध से विच्छिन्न  महसूस करता  है |

दूसरी पहचान के लोगों का खून बहाना,उन्हें अपना घर-गाँव छोड़ने पर मजबूर करना,शरणार्थी कैम्प की निर्ममताएं और बेचारगी की मर्माहत स्थितियां रचना की अंतर्वस्तु में पैबस्त हैं | यहाँ धर्म पर,तंत्र पर और उसकी विचार-सरणि पर सवाल करने की सख्त मनाही है | सत्यनारायण पटेल की कहानी ‘काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस’ की चर्चा यहाँ बेहद प्रासंगिक होगी, जिसमें फिल्म क्लब के माध्यम से बिजूका मनुष्यता के बीच बढ़ती धार्मिक कड़वाहट को पराजित करने की जद्दोजहद में डटा है किन्तु बौनैसरों की तरह यहाँ भी धर्म की दुकानदारी करने वाले उसे काफिर ठहरा देते हैं | प्रोफेसर हमज़ा कुरैशी बौनैसरों की सेना के ‘बौ’ का  प्रतिनिधि चरित्र हैं | वह  धिक्कार भरी भाषा  में बिजूका से सवाल करते हैं –“आप कौन होते हैं धर्म के नियम कानून पर बात करने वाले ?” रेखांकित किया जाना चाहिए कि उन्हीं प्रोफेसर के इशारों पर उनके प्रिय शागिर्द बाबा द्वारा  फातिमा के चेहरे पर तेज़ाब फेंका जाता है | सांप्रदायिक सोच से पनपी विचलित कर देने वाली तमाम स्थितियां-घटनाएं इसी तरह ‘नाकोहस’ में भी दर्ज हैं | एक बेहद संजीदा सवाल लेखक यहाँ उठाता है जिसकी नोटिस ली जानी चाहिए – “ खून में नहला दी  गयी वह स्त्री रघु की चेतना में सवाल बनकर अटक गयी थी , रहम…दया…मर्सी…हर धर्म गुण गाता है, हर परंपरा इसके गीत गाती  है…हकीकत इतनी बेरहम…अपने-अपने भगवान को करुणानिधान सब कहते हैं…हकीकत में कहाँ घुस जाती है करुणा ?” (पृष्ठ 93)

  

गौर किया जाना चाहिए कि भूमंडलीय पूँजी की लोभी संस्कृति ने विकास के नाम पर जिस तरह लूट मचाई है उसमें जनकल्याण का मुखौटा पहने हमारी सरकारों की भी मिलीभगत है | सब कुछ जल्दी से भकोस लेने वाले हप्पू विकास की असल नीयत को बेनकाब करना हमारा दायित्व है | गिरगिट के रूप में हम  धर्म,संस्कृति,सत्ता और विकास को अपनी मुट्ठी में रखने वाले इसी तंत्र को पाते हैं जिससे हम चारो ओर से  घिरे हुए हैं | ‘नाकोहस’ इनकी नुमाइंदगी करता है और सभ्य नागरिक समाज के लोगों को सुधर जाने की कड़ी हिदायद देता है  -“खैर, होगा इस बीमारी का इलाज भी होगा | काम चल ही रहा है | राष्ट्रीय चरित्र निर्माण आयोग ,राष्ट्रीय अनुशासन संस्थान ,विवेक पुनर्निर्माण समिति का गठन किया गया है | नाकोहस  यानी आहत भावना आयोग है ही…टारगेट यह कि –कोई भी नागरिक किसी भी हालत में अपने चरित्र को और दूसरों की भावनाओं को चोट न पहुंचा पाए,एकांत और फिजूल सोच-विचार की खतरनाक जकड़ में न आने पाए…| ”(पृष्ठ-123)

उपन्यास का ऊपर से अंतर्विरोधी लगता यथार्थ हमारी कारस्तानियों का ही अक्स है जिसे इतनी तलस्पर्शी साफगोई से कह पाना लेखकीय उपलब्धि है | समय-समाज के  भीतर उतरते जाने की इस यात्रा में रचनाकार धर्म-संस्कृति के तथाकथित ठेकेदारों और लम्पट ताकतों की हठधर्मिता और घेरेबंदी से मुठभेड़ करता , हमसे  इनके प्रतिपक्ष में खड़े होने की गुहार लगाता है |

नाकोहस(उपन्यास),पुरुषोत्तम अग्रवाल,राजकमल प्रकाशन, दिल्ली,प्रथम संस्करण,2016,पृष्ठ-164,मूल्य-150 रु.

समीक्षक-डॉ०शशिभूषण मिश्र,सहायक प्रोफेसर-हिंदी,राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,बाँदा (उ.प्र.)                    मोबा.-9457815024,ई-मेल-sbmishradu@gmail.com

कट्टरता का प्रत्याख्यान- नाकोहस…’कादम्बिनी’ के सितंबर अंक में युवा आलोचक पल्लव की समीक्षा

कट्टरता का प्रत्याख्यान 
पल्लव 
आज़ादी के सत्तर वर्षों में विकास के साथ जैसा समाज बनता गया है उस समाज में नफरत और हिंसा की जगह बढ़ी ही है। इस नए दौर में जब भावनाएं इतनी कमज़ोर हो गई हैं कि जरा जरा सी बात में आहत हुई जा रही हैं तब यह सोचना अत्यंत कठिन है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल आज़ादी का आंदोलन नहीं था अपितु वह सांस्कृतिक आंदोलन भी था जिसने हमारे लिए आधुनिकता का दरवाज़ा खोला। पुरुषोत्तम अग्रवाल का पहला उपन्यास ‘नाकोहस’ हमारे इस बदरंग और मुश्किल दौर का चित्र बनाने का प्रयास है, जिसमें आधुनिकता के स्थान पर परम्परा और मध्यकालीन बर्बरता को उचित ठहराने की गुंडई की जा रही है । छोटी से कथावस्तु के सहारे भी उपन्यास अपने उद्देश्य में सार्थक यात्रा कर सका है तो इसका कारण यह है कि लेखक बदरंग दृश्यों को आकर्षक बनाने में ऊर्जा लगाने के स्थान पर पाठक को बौद्धिक उन्नयन के लिए तैयार करता है। इस कट्टरताप्रेमी बौनेसर (स्वयंभू बौद्धिक – नैतिक समाज रक्षक) समाज को बौद्धिकता से इतना डर है कि यह डर घृणा और हिंसा में बदल गया है। उपन्यास के तीन पात्रों सुकेत, रघु और शम्स को बौनेसर अगवा कर ले जाते  हैं और यंत्रणाएं देते हैं। ये यंत्रणाएं असल में अभियक्ति को कुंठित करने वाली धौंस और गुंडागर्दी है जो विश्व भर में कट्टरपंथी ताकतों द्वारा उदारता के सनातन विचार के सामने आ खड़ी हो गई हैं। इनका नारा है – इंटेलेक्चुअल होना पाप है, टेकनेक्चुअल सबका बाप है’। उपन्यास का प्रारम्भ एक मगरमच्छ द्वारा निरीह हाथी को भंभोड़ने से हुआ है तो आगे गिरगिट का विशाल और घिनौना बिम्ब है। उपन्यास असल में परमपरा, संस्कृति और धर्म के नाम पर चल रही हिंसा के विरुद्ध बौद्धिक प्रत्याख्यान है।

अकारण नहीं कि उपन्यास में एक स्थान पर सवाल आया है –  ‘क्या कभी ऐसी कोई व्यवस्था बन पाएगी जिसके निर्माण में किसी इंसानी पहचान से नफ़रत का गारा न इस्तेमाल किया गया हो ?’ नाकोहस का आशय है नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स ! यहाँ लाए गए इन तीनों मित्रों को गिरगिट की हिदायत देखिये – ‘उम्मीद तो है कि आप तीनों अब सुधर जाएंगे… नहीं तो… आप जानें… वैसे, यू मस्ट एप्रिशिएट द फैक्ट कि आपके साथ नाकोहस ने कमाल की नरमी बरती है… बस जरा से दस्तखत, दस्तखत भी क्या, इनिशियल्स ही तो किए गए हैं, आप लोगों की बॉडीज पर… डू यू रियलाइज सर… कि जितना वक्त आपने नाकोहस के फ्रेंडली इंटरएक्शन में बिताया, जितना आपको वहां ले जाने, वापस पहुंचाने में लगा, यानी कुल मिलाकर आप तीनों जितनी देर इस किस्सा-ए-नाकोहस में रहे, बस उतने ही अरसे में एक जाने-माने बुजुर्ग इंटेलेक्चुअल भारत में भगवान को प्यारे हो गए, और एक अरब में अल्लाह मियां से मिलने भेज दिए गए…’ उपन्यास केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं है और अग्रवाल इसे सचमुच कथा बनाते हैं। यहाँ सुकेत के असफल विवाह और प्रेम की कहानी है तो शम्स की बातें जिस भाषा में आई हैं वह देर तक याद रह जाने की क्षमता रखती हैं। यही नहीं उसका खिलंदड़ापन बौद्धिक समाज की जिजीविषा का प्रतीक बनकर आता है जो मार खाकर भी स्वभाव नहीं छोड़ सकता। प्रो बख्शी जी और पुलिस वाला चौड़ा सिंह जैसे एक बार ज़रा सी देर के लिए आए पात्र भी असर छोड़ने वाले हैं। इस दृश्य में मीडिया कहाँ है, उपन्यास बताता है – ‘तेजी से दौड़ती कर की खिड़कियों पर इस पल बीते कल के अक्स नहीं, आज की ब्रेकिंग न्यूज़ की परछाइयाँ डोल रही थीं, बल्कि टूटी पड़ रही थीं।’ विडम्बनाओं और त्रास के मध्य नष्ट हो रही सामाजिकता को उपन्यास एक झन्नाटेदार टिप्पणी बनकर ही दिखा सकता है।

नाकोहस(उपन्यास) – पुरुषोत्तम अग्रवाल,
राजकमल प्रकाशन, दिल्ली,प्रथम संस्करण,2016
पृष्ठ-164,मूल्य-150 रु.

393, डीडीए, ब्लॉक सी एंड डी
शालीमार बाग़, दिल्ली – 110088                           मो 8130072004

कुछ शब्द एक सिलसिले में

कितना भव्य शोर भयानक

एकान्त अकेला विवश

 

चहुंदिसि शोर
कविता में खोज
भीतर सन्नाटा

क़िस्सा दामिनी की दूसरी मौत और हम सब की बेबसी का….’वसु का कुटुम’….मृदुला गर्ग के उपन्यास की समीक्षा ( ‘हंस’ में प्रकाशित)

 

प्रचलित विधा विभाजन में आप इसे लंबी कहानी कहें या छोटा उपन्यास, ‘बोल कर लिखवाया गया’ ‘वसु का कुटुम’  असल में ठेठ क़िस्सा है, तवील नहीं मुख्तसर सा क़िस्सा। लेकिन यह क़िस्सा बनावट में जितना मुख्तसर है, सरोकार में उतना ही वसीह और बुनावट में उतना ही सघन।

इसे लिखे जाने का क़िस्सा बयान करते हुए मृदुलाजी ने लिखा है, “ प्रतिरोध, परकाया प्रवेश और रसोक्ति (आइरनी)—ये तीन तत्व मेरी सभी रचनाओं के अभिन्न अंग रहे हैं।” लेखिका के इस कथन को यदि कसौटी मान लें, तो बेधड़क कहा जा सकता है कि ‘वसु का कुटुम’ इन तीनों तत्वों को भरपूर धारण करते हुए भी, मृदुला गर्ग की रचनाशीलता के सर्वथा नये, और किसी हद तक अप्रत्याशित प्रस्थान की सूचना देता है। स्त्री-पुरुष संबंधों की विडंबनाओं की मार्मिक, अभावुक पड़ताल के लिए ख्यात लेखिका द्वारा नये विषय का अनुसंधान नयी भंगिमा और नये रूपाकार में करना अनुभवपगी वरिष्ठता के साथ युवाओं सरीखे जोश और एडवेंचर के प्रेरणाप्रद संयोग का रेखांकन भी है।

क़िस्सा मुख्तसर है,  एक पुराने घर की जगह मकान बनवाया जा रहा है। आस-पास के लोगों की समस्याओं की परवाह किये बग़ैर, क़ायदे-क़ानून को ध्वस्त करते हुए मकान का निर्माण हो रहा है। इस निर्माण से शुरु कर यह क़िस्सा बहुत सी चीज़ों के बनने और बिगड़ने की नवैयत का बयान करता है, अंदाज़े बयाँ पहले पैराग्राफ में ही साफ हो जाता है—

“ बी.के.सपोत्रा घर बनवा रहे हैं। अच्छा कर रहे हैं। घर बनवाओ, सबाब लो। परिवार वालों को बारिश-लू से पनाह मिले। निजता पले। बच्चे जन्म लें। दरोदीवार ज़िन्दगी की क़शिश से सरोबार हो। मज़ा आ जाए जो घर में एक बगीची भी हो, भले छोटी सी। खाद डाल मामूली सब्ज़ी फूल उगाए जाएँ। भिंडी-बैंगन-टमाटर तो उगाए ही जा सकते हैं। वह भी नहीं तो हरा धनिया और लौकी-करेले की बेल सही। मिट्टी की छुअन और आसमान का नज़ारा इन्सान होने के गुमान को पुख्ता करते हैं। यह तसल्ली भी बनी रहती है कि खुले में सोने की मजबूरी नहीं है। जब चाहो, छत के नीचे पनाह ले सकते हो। मन हो, बाहर बने रहो, न हो तो भीतर जा संग-साथ निभाओ या अकेले क़िताब पढ़ो। बच्चों, बड़े-बूढ़ों को सुरक्षा दे, ऐसा घर बनाना सचमुच सबाब का काम है। ख़ासकर तब,जब घर ऐसी ज़मीन पर बने जिसे बंजर जान खेती में न लगाया गया हो। पेड़ भी न काटने पड़ें और रंग चोखा जमे। ग़लत कह गई। बंजर दरअसल कोई ज़मीन होती नहीं; पानी-खाद दे मशक्कत करो तो और कुछ नहीं, कीकर बबूल तो उगाया ही जा सकता है। बथुआ लोभिया भी बशर्ते पाँव तले ज़मीन हो।

मैं जबर ग़लती कर गई। बी.के.सपोत्रा घर नहीं, मकान बनवा रहे हैं।”

कहन की विडंबना और शिल्प के जादू को बरतरफ करके देखना चाहें तो क़िस्सा बस इतना है कि बी. के. सपोत्रा बनाए जा रहे घर के आस-पास बाड़ नहीं लगा रहे, रात-रात भर काम करा रहे हैं, लोग धूल मिट्टी और शोर से होने वाली परेशानियाँ ही नहीं, नींव के गड्ढे में गिरने के खतरे भी झेल रहे हैं, दमा की मरीज एक झक्की सी औरत —दामिनी—इस बात का विरोध करते-करते एकाएक मर जाती है। उसका वैसा ही अजीब सा ‘मित्र’ राघवन; रत्नाबाई और नजमा के साथ मिलकर उस एनजीओ से जबावतलब करने की कोशिश करता है, जिसने दामिनी के इलाज के नाम पर चंदा किया और वह चंदा गायब हो गया। एनजीओ की कर्ता-धर्ता मीरा राव के जीवन  और उनके एनजीओ का मोटो है—‘वसुधैव कुटुंबकम्’— जो रत्नाबाई के मानीखेज रूप से ‘ग़लत’ उच्चारण में बन जाता है—‘वसु का कुटुम’। दामिनी तो मर गयी, उसके नाम पर चंदे का क्या हुआ—यह सवाल पूछती रत्नाबाई  खुद उस एनजीओ के दफ्तर में, “ श्मशान घाट में तांडव करते शिव” की तरह  नाचती मर जाती है। इसके बाद मामला टीआरपी संभावनायुक्त हो जाता है और टीवी की बहसों में कुछ दिन गर्म रहता है। इन बहसों की नदी कुछ ही दिन में इस खास मामले को छोड़ विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के व्यापक “ कौवा रोर” के सागर में समा जाती है; और क़िस्सा आपको बताता है कि, “ यह पूरी कहानी हम कह तो गए, मगर सभी जानते हैं कि सब कुछ रहेगा वही का वही…तो जब सब जानते हैं तो हम बार-बार उसे क्यों दोहराएँ?”

‘ वसु का कुटुम’ पढ़ते हुए लेबनानी लेखक राबी आलमदीन का उपन्यास ‘हाकावाती’ याद आता है। ‘हाकावाती’—इस शब्द का अर्थ ही होता है—क़िस्सागो। ‘वसु का कुटुम’ उतने विस्तृत फलक को नहीं छूता, लेकिन जितने तक स्वयं को सीमित रखता है, उस फलक पर अनुभव और स्मृति के सधाव को निभाता बखूबी है। इस सधाव में बात को कहने के लिए ‘भाषा को यथार्थवादी’  ढंग से बरतने की बजाय लेखिका का आग्रह पाठक की स्मृति और कल्पना को संबोधित करने का है।

दिल्ली के कुख्यात सामूहिक बलात्कार कांड की शिकार दामिनी ( मीडिया के एक हिस्से के अनुसार निर्भया) जैसे इस उपन्यास की ‘नायिका’  के रूप में ‘अवतरित’ हो गयी है। इस विचित्रता की व्याख्या के लिए वह उस बलात्कार कांड का एक ‘काउंटर फैक्चुअल’ क़िस्म का नैरेटिव भी राघवन को सुना देती है कि वह लड़की असल में जीवित बच गई थी, और “इसी शहर में एक नौकरी लेकर बस गई। और कोई नाम होता तो लोग उसमें दामिनी को ढूंढते, मगर क्योंकि नाम दामिनी था, जो उन्हीं का दिया हुआ था, जो असली नहीं था, जो किसी को नहीं था, इसलिए उन्होंने दामिनी को नहीं ढूंढा।”

याने दामिनी जीवित है, उस भयानक बलात्कार के बावजूद, फिर से लड़ने के हौसले के साथ जीवित है, क्योंकि जैसा कि राघवन और रत्नाबाई की बात में साफ होता है, “ भइया जिसे मार-मूर कर गेर दिया जावे, उसे किसी का डर नहीं रहता और वह बहुत जीवट की हो जाती है।”

बी.के. सपोत्रा के विरुद्ध लड़ाई पूरी नहीं होती कि दामिनी के इलाज के नाम पर लोगों से चंदा वसूलने वाले एन.जी.ओ. की कारगुजारियाँ सामने आने लगती हैं। राघवन ने अपनी बेटी के ब्याह के लिए जो गिन्नी बचा कर रखी थी, उससे दामिनी-फंड की शुरुआत होती है, और फिर वह गिन्नी उसी तरह गायब हो जाती है जैसे नागरिकता का बोध। क़िस्सा अपने ठेठ खिलंदड़े अंदाज़ में कुछ सचाइयाँ याद दिलाता है, जिनके सामने बेबसी इस वक्त की भारतीय नागरिकता की सबसे डरावनी सचाई बनती जा रही है।

‘वसु का कुटुम’ मानवीय संवेदना के छीजने को ही नहीं रेखांकित करता, वह अपने विशिष्ट देशकाल में नागरिकता के बोध और उसके संस्थानों—क़ानून, प्रेस, तथाकथित सिविल सोसाइटी—की सड़ाँध को भी उजागर करता है। वसुधैव कुटुंबकम् के नारे पर चलने वाले ‘बेकायदा’ नामी एन.जी.ओ.को सपोत्रा साहब चंदा देते हैं, वह एन.जी.ओ. उनके बिजनेस में पैसा लगाता है, अंधाधुंध ब्याज के लालच में। मीरा राव का कहना है, “ हो सकता है, वो ग़ैर-क़ानूनी माना जाए। मगर मैं मानती हूँ, क्योंकि यह काम समाजसेवा के लिए हो रहा था, इसलिए उसमें क़ानून को टाँग अड़ाने की ज़रूरत थी नहीं।”

किसी भी तरह अपने लिए कुछ हासिल करने की होड़, बहती गंगा में हाथ धोने की ललक, स्वाभाविक ही है कि समाज के इलीट तक सीमित न रह कर सब तरफ व्याप रही है। दामिनी की समर्थक नजमा अपने लिए स्कूटी का जुगाड़ कर लेती है, और हिन्दीशजी अपने लिए टीआरपी का। स्वयं उनकी चमक फीकी न कर दे, इसलिए वे चपरासी रामलखन को दोबारा पैनल डिस्कसन में बुलाते ही नहीं। इधर सारी बहस चलती रहती है, आरटीआई होती रहती है, रामलखन के सपोत्रा का बेटा होने का दावा किया जाता है; सपोत्रा बनते मकान  से गिर कर मर जाता है… उधर ग़ैर-क़ानूनी ढंग से बन रहा मकान बन भी जाता है, उसके तल्ले  सपोत्रा के बेटे द्वारा अलग-अलग लोगों को बेच भी दिये जाते हैं, अब जिसे जो करना है, कर ले।

क़िस्से की ‘सीख’ पाठक को रामलखन के शब्दों में ही प्राप्त होती है, “ करना यह चाहिए कि चाहे अनुमति-पत्र मिले या न मिले, आप धड़ल्ले से मकान बनवा डालिए। मगर याद रखिए, जब मकान पूरा हो जाएगा तो आपको मरना पड़ेगा। जब आप मर जाएँगे तो आपके उत्तराधिकारी पर आपके अवैध कर्मों का कोई उत्तरदायित्व नहीं होगा।”

क़िस्सा ख़त्म होता है, रत्नाबाई-पुत्र लल्लन की भविष्यवाणी से, “ यही रामलखन हमारे देश का अगला प्रधानमंत्री होगा। और तब? तब बहुत कुछ बदल जाएगा, देश का नक्शा बदल जाएगा!”

क़िस्सा आखिर में यह भी बता देता है कि, “यह लल्लन ने कहा नहीं, सिर्फ सोचा। कहा हमने।”

“ मर गया तेरे वसु का कुटुम। मर गया जालिम सपोत्रा…” इस घोषणा के साथ “ …नाच रही थी महापिशाचिनी, उस सजे-सँवरेस महँगे कमरे के बीचोबीच”——यह सूचना देता क़िस्सा कहता है, “ हम जानते हैं कि जो हम दिखला रहे हैं, वह शोभनीय नहीं है। बहुतों के सौंदर्यबोध को आहत कर सकता है। मगर हम क्या करें, जो कर रही है रत्नाबाई कर रही है, हम नहीं। हो सकता है, वह महाकाली का अवतार हो धरती पर। और आप जानते हैं कि महाकाली तो आपके शोभनीय की छाती पर ही अपना घमासान किया करती हैं। उनके हुँकार में सौन्दर्यबोध नहीं होता। उनके हुँकार में होता है तांडव। उनके हुँकार में होता है, प्रलय।”

पढ़वा तो यह क़िस्सा खुद को लेगा ही। ऐसी ही किताबों के लिए अंग्रेजी में कहते हैं, ‘अनपुटडाउनेबल’। पढ़ने के बाद, आपका मन प्रलय और तांडव का इंतजार करने का होता है, या उसके पहले, बदलाव की दिशा सोचने का…वह आप पर है…

-पुरुषोत्तम अग्रवाल।

उदासी का कोना

यह कहानी आउटलुक में छपी थी, पिछले साल, मई 2015 में….यहाँ लेट लतीफी में एक साल से भी ज््यादा अरसे  के बाद….

 

उदासी का कोना।

 

उमेश शोक-सभा में आ तो  गया था, लेकिन बेमन से। उसे कवि का ना कवित्व पसंद था, ना व्यक्तित्व; ना परिवार पसंद था, ना परिधान। उमेश भी साहित्य की दुनिया का नागरिक था; लेकिन स्वर्गीय कवि और उमेश के नागरिकता-कार्डों के रंग जुदा-जुदा थे।

कवि को उमेश ने साहित्य से परिचय के शुरुआती दिनों में पढ़ा था। वे दिन प्रेम से परिचय के भी शुरुआती दिन थे। वे दिन बचपन और किशोरावस्था के मध्यांतर के दिन थे। ऐसे दिनों में पढ़े गये कवियों के साथ पाठकीय संबंध सूख जाने के बाद भी, कुछ नमी तो छोड़ ही जाता है।  लेकिन, यहाँ आने के पीछे वह नमी नहीं, सामाजिक मजबूरी थी। बाबूजी कहते थे ना, ‘किसी के अच्छे-बुरे में नहीं जाओगे तो तुम्हारे यहाँ कौन आएगा? समाज ऐसे घरघुसरेपन से नहीं चलता…’

सच्ची बात। घरघुसरे बने रहे तो तुम्हारे संग्रह के लोकार्पण और तुम्हारे जीवन के शोकार्पण में कौन आएगा?

शोक-सभा वैसी ही थी, जैसी होती है। क्षति भाषण देने वालों के लिए भी अपूरणीय थी, लेने वालों के लिए भी। हालाँकि उपस्थितों की संख्या से लग रहा था कि कुछ ही दिन बाद खुद साहित्य की शोक-सभा होने वाली है। कवि का कवित्व और व्यक्तित्व वैसे ही अद्वितीय था, जैसे पिछले दिनों स्वर्गीय हुए लेखक का था; जैसे अगले दिनों स्वर्गीय होने वाले आलोचक का होने वाला था। जैसे कुछ बरस बाद खुद उमेश का होने वाला था।

‘बशर्ते कोई अकादमी या लेखक संघ या हिन्दी विभाग अपन को शोक-सभा लायक माने…’

उमेश शोक-मग्न मुद्रा अपनाने के बहाने, कलाई माथे के पास लाकर दो-तीन बार घड़ी देख चुका था। यह अनुभवसिद्ध निष्कर्ष था कि एक घंटा शोक-मग्न रहने के बाद सभा से पलायन कर जाएँ तो आपकी लोक-प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। इससे कम समय में चल देना लोकाचार का उल्लंघन है।

भाषणों से ऊबी  घड़ी की सुइयाँ भी सुस्त ढंग से घिसट रहीं थीं। उस वक्त तो एक-एक पल एक-एक युग जैसा लगने लगा जब एक भाषणकर्ता ने कवि की निहायत छद्म-आध्यात्मिक कविताएँ ताबड़तोड़ उद्धृत करना शुरु कर दिया। भाषणकर्ता उन कविताओं में मनुष्य की आध्यात्मिक प्यास बुझाने वाली रस-धार देख रहा था; उमेश की चेतना ऊब के रेगिस्तान में भटक रही थी…

एकाएक रेत की खुरदुरी जलन के बीच स्मृतियों का सोता फूट पड़ा। स्टैंडिंग-लैंप की हल्की पीली रोशनी के नीचे, उमेश की जिज्ञासु आँखों के सामने बैठी वह इन्हीं कविताओं को पढ़ रही थी। उमेश को छद्म-अध्यात्म नहीं, अपनी बेचैनियाँ सुनाई पड़ रही थीं। लैंप की पीली रोशनी के नीचे बिताईं कृतज्ञता की शामें शोक-सभा से ऊबी  शाम को हौले से परे करतीं, उमेश की स्मृति में बहने लगीं। अभी तक बनावटी लग रही काव्य-पंक्तियों में जीवन के सच्चे अनुभव और पंक्तियों के बीच की खाली जगह में स्मृति की व्याप्तियाँ गूंजने लगीं।

उसी ने पढ़वाया था इस तथा अन्य कई कवियों को। उस प्रेम में जितनी दमित कामनाएं थीं, उतनी ही जिज्ञासा भी। उमेश के साथ उसके संबंध में जितनी चाहत वर्जित फल चखने की थी, उतनी ही साहित्य, कला, संगीत में साझेदारी करने की। उमेश के बचपन और किशोरावस्था के मध्यांतर के वे दिन ऐसे थे जिनमें उमेश नदी का द्वीप था, और वह उसे आकार देने वाली स्रोतस्विनी।

नदी द्वीपों को आकार देती आगे बढ़ जाती है, द्वीप पीछे छूट जाता है।

‘नदी नहीं, आगे बढ़ता है नदी का पानी। जो पानी पीछे से आ रहा है, वह भी तो नदी ही है ना? नदी कहाँ बढ़ी आगे? वह तो वहीं है, द्वीप के साथ; उसे सहलाती, उसे आकार देती’। कहती थी वह, ढाढस बँधाती हुई, जब उमेश संबंध की परिणति की कल्पना कर घबराता था।

पूरे पंद्रह बरस बड़ी थी वह उमेश से।

वे दिन चालीस बरस पहले थे। नदी भी आगे बढ़ गयी, द्वीप भी। दिशाएं भी बदल गयीं, गंतव्य भी। स्मृतियों की कौंध फीकी पड़ती गयी। जिन लकीरों के बारे में विश्वास था कि अंत तक जस की तस खिंची रहेंगी, वे अंत की ओर बढ़ती यात्रा में धुंधलाती-धुंधलाती अदृश्य सी होती गयीं। हम कैसी कैसी कामनाओं, कल्पनाओं का बोझ स्मृति पर डालना आरंभ कर देते हैं कि अंत तक सँभाल कर रखे। क्यों रखे, भई?

  कहाँ होगी वह? उसी नगर में? किसी और नगर, देश में? या…

अब शोक-सभा में बैठे रहना असंभव था, एक घंटा पूरा हुआ हो, ना हुआ हो। उमेश यों फुर्ती से उठा कि बाहर निकलेगा और वह मिल जाएगी; या आधा मील चल कर उसके घर पहुँचा जा सकेगा। चालीस साल का फासला सड़क पर चलकर नहीं, केवल यादों में चलकर ही तय होता है …जानता था, उमेश। इस वक्त बस वह एकांत चाहिए जो स्मृति का अभयारण्य बन सके। बैठूँ कहीं जाकर एकदम अकेला। छू लूँ  कृतज्ञता की शामों की, आवेश भरे आलिंगनों की, अप्राप्ति के विषम सुखों की, विफल कामनाओं और निष्फल प्रार्थनाओं की, पंद्रह बरस बड़ी स्त्री से प्रेम पाने-करने के रोमांच और अटपटेपन की स्मृतियों की नदी को—जो फिर से द्वीप को सहलाने, आकार देने चली आई है।

सीढ़ी तक भी नहीं पहुँच पाया था कि टीं..ईं…ईं। यह कोई मैसेज था, सीढ़ी उतरते उमेश का हाथ अपने आप जेब तक पहुँच गया; फोन हाथ में। मैसेज में आश्वासन था, स्मार्ट सब-सिटी में बढ़िया फ्लैट कौड़ियों के मोल दिलाने का। उमेश इस वक्त उदास स्मृतियों के नगर जाना चाहता था, स्मार्ट सिटी की तरफ नहीं। उसने इतनी जोर से डिलीट बटन दबाया जैसे आश्वासन-दाता का गला घोंट रहा हो। फोन जेब में रखा ही था कि टिड़िंग…टिड़िंग…यह फेसबुक पर किसी ने कुछ किया था। उमेश से रहा नहीं गया, आखिर आज दोपहर में ही तो उसने अपनी ताजा कविताएं फेसबुक पर जारी की थीं, पाठकीय प्रतिक्रिया की उपेक्षा कैसे कर दे? लेकिन, यह तो किसी जलकुकड़े की बकवास थी—‘क्या मुसीबत है, यार, आदमी सलीके से उदास तक नहीं हो सकता…’ फेसबुक से बाहर निकलते उमेश ने सोचा… ‘कुछ देर के लिए आभासी संसार से बाहर ही चला जाए’।

‘ लेकिन अगर उस फेलोशिप एप्लीकेशन के बारे में ईमेल आ गयी तो…?’

टिंग..टिंग…यह आवाज ईमेल की ही सूचना दे रही थी। उमेश से रहा नहीं गया। देखा, एप्लीकेशन के बारे में नहीं, यह तो हिन्दू भारत के लिए तड़पते-तड़पते अमेरिका में जा बसे किसी देशभक्त की ईमेल थी, ‘तुम जैसे स्यूडो-सिकुलरों के कारण ही तो भारत देश और सनातन धर्म की यह हालत हो गयी है…’

धत्तेरे की…फोन बंद किये बिना उदासी में जाना असंभव है। उमेश अभी इमारत के लॉन तक ही पहुँचा था। यह शाम वैसी नहीं थी जैसी उसे याद आ रही थी। यह बदले वक्त की, बदले मौसम की शाम थी। आज दिन भर जरा धूप क्या चमकी, बादलों ने शाम को घेर लिया था। बेमौसम बारिश की मार से फसल मर रही थी; संभ्रांत लोग मौसम के सुहावनेपन पर रीझ कर, सोशल मीडिया पर ‘आओ थोड़ा रोमांटिक हो जाएं’ के आव्हान कर रहे थे। हद है असंवेदनशीलता की। फोन बंद ही करना होगा, तभी उन शामों तक लौटा जा सकता है जो अगस्त में अगस्त की शाम थीं, और अप्रैल में अप्रैल की। लौटना ही है उन शामों की ओर, पाना ही है अपना उदास एकांत।

बाहर आते ही—सामने कावेरी…’हाय..उमेश…’,

‘ अरे, कावेरी, इतने दिनों बाद…’।

लिपट गये दोनों। इतनी अच्छी दोस्त…इतनी प्यारी स्त्री।

‘कॉफी पियें?’

‘ हाँ, हाँ, क्यों नहीं…’कहते कहते उमेश को  झटका सा लगा…नहीं, इस वक्त नहीं। इस वक्त वह एकांत जो बरसों से नहीं नसीब हुआ है…वे यादें जो इसरार कर रहीं हैं।

‘ फिर कभी, कावेरी। कल ही। फोन करता हूँ, अभी कहीं जाना है…’

‘ऐज यू विश, बॉस…इंतजार करूंगी…’

कावेरी—कितनी प्यारी, कितनी बिंदास। लेकिन आज तो बस उन मासूस दिनों की यादों का दिन है। कविगण कहते आए हैं ‘लरिकाई कौ प्रेम’ भुलाए नहीं भूलता…आज इस कविसमय को सिद्ध करने का दिन है। पीली रोशनी के उस नीम-अंधेरे कोने में प्रवेश करने का दिन, उसके स्वर में इन्हीं ‘छद्म-आध्यात्मिक’ कविताओं को सुनने का दिन…

अपने प्रिय बार के अलावा कहाँ वैसा कोना? चंद कदम की दूरी ही तो है उदासी के नीम-अंधेरे कोने और बैमौसम अंधेरे से सने सड़क के टुकड़े के बीच…

उस कोने तक पहुँचने के पहले ही वह कृपादृष्टि उस पर पड़ी जिसकी प्रतीक्षा बरसों से थी, ‘आइये, उमेशजी, आइये… क्या कविताएँ लिखी हैं इधर आपने…अगला लेख आप पर ही लिखना है…’

‘विश्वास नहीं हो रहा…’ उमेश का मन था उस नीम-अंधेरे कोने की तरफ…दिमाग था, इस कोने में । उस कोने में एक नीची कुर्सी पर स्मृति बैठी थी, इस कोने में ऊँचे बार-स्टूल पर आलोचना विराजमान थी। उस कोने में लरिकाई के प्रेम का शोक-गीत था, इस कोने में शानदार शोक-सभा  की संभावना थी।

‘मैंने मैसेज करके तारीफ की है, अभी कुछ ही देर पहले तो… मैसेज मिला नहीं क्या?’

‘मैसेज?’ फोन तो मैंने बंद कर रखा है, कभी नहीं करता…आज इस उदासी के चक्कर में…बाद में देखेंगे उदासी…आलोचक की कृपादृष्टि हो गयी तो अपनी उदासी में और न जाने कितनी उदासियाँ गूँज उठेंगी…बैठा जाए। स्मृति के उदास कोने का क्या? वह तो अपने हाथ है, कभी भी जा बैठेंगे उदासी के कोने में’।   

स्मृति का नीम-अंधेरा कोना विस्मरण के अंधेरे में चल दिया है, लरिकाई का प्रेम हमेशा की तरह इंतजार में ठिठक गया है। उमेश ने बार-स्टूल खिसकाया है, फोन ऑन कर लिया है, आलोचक की ओर कृतज्ञ मुस्कान रवाना करते हुए ड्रिंक ऑर्डर कर दिया है।   

  

   

 

नाकोहस..

नाकोहस नावल की पहली प्रति दिसंबर 2015 के पहले दिन हाथ में आई थी, अगले ही दिन अलीगढ़ मुस््लिम यूनिवर्सिटी में इसके कुछ हिस््सों का पाठ किया था…और पिछले सप््ताह सूचना मिली कि राजकमल इसके दूसरे संस््करण की तैयारी कर रहा है…पाठकों का आभार। नाकोहस जब कहानी के रूप में आया था, इस  बार काफी बहस हुई थी, कुछ लोगों को बहुत अच््छी लगी थी कहानी तो कुछ को इस लायक भी नहीं कि कहानी कहला सके। खैर, अपनी अपनी राय। 

इतना जाहिर है कि समाज में नाकोहस किस््म का मानस तो बनाया गया है, बनता जा रहा है, हम में से कुछ लोग इसे देखना ना चाहें, उनकी मर्जी, आहत भावनाओं के नाम पर समाज को एक डरावने अंधेरे में ठेलने की कोशिशें जारी तो हैं। उपन्यास के रूप में नाकोहस को बहुत सराहा गया है, कुछ मित्रों ने विस््तृत तो कुछ ने संक्षिप््त टिप््पणियों के जरिए इसका विश््लेषण भी किया है। इन टिप््पणियों को यहाँ आपसे साझा कर रहा हूँ, एक एक करके…

इस तरह, यह इस बेवसाइट की फिर से शुरुआत भी है, जिसे पिछले कई महीनों में मैंने अपडेट ही नहीं किया था। 

तो, सबसे पहले, श्रेष््ठ कवि, प्रखर आलोचक और समर्पित समाज-कर्मी अशोक कुमार पांडेय का आलोचनात्मक लेख। यह पाखी के मई 2016 अंक में छपा है, और जनपक्ष ब्लॉग पर भी है। 

नाकोहस पढ़ते हुए कुछ फुटकर नोट्स

मगर चिराग़ ने लौ को संभाल रखा है[1]

  • ·        अशोक कुमार पाण्डेय

—————————-

नाकोहस जब कहानी के रूप में आई थी तब इस पर टिप्पणी करते लिखा था – “समय का बदलना अक्सर महसूस नहीं होता. उसे कुछ प्रतीकों के सहारे पढ़ना होता है. और यह “पाठ” भी क्या होता है? दरअसल यह जितना पढ़ी जाने वाली चीज़ में होता है उतना ही उस ज़मीन में भी जिस पर खड़ा हो के उसे पढ़ा जा रहा है. यानी हमारी अपनी “नज़र” पर. बकौल साहिर “ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है/ क्यूं देखें ज़िन्दगी को किसी की नज़र से हम.” यू आर अनंतमूर्ति की मृत्यु के बाद के उल्लास और पटाखों को कोई गौर से देखे तो यह किताब जालाये जाने, लेखकों पर हमलों, मक़बूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग्स फाड़े जाने के क्रम में तो थे लेकिन अपनी अभिव्यक्ति और सार में यह एक “गुणात्मक छलांग” थी. महात्मा गांधी की मृत्यु पर बंटी मिठाइयों के बाद यह पहला सार्वजनिक गिद्धभोज था, याद कीजिए हुसैन के मरने पर भी यह दृश्य नहीं देखा गया था. इस तरह यह एक पुख्ता प्रतीक था, हमारी ज़मीन से देखें तो फासिज्म के विजय उद्घोष का और उनकी ज़मीन से देखें तो अच्छे दिनों का.  “नाकोहस” इसी नई हकीक़त का एक आख्यान है.”

और देखिये इन कुछ महीनों में कितना कुछ बदल गया. अपने देश मे दादरी से जे एन यू तक, रोहित वेमुला से ऋचा सिंह तक, पटियाला कोर्ट परिसर से बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और ग्वालियर तक फ़ासीवाद अपनी विजय का उन्मुक्त उद्घोष करता विचर रहा है तो अमेरिका जैसे मुक्त बाज़ार वाले देश मे डोनाल्ड ट्रम्प खुलेआम अपनी घोर दक्षिणपंथी नीतियों के साथ ताल ठोंक कर भूमंडलीय नेता बनने की रेस मे है. अम्प्टन सिंक्लेयर ने फासीवाद को“पूंजीवाद + हत्या” कहा था और आज चार सू जो मंज़र है वह इसकी सख्त ताक़ीद करता नज़र आता है. ऐसे में नाकोहस अब जब उपन्यास के रूप में आया है और अपने फलक को और व्यापक करता हुआ वक़्त की तस्वीर और उसके पाठ, दोनों को और अधिक स्पष्ट करता है, तो इस पर ज़रा तफ़सील से बात करना ज़रूरी हो जाता है.

देखें तो नाकोहस की कहानी मुख़्तसर सी है. एक कॉलेज के अलग अलग धर्मों के तीन प्रोफ़ेसर दोस्त जो धर्मनिरपेक्ष हैं, मुखर हैं और लगातार साम्प्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ हैं, सत्ता के एक गोपनीय संगठन नाकोहस यानी  नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटीमेंट्स द्वारा गिरफ़्तार किये जाते हैं, उनका उत्पीड़न होता है और फिर उन्हीं हालात में चेतावनी के साथ उन्हें वापस छोड़ दिया जाता है. तीन लाइनों की इस कहानी के कोई एक सौ साठ पन्नों में आप किसी ‘औपन्यासिक’ उतार चढ़ाव और रहस्य रोमांच की उम्मीद करते हों तो निराश होने की पूरी संभावना है. नाकोहस की कथा इसके विषय वस्तु सी खुरदुरी है, जिसमें घटनाएँ नहीं एक मुसलसल बहस और जद्दोजेहद है. यह पूरा उपन्यास हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन की इस विडंबना को आहिस्ता आहिस्ता दर्ज़ करता जाता है और उसकी भयावहता को पाठक के दिल-ओ-दिमाग में पैबस्त करता जाता है. पन्ना दर पन्ना यह देश के लोकतांत्रिक ढाँचे में लगती दीमकों और उसके ढहते कंगूरों की शिनाख्त करता चलता है. असहमतियों को देशद्रोह में तब्दील कर देने वाले समय के तमाम बिम्ब असुन्दर होने के लिए अभिशप्त हैं तो यह उपन्यास अपने खुरदुरे शिल्प के साथ, जो न क्लासिकल अर्थों में फैंटसी या जादूई यथार्थवाद जैसी तकनीकों से परिभाषित किया जा सकता है, न ही सपाटबयानी कहा जा सकता है, एक प्रतिरोध की तरह, एक प्रतिआख्यान की तरह उपस्थित है जहाँ बहसें कथा का स्थान लेती जाती हैं, क्रूरताएं और उनसे उपजी आशंकायें रोमांच का. अपनी पूरी संरचना में यह शिल्प नया भले न हो लेकिन इस समय की भयावहता को उसकी सूक्ष्म पदचापों के साथ पहचानने और पाठकों तक संप्रेषित करने में काफी हद तक सफल है. उपन्यास की भाषा पर थोड़ी बात आगे की जायेगी.

नाकोहस का कोई अर्थ नहीं बनता. अर्थ बनाने की कोई सचेत कोशिश भी नहीं दिखती. इसके कारिंदों के लिए उपयोग किया गया पदबंध “बौनेसर” भी क्लबों में अनियंत्रित होने वाले अतिथियों को नियंत्रित करने वाले समानधर्मी“बाउंसर” से ध्वनि साम्य के बावजूद कोई अर्थ नहीं देता.  पर कहानी में ये अपनी उपस्थिति से, अपने नाम मात्र से जैसे रीढ़ की हड्डियों में एक सिहरन पैदा कर देते हैं, इसके विपरीत ये वस्तुतः अर्थहीन पदबंध हैं. यही इसकी व्यंजना है. दक्षिणपंथ के अपने तंत्र में उपस्थित ऐसी संरचनाएं, जो बाहर से दिखती ही नहीं, जिनका अस्तित्व एक सभ्य समाज में निरर्थक है, पूरे समाज को इतने गहरे प्रभावित करती हैं. आप देखिये प्रशांत भूषण पर आक्रमण करने वालों के हाथ में भगत सिंह सेना का बैनर था. भगत सिंह और साम्प्रदायिक ताक़तों का बैनर! मनसे को याद कीजिए. तर्कबुद्धि कहेगी,एकदम निरर्थक, एकदम बकवास. अनुभव कहेगा, हिंसक, भयानक, हत्यारे! यहाँ कथा की अनुपस्थिति  इस नए समय की उपस्थिति है. जहाँ सब कुछ इतना आवेगहीन, ठंढा और पूर्वनिर्धारित है कि कोई कुतूहल नहीं जगाता,कोई कथानक, कोई उतार चढ़ाव नहीं, एक सीधी सपाट रेखा पर चलता हुआ वह स्वाभाविक सा लगता चला जाता है. धीरे धीरे फासिज्म का दर्शन सहज स्वीकार्य होता चला जाता है. हम मान कर चलते हैं कि “भड़काऊ भाषणों” या“दंगों” या “स्नूपिंग” के कितने भी सबूत आ जाएँ, केस हो जाएँ लेकिन कुछ होना नहीं है. हम न पुलिस की कार्यवाही की प्रतीक्षा करते हैं न अदालत के आदेश का. अब फैसले टीवी बहसों और सड़क की गुंडागर्दी से होते हैं जहाँ संत-साध्वी-महंत-मौलवी अपने विषाक्त धर्मादेश बेखटके देते रहते हैं. गोएबल्स की ज़रुरत तक ख़त्म होती जाती है और लोग पहली बार ही आत्मविश्वास से बोला गया झूठ स्वीकार कर लेते हैं, भले ही सच की तरह नहीं. चंद टीवी चैनल और अखबार पूरे विश्वास से झूठ को लगातार दिखाते हैं और एक भीड़ सड़कों पर नारे लगाते उतर आती है जो किसी पर कहीं भी हमला कर सकती है, उनके लिए क़ानून और पुलिस उपस्थित होकर भी अनुपस्थित हैं या यह कहें कि उनके द्वारा छोड़ा गया स्पेस जिन्होंने साधिकार कब्ज़ा कर लिया है. वे सत्ता के बगलगीर हैं और न्याय के स्थानापन्न. उनके पास तर्क नहीं हैं परन्तु निष्कर्ष हैं- अप्रश्नेय निष्कर्ष. इस उपन्यास पुरुषोत्तम अग्रवाल ने बहुत गंभीरता से संचार माध्यमों के हमारे मानस और स्पेस पर कब्ज़े को रेखांकित किया है, जिस पर आगे विस्तार से बात की जाएगी. ज़ाहिर है, इस आख्यान को भी ऐसा ही होना था. यह न उतार चढ़ाव और किस्सागोई की शक्ल में आ सकता था, न ही किसी एकालाप की शक्ल में. चेखव की एक कहानी एक क्लर्क की मौत याद आती है. कोई मार्केज की क्रानिकल भी याद कर सकता है और कामू की द स्ट्रेंजर भी. नाकोहस का निरर्थक होना और उसका इस क़दर वर्चस्व अपने आप में एक व्यंजना रचता है.

नाओमी क्लेन अपनी किताब द शॉक थेरापी में अर्जेंटीना के यातना शिविर में चार महीने गुज़ारने वाले मारियो बिलानी को उद्धृत करती हैं. वह कहते हैं, “मेरा सिर्फ़ एक लक्ष्य था – अगले दिन तक ज़िंदा रहना. लेकिन सिर्फ़ ज़िंदा रहना नहीं, बल्कि जैसा हूँ वैसे बने रहना. जैसा हैं वैसा बने रहना – यह चुनौती सुकेत की भी है, रघु की भी और शम्स की भी. नाकोहस के यातना शिविर मे गुज़ारे कुछ घंटों मे ही नहीं बल्कि अपने सुरक्षित घरों के हर झरोखे मे आँख लगाए बौनेसर आँखों के बीच रहते भी।  यह यातना शिविर  किसी एक जगह तक महदूद नहीं है बल्कि हमारे पूरे पब्लिक और प्राइवेट स्पेस मे पसर गया है। नाकोहस सिर्फ़ शरीर को चोटिल नहीं करता. वह दिमाग और दिल पर भी कब्ज़ा करता जाता है. लोकतंत्र के भ्रम के भीतर चेतनाओं पर नियंत्रण का हिंसक उपक्रम करती दक्षिणपंथी राजनीति सुनहले लबादों, पवित्र शब्दों और ख़ूबसूरत प्रतीकों की आड़ में आती है. उपन्यास के शुरू में ही शम्स कहता है, “जो भी आमादा है, वह गले में कुत्तोंवाला पट्टा पहनाने पर आमादा है…हिल डुल पर कोई रोक नहीं, बशर्ते दुम साथ में हिलती रही…भौंकने की भी इजाज़त, बशर्ते चेन मज़बूती से उसके हाथ में थमी रहे…’ उसके बाद आये रघु के “लेकिन” के बाद के वाक्य को पूरा करने वाले शब्द कहीं नहीं थे. यह जो निःशब्दता है, जो बेबसी और बेचैनी है, यह उपन्यास उस बेबसी और बेचैनी का ज़िंदा दस्तावेज़ है तो उसके बाद का जो हँसी मजाक है वह इस अमानवीय वातावरण में मुखालिफ़त करते लोगों की लाचारी भी है और हिम्मत भी.  नियंत्रण की ये कोशिशें कई कई स्तरों पर चलती हैं. घर घर में पहुँचे टी वी चैनल और हर हाथ को काम की जगह मिले मोबाइल सेट चौबीसों घंटे आपकी चेतना के चोर दरवाज़े तलाशते रहते हैं, रिमोट के सहारे नियंत्रण का आपका भ्रम टूट जाता है. याद कीजिये जे एन यू की हालिया घटना जब फ़र्ज़ी वीडियोज और चयनित रिपोर्टिंग के सहारे टीवी चैनल्स ने उन्माद का ऐसा माहौल बना दिया है कि जे एन यू के लिए ऑटो करने पर ऑटो वाला कहता है सीधे पाकिस्तान क्यों नहीं जाते? याद कीजिये मेरठ के पास बनाई जा रही हिन्दू सेना से जुडी कोई बीस साल की लड़की का वह बयान जिसमें सेकंड्स में व्हाट्सेप के ज़रिये कई लाख लोगों तक अपने ज़हरीले सन्देश पहुँचा देने की गर्वोक्ति है. मुजफ्फरपुर दंगों के समय पकिस्तान के एक वीडियो के सहारे रातोरात दंगों की आग लगा देने की घटना याद कीजिये. सुकेत जब कोशिशों के बावज़ूद टीवी चैनल नहीं बंद कर पाता है या मोबाइल की स्क्रीन पर नाकोहस का कब्ज़ा कुछ ऐसा होता है कि वह उसके मन की बात भी जान लेता है तो याद कीजिये फेसबुक की टाइमलाइन पर दर्ज वह सवाल : आपके दिमाग में क्या है? अस्सी के दशक में लिखी नोम चोमस्की की विश्वप्रसिद्ध किताब “मैन्यूफेक्चरिंग कंसेंट” इस अवधारणा को बहुत विस्तार से बता चुकी है. वियतनाम युद्ध सहित तमाम घटनाओं के दौरान जनता की अवधारणा को कैसे मिथ्या या अर्ध सत्यों और दुष्प्रचारों  के सहारे सत्ता के पक्ष में निर्मित किया जाता है इसे तबसे आज तक दुनिया भर में लगातार देखा गया है. अभिव्यक्ति की आज़ादी के नारे के  साथ अस्तित्व में आये “मुक्त” संचार माध्यम मुक्त बाज़ार की तरह ही अपने मालिक के ग़ुलाम होते हैं और उसकी विचारधारा को लगातार इकलौती सही विचारधारा तथा बाक़ी सबके विरोधी नहीं शत्रु होने का जो द्वैत रचते हैं वह अंततः समाज में स्वतंत्र सोच और प्रतिरोध की सारी संभावनाओं के दमन के लिए आवश्यक जनमत निर्मित करता है. यही वह जनमत होता है जो खुलेआम पटियाला कोर्ट में कन्हैया की पिटाई से लेकर कलबुर्गी की हत्या तक को नज़रंदाज़ करता है. यह खाना, पहनना, बोलना, लिखना सब नियंत्रित करने की हिंसक हठ लिए संस्कृति के उद्धारक के वेश मे आई सांस्कृतिक सेना को न्यायसंगत सिद्ध करने वाला जनमत है, और उसे सही न मानते हुए भी चुप रह जाने वाला भी।

कमाने, खाने और आनंद मनाने को नाकोहस मनुष्य के लिए ज़रूरी और पर्याप्त काम घोषित करता है तो सुखवाद के इस दर्शन की मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था में विन्यस्त जड़ें साफ़ दिखती हैं. आखिर मुसोलिनी ने खुद कहा था – “फ़ासीवाद को बेहतर तरीके से कारपोरेटवाद कहा जा सकता है. क्योंकि वह राज्य और कार्पोरेट शक्ति का सम्पूर्ण विलयन है.” यहाँ निकोलस लामेर साउटे का उपन्यास ‘द वाटर थीफ़’ याद आना स्वाभाविक है. तो यह सुखवाद नाकोहस के लिए सबसे मुफ़ीद दर्शन है जो एक तरफ़ जनता को चौबीसों घंटे कमाने और खर्च करने के चक्र में उलझा देता है तो दूसरी तरह परम्परा,इतिहास और दर्शन की जड़ों से पूरी तरह काटकर ज्ञान की जगह सूचना पर निर्भर एक संवेदनहीन मनुष्य में तब्दील कर देता है. उपन्यास की एकदम शुरुआत देखिये . सुकेत स्वप्न में गजग्राह के मिथक का नया रूप देख रहा है. इसमें नया क्या है? नया है गज की हत्या के इर्द गिर्द ज़िन्दगी का हस्ब मामूल चलते रहना.” कुछ भी हो जाये ज़िन्दगी हस्ब मामूल चलती रहती है. आहत भावनाओं के पोषण के लिए सुकेत के घर आई गुंडा छात्रों की भीड़ शिक्षकों की उस कॉलोनी में बाक़ी लोगों के लिए सिर्फ़ एक व्यवधान है, खाए अघाए संपन्न लोगों के जीवन में एक अवांछित व्यवधान. टीचर्स असोसिएशन की बैठक में वबाल से दूर रहने की सलाहें आम शिक्षकों की हैं तो प्रगतिशील बख्शी जी के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं भावनाओं का आहत होना बड़ा मुद्दा है. कॉलेज से लेकर मध्यवर्गीय सोसायटी और सड़क तक सब अपने अपने समझौतों में मशरूफ़.  आपस मे बतियाते जब ये दोस्त कहते हैं कि यह अब वह देश नहीं रहा जिसकी आदत पड़ चुकी थी हमें, तो इस बदले हुए देश मे नाकोहस के लिए इससे अच्छा माहौल क्या हो सकता है? और इस माहौल में सबसे बड़ा ख़लल है – स्वतन्त्र सोच. दुनिया भर में ऐसी ताक़तों ने सबसे पहले स्वतन्त्र सोच पर हमला किया है और दुनिया भर के लेखकों ने इसे दर्ज किया है. ओरहान पामुक के उपन्यास ‘स्नो’ में एक प्रसंग है। देश में सर उठा रहे दक्षिणपंथ के दौर में एक छोटे से कस्बे में ‘हिज़ाब पहनने वाली लड़कियों को कालेज में प्रतिबंधित करने’ वाले सरकारी आदेश का सख़्ती से पालन करने वाले कालेज के निदेशक की हत्या के इरादे से आया एक धर्मांध युवा उनसे पूछता है – ‘क्या संविधान के बनाये नियम ख़ुदा के बनाये नियम से ऊपर हैं?’ निदेशक के तमाम तर्कों का उस पर कोई असर नहीं पड़ता और वह उसकी हत्या कर देता है। हिटलर या मुसोलिनी के मॉडल ही नहीं अमेरिका में ओवरमैंन कमिटी या हाउस कमिटी ऑन अन-अमेरिकन एक्टिविटीज़ जैसी संस्थाएं नाकोहस की पूर्वपीठिका हैं. अगर वामपंथी मित्र अति संवेदनशील न हों तो स्टालिन की सत्ता संरचना भी. सन चौरासी से बयानबे तक हमारा समाज लगातार और बीमार और संवेदनहीन होता चला गया है और प्रत्यक्ष सत्ता में आने से पहले ही फासीवाद जनमानस में अपना वर्चस्व विभिन्न रूपों में स्थापित कर चुका है. इस उपन्यास मे ही नेल्ली के नरसंहार का ज़िक्र है। फरवरी, 1983 मे असम मे हुए इन दंगों मे 2000 से ज़्यादा मुसलमानों को मार दिया गया था (यह आधिकारिक संख्या है, स्वतंत्र रिपोर्टों मे यह संख्या दस हज़ार तक बताई गयी थी)। चौदह से अधिक गांवों मे एक तरह का नस्ली सफाया। सरकारें आती जाती रहीं लेकिन जांच के लिए बनी तिवारी समिति की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गयी। कोई सात सौ केस दर्ज़ हुए थे लेकिन आधे से अधिक सबूतों के अभाव मे रद्द हो गए। जीवन हस्बे मामूल चलता रहा। जातीय नरसंहारों की तो एक लंबी सूची है। बाबरी मस्जिद विवादित ढाँचा बनती गयी और अब तो मुख्यधारा के तमाम माध्यम इसे विवादित ढांचा कहने लगे हैं। सुकेत के लेख मे जिन बातों से भावनाएं आहत हुई हैं उनमें से एक यह भी थी।

यहाँ सुकेत को गिरफ्तार करने आये चौड़ा सिंह के चरित्र को अगर थोड़ा सा विवेचित कर लें तो चीज़ें और साफ़ होंगी. संवेदना से पूरी तरह से खाली वह साक्षर लेकिन अनपढ़ नौजवान जब एक क्षण के लिए द्रवित होता है तो उसका साथी उसे तुरंत सावधान करता है. और उसकी संवेदना को हरने वाले टूल्स क्या हैं?बेरोज़गारी, इतिहास-दर्शन-साहित्यहीन शिक्षा, चारों तरफ़ बजता निरर्थक संगीत. एरिक हाब्स्बाम एज ऑफ़ एक्स्ट्रीम्स में बताते हैं – ’फासीवादी और ग़ैरफासीवादी दक्षिणपंथ में असली अंतर यह है कि फासीवाद निचले तबके की भीड़ को आंदोलित करके अस्तित्वमान होता है। यह निश्चित तौर पर लोकतांत्रिक और लोकलुभावन राजनीति के युग से जुड़ा हुआ है। पारंपरिक प्रतिक्रियावादी इन राजनैतिक व्यवस्थाओं का फ़ायदा उठाते हैं और ‘जैविक राज्य’ के समर्थक इनके अतिक्रमण का प्रयास करते हैं। फासीवाद अपने पीछे जनता को भारी संख्या में ले आने में गौरवान्वित महसूस करता है’… ये‘पीले बीमार चेहरे’ ही हिटलरी फरमानों को पूरी आस्था से कोई सवाल किये बिना पालित करने वाले लोग होते हैं. कला, विद्या, ज्ञान आदि से काट दिए गए पुच्छ विषाण हीन पशु में तब्दील कर दिए गए ये युवा आज हमें हर सड़क पर नहीं दिखाई देते? और इनके नेतृत्व मे दिखते हैं गिरगिट। वह अपढ़ नहीं है। खूब पढ़ा लिखा है।  पर तीनों उसे छेड़ते हैं और शम्स कहता है, “ऐन मुमकिन है, शे’र अभी भी फरमाते हों”  इस पर उसकी प्रतिक्रिया “” आई एब्हार एवरीथिंग ऑफ माई पास्ट…बीत चुके वक्त के एक एक पल से नफरत है मुझे…” इस बौद्धिक कौम का एक सिरा है भावनाओं केआहत होने को लेकर संवेदित प्रगतिशील बख्शी जी तो दूसरा सिरा है अपने अतीत मे अर्जित सारे लोकतान्त्रिक संस्कारों और ज्ञान को पूरी तरह सत्ता के पक्ष मे उपयोग करने वाला गिरगिट। बक़ौल रसूल हमजातोव अतीत पर पिस्तौलें दागते समय पर भविष्य की तोपों के गोले गिरने लाज़िम हैं, लेकिन उनकी जद मे जाने क्या क्या नष्ट होगा।टीवी की बहसों से अखबारों के पन्नों मे फासीवाद का वैचारिक आधार पुख्ता करते और उसकी कार्यवाहियों को अपने (कु) तर्कों का वैचारिक कवर देते तमाम बुद्धिजीवियों और उनके अतीत को देखते इन “गिरगिटों” की एकदम भौतिक उपस्थिति हाल के दिनों मे और मुखर होकर सामने आई है।

तो अगर एक उपन्यास वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की इस क़दर भविष्यवाणी करने लगे तो यह लेखक की सफलता भले हो, समाज की भयावह असफलता भी है.

इन सब कथाओं के बीच सुकेतु के टूटे विवाह और एक प्रेम का किस्सा है. दोस्तों के हँसी मजाक हैं. नशा है. स्त्रियाँ हैं. उनकी अपनी महत्त्वाकांक्षाएं और रुमान हैं. ये सहज मानवीय कमज़ोरियाँ जो यह बताती हैं कि सच के पक्ष में खडा मनुष्य कोई परफेक्ट मनुष्य नहीं होता रेमंड के विज्ञापन की तरह, वह हमारे आपके ही तरह एक आम मनुष्य होता है बस उसने तर्क से दुनिया को देखना सीख लिया है. चरित्र को जिस तरह से प्रगतिशील ताक़तों पर हमला करने के लिए हथियार बना लिया जाता है उसे हमने नेहरू और गांधी ही नहीं हमारे अपने समय में खुर्शीद अनवर से कन्हैया तक देखा है. तर्कों का जवाब तर्कों से देने की जगह चारित्रिक हत्याएं,अफवाहें, झूठ और दुष्प्रचार सबसे बड़े औज़ार होते हैं प्रतिक्रियावादी ताक़तों के.

मार्क्स ने कहा था कि किसी भी समय की संस्कृति उस समय के वर्चस्वशाली वर्ग की संस्कृति होती है. व्यवस्था अपने सहजबोध (कॉमन सेन्स) निर्मित करती है और उसे हर तरह से स्थापित करती है. भाषा से लेकर नाम तक उस सहजबोध का हिस्सा होते चले जाते हैं. ऑन लिटरेचर में अपने लेख ‘फंक्शन्स ऑफ़ लिट्रेचर” में अम्बर्तो इको इटली के फासीवादी समय में भाषा के साथ हुए व्यवहार का विस्तार से विवेचन करते हैं. हमारे समय में भी यह सहज बोध लगभग स्थापित सा ही है. उर्दू यानी मुसलमान, संस्कृतनिष्ठ हिंदी यानी द्विज, लोकभाषा यानी गँवार (देहाती को लगभग गँवार के पर्यायवाची की तरह उपयोग किया जाता है). फ़िल्में इस सहज बोध को स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम हैं तो पाठ्य पुस्तकों से लेकर कथित लोकप्रिय संचार माध्यम इसे बहुत बारीक़ी से स्थापित करते हैं और यह आम जीवन में जितनी स्वीकार्य होती जाती है, वर्चस्वशाली वर्ग की जकड़न उतनी मज़बूत होती जाती है. अभी एकदम हाल की घटना है कि मेट्रो में एक आयोजन का उर्दू ब्रोशर पढ़ती महिलाओं को पाकिस्तानी कहकर लगभग धमकाया गया. पुरुषोत्तम अग्रवाल इस उपन्यास में भाषा के इस सहजबोध का दो स्तरों पर प्रतिवाद करते हैं. पहला इस उपन्यास की अपनी भाषा और दूसरा इसके कथ्य में विन्यस्त भाषा और संस्कृति का सवाल. यहाँ रघु एक ईसाई पिता की संतान है,सेना में ब्रिगेडियर रहा पिता, योग और ध्यान का अभ्यासी पिता, नैष्ठिक ईसाई और रामायण-महाभारत का जानकार पिता जिसने पुत्र का नाम राम के पितामह राजा रघु से प्रभावित होकर रखा था. कहानी के रूप में पाखी में प्रकाशित होने पर एक आलोचक मित्र ने इसे हिन्दू साम्प्रदायिकता से जोड़ कर देखा था. यह आरोप मुझे वैसे है जैसे कोई कहे कि शरद जोशी रिवर्स लव जिहाद के संघी नारे से प्रभावित होकर इरफाना जी से विवाह को उद्धत हुए थे. अव्वल तो क्या किसी ईसाई का रघु या ऐसा कोई नाम होना सचमुच इतना अस्वाभाविक है? खुशवंत सिंह के उपन्यास अ ट्रेन टू पाकिस्तान में एक पात्र है इक़बाल. वह गाँव के भाई जी को इक़बाल सिंह, एक मोना सिख लगता है लेकिन सब इन्स्पेक्टर को इक़बाल खान. क्यों लगता है, प्रबुद्ध पाठकों को यह बताना मुझे ज़रूरी नहीं लगता. कबीर खान और दीपक कबीर और कबीर राजोरिया और कबीर बेदी हमारे समाज में जाने कितने हैं. अब किसी रसखान की कृष्णभक्ति या रघुपति सहाय के फ़िराक हो जाने या किसी ब्राह्मण शायर के शीन काफ़ निज़ाम हो जाने का क़िस्सा क्या सुनाना? मेरी गुजरात पोस्टिंग के दौरान मेरी सहकर्मी थी मनीषाबेन क्रिश्चियन. दिल्ली में मेरे एक सहकर्मी हैं विजय दीप मसीह. मेरी अपनी बेटी वेरा के नाम से ही अधिक जानी जाती है. हिन्दू मिथकों से प्रभावित ईसाइयों/मुसलमानों या इसके उलट के किस्से भी हमारे समाज में इतने अनुपस्थित तो नहीं तो रघु मसीह या रघु क्रिश्चियन नाम से इस क़दर चौंका जाए? यह चौंकना दरअसल नाकोहस के उस गिरगिट की याद दिलाता है जो कहानी में एक जगह कहता है, “एक आरोप तुम पर अपनी पहचान छिपाने का है.” गुलजार की काफी पहले लिखी कहानी धुंआ में मुसलमान चौधरी चाहता है कि मरने के बाद दफनाने की जगह उसे जला दिया जाय. यह किन्हें नागवार गुजरता है?  गरबा नवरात्रों में देवी दुर्गा की पूजा अर्चना है. उसमें बुतपरस्ती से इंकार करने वाले मुसलमानों का शामिल होना जिन्हें आपत्तिजनक लगता है वे कौन लोग हैं?  कम्युनिस्ट उमर खालिद की जो पहचान इसे स्वीकार्य है वह मुसलमान की है. पहचानों के नशे में इस क़दर मदहोश हो जाना कि उनमें किसी अंतरण, किसी व्यतिक्रम के होने को अस्वीकार कर देना या संदेह की नज़र से देखना तो नाकोहस का ही नज़रिया है!  असल में उसके लिए सामने यह पहचान ओढ़े लोग होना ज़रूरी है जिससे वह “हम” और “वे” की बाइनरी पैदा कर सके. तरल पहचानें उसके लिए एक संकट की तरह हैं. इसके उलट यह होना और इस होने को रेखांकित करना उस खाई के अस्तित्व का अस्वीकार और प्रश्नांकन है जिसकी उपस्थिति दक्षिणपंथ की उपस्थिति के लिए प्राण तत्व है. ईसाई होकर अपनी कविता में रघु का महाभारत के चरित्र के सहारे बात करना प्रगतिशील उमानाथजी को भी नहीं पच पाता. इसलिए जब पंडित शुक्ल जी रघु नाम जानने पर उपहास करने के लिए पूछते हैं कि “नाम ही नाम के रघु हैं, या कुछ ज्ञान भी है महाराज रघु के बारे में’ तो वह इस सहजबोध के वाहकों के प्रतिनिधि बन जाते हैं और रघु जब अपनी ईसाई पहचान को साफ़ करते हुए उन्हें शास्त्रार्थ में धाराशायी करता है तो यह उस साम्प्रदायिक सहजबोध का एक प्रतिपक्ष रचता है. इसी तरह जब खुर्शीद कहता है, “मेरे नाम को लेके उर्दूआइये मत” या जब सुकेत अपने सपनों में मिथकों के सहारे दुहस्वप्नों से गुजरते हुए देखता है कि मनुष्यों की ज़िन्दगी तो हस्ब मामूल चल ही रही है, देवताओं को भी उस गज को बचाने की कोई फ़िक्र नहीं तो यह एक तरफ़ उन पार्थक्य के उन बाड़ों को तोड़ते हैं जिनके बिना दक्षिणपंथ का कोई अस्तित्व ही नहीं तो दूसरी तरफ़ उस संवेदनहीन हो चुके समाज को रेखांकित  करते हैं जिसके लिए एक लेखक की मृत्यु पर हो रहे नृत्य में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं.  दूसरे स्तर पर यह काम लेखक ने उपन्यास की भाषा से किया है. जैसा कि मैंने शुरू में ही ज़िक्र किया, बेहद गंभीर विषय पर लिखे इस उपन्यास में एक पात्रों के बीच के लम्बे लम्बे संवादों में भी एक बेफ़िक्री है. शम्श ख़ासतौर बेहद मजाहिया है. हालांकि कई बार यह भाषा को हलके स्तर पर और फूहड़ मजाकों तक भी ले जाता है. मेरे लिए इसकी एक अपनी व्यंजना है. यह शत्रु को हलके में लेना नहीं है बल्कि प्रतिरोध को किसी उदास आख्यान की जगह एक ज़िंदादिल संघर्ष की तरह ज़िंदा रखना है. लोकभाषा से लेकर सोशल मीडिया और टीवी पर निर्मित हुई “नई वाली हिंदी” तक का बखूबी प्रयोग साजिशों की व्याप्ति के बरक्स उन स्पेसेज पर प्रतिरोध की आवश्यकता को बड़े सटल तरीके से इंगित करता है. और इन सबके साथ हर खंड की शुरुआत जिस तरह के काव्यात्मक वाक्यों या कहें कविता की दो पंक्तियों से हुई है वह संवेदना की आतंरिक तहों तक दस्तक देती है. लम्बी बहसें कई जगह ऊबाऊ हुई हैं, कई जगह इनमें उपन्यासकार पर आलोचक हावी होता दिखा है लेकिन अपनी सम्पूर्ण निर्मिति में भाषा प्रतिरोध के एक आदमक़द आख्यान के निर्माण के ज़रूरी टूल की तरह सामने आई है.

एक आखिरी उल्लेखनीय बात यह कि इस उपन्यास में कोई कृत्रिम उम्मीद नहीं. हाल में मुक्तिबोध को पढ़ते यह लगा है कि उनकी निराशा कितनी ईमानदार थी और उसी दौर में दस साल में क्रान्ति हो जाने की आशाएं कितनी निरर्थक. एक तरह का क्रांतिकारी नियतिवाद भी होता है जो अतिउत्साहों की जड़ में होता है. पामुक के उपन्यास ‘अ स्ट्रेंजनेस इन माई माइंड’ में वामपंथी युवा फ़रहत भीतर भीतर आसन्न संकट और हार को जानता है लेकिन प्रत्यक्ष में कहता है हम जीतेंगे. एक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए यह ज़रूरी हो सकता है लेकिन एक लेखक के लिए यह असल में बेईमानी है. उसे निराशाओं को भी उनकी पूरी भयावहता के साथ दर्ज़ करना होता है जैसे अम्पटन सिंक्लेयर ‘जंगल’ में करते हैं या मुक्तिबोध ‘अँधेरे में’ जैसी कविता में. इस निराशा और नाउम्मीदी का स्वीकार ही सामने खड़ी चुनौती का असली आकार देखने को मजबूर करता है और उसके बरक्स ज़रूरी लड़ाइयों की हदें भी।‘नाकोहस’ में जो अँधेरा है उसमें उम्मीद की इकलौती मद्धम रौशनी तीन दोस्तों की बेफ़िक्र हँसी में है, ज़िद में है, पागलपन में है, बेबसी में है, उदासी में है.इसलिए यह उपन्यास महान उपन्यास हो न हो आज एक बेहद ज़रूरी उपन्यास है. अपने समय का एक ज़िंदा दस्तावेज़ जो जितनी जल्दी अप्रासंगिक हो जाए, समाज के लिए उतना ही प्रासंगिक होगा.

[1] अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रखा है /मगर चिराग़ ने लौ को संभाल रखा है (अहमद फ़राज़)

__________________________________
पाखी के मई अंक से साभार

प्रस्तुतकर्ता Ashok Kumar Pandey पर 9:14 pm

इसे ईमेल करेंइसे ब्लॉग करें!Twitter पर साझा करेंFacebook पर साझा करेंPinterest पर साझा करें

लेबल: नाकोहस, पुरुषोत्तम अग्रवाल, समीक्षा, साम्प्रदायिकता

 

Why Should Bar Council act against these two lawyers..

Yesterday I Signed and put up a petition on my FB wall  asking Bar Council of India to initiate action aginst the defence lawyers in Nirbhaya case for their horrendous statements…

My inquistive friend Aalok Mishra raised the questions of freedom of holding on to one’s opinion

here is his  my response and his later comment…

 

@ Aalok Mishra, I was just coming to your comment dear. No need to refrain from commenting. just try to understand, in this case it is not a matter of their personal opinion. They are practicing law under some shared legal parameters. In law, every opinion has implications. In this case, the implications being that the onus of rape is not on the rapist but on the victim. Moreover by saying the he would burn his daughter alive, one of these characters is openly declaring his intent to murder. let hm just mention the name and it will be a full blown criminal offence. I hope it is clear by now that they are violating their professional code hence the Bar Council action is very much called for. They are of course at liberty to play, what may be called ‘lawyers’ games’ in favour of their clients, but they cannot violate the professional code. Let me give you one telling example. In Jessica murder case, the defence lawyer Ram Jethmalani argued that it was not his client, but “a tall Sikh gentleman” who shot at Jessica. It was of course laughable, but part of what I called “lawyers’ game.’Now, imagine him arguing that the murdered girl was to be blamed for murder since she chose to do the bar-tending at a party. Had he argued thus, Bar Council would have been totally justified in initiating action against him as well. generally speaking, lawyers, doctors, teachers, journalists have been traditionally respected as ‘noble professions’ precisely because they are supposed to enlighten society even while earning their bread and butter. These two lawyers have proved to be blots on their profession and must be admonished accordingly.

 

and Aalok’s response to this…

 

Thanks for the response. I had not thought of this angle.about the code of conduct. It might be a breach of professional integrity somehow. I will learn more about that from my friends who practice occasionally. Thanks again for allowing and facilitating dialogue on the timeline. That is a rare virtue which you have. Nice talking to u sir. tk cr….

 

This was a good dialogue…

wasn’t it?

न.प्र. कमल आ रहे हैं, न.प्र. कमल जा रहे हैं….

फेसबुक के लिए लिखा गया नोट – https://www.facebook.com/notes/purushottam-agrawal/नप्र-कमल-आ-रहे-हैं-नप्र-कमल-जा-रहे-हैं/953161794707747

न.प्र. कमल नगर के प्रसिद्ध व्यक्तियों में से थे, कवि, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता। अपना महत्व भी बखूबी पहचानते थे। गल्ला-मंडी के जिस बाड़े में रहते थे, उसके दरवाजे के ऊपर पाँच बाई तीन फुट का काला बोर्ड टँगवा दिया था, जिस पर चमकीले सफेद अक्षरों में लिखा था- न.प्र.कमल।

आप बाड़े के विशाल दरवाजे से अंदर घुसे, दस कदम चलने पर एक पेड़ के तने पर तख्ती देखेंगे- बाँई तरफ इशारा करते तीर के साथ- न.प्र. कमल। थोड़े फासले पर एक और तख्ती दीवार पर दिखेगी- दाँई तरफ बढ़ने का इशारा करती हुई- न.प्र.कमल। दाँई तरफ कुछ कदम चलिए, निश्चिंत रहिए, भटकने की कोई गुंजाइश नहीं, इस बार बाँई तरफ जाना है, तख्ती बता रही है—न. प्र. कमल। चंद कदम चले और एक दुमंजिले मकान के दरवाजे पर तख्ती है—न.प्र. कमल। मकान के आँगन में पहुँचे तो सीढियाँ हैं और तख्ती ऊपर की तरफ इशारा कर रही है—न.प्र. कमल। सीढ़ियाँ चढ़ कर पहुँचे तो बस पहुँच ही गये, सामने दरवाजा है, और वही—न.प्र. कमल।

न.प्र. कमल के इतने सारे बोर्ड और तीर चर्चा का विषय रहते ही थे। कमलजी गोधाजी की कैंटीन पर कभी-कभार ही आते थे, गंभीर आदमी ठहरे, कहाँ रोज-रोज अड्डेबाजी में पड़ते।

उस दिन प्रकाशजी तरंग में थे।  न.प्र. कमल जैसे ही गोधाजी की कैंटीन पर अवतरित हुए, प्रकाशजी चहक उठे। कमलजी ठीक से स्थापित भी ना हो पाये थे कि प्रकाशजी बोले, ‘कमलजी एक सुझाव है…’

‘हाँ, बोलो प्रकाश, बोलो…’

‘जनता की सुविधा के लिए इतने सारे बोर्ड तो आपने लगवा ही रखे हैं…’

‘हाँ भई, लोग इधर-उधर भटकते रहें, अच्छा नहीं लगता …’

‘जी, वही तो, आखिरकार आप का तो जन्म ही  राष्ट्र को सही रास्ता दिखाने के लिए  हुआ है।  बस दो बोर्ड और बनवा लें तो किसी कन्फ्यूजन की गुंजाइश ही न रहे, एक छाती पर लटकाने के लिए- न.प्र. कमल आ रहे है, एक पीठ के  लिए– न.प्र. कमल जा रहे हैं…’

 

नाकोहस…..पीके

‘नाकोहस’ दुख और आशंका के कारण लिखी थी…हर रोज हम उस दु:स्वप्न के निकट सरक रहे हैं जिसने ‘नाकोहस’ लिखवाई….

 

 

“गुंडे कह  कर, आप जिनकी भावनाएं आहत कर रहे हैं,  वे असल में बौनैसर हैं…’ ‘बौने सर या बाउंसर ? जो सर लोग हमें यहाँ लेकर आए हैं, देह से तो बौने के बजाय बाउंसर ही लग रहे थे,  हाँ, बुद्धि से…’‘इतना अहंकार उचित नहीं, मान्यवर। अहसान मानिए कि आपकी लद्धड़ बुद्धि फास्ट डेवलपमेंट के इस तेज-रफ्तार जमाने में अब तक बर्दाश्त की गयी है…बाउंसर नहीं, बौनैसर माने बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक, संक्षेप में बौनैसर…यू सी, हम कोई बुद्धि-विरोधी नहीं, बल्कि बुद्धि के रक्षक हैं…लेकिन यह अब नहीं चलेगा कि स्वयं को बुद्धिजीवी कहने वाले  भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली समाजद्रोही, राष्ट्रविरोधी हरकतें करते रहें…बुद्धि की मनमानी बहुत हो ली, बुद्धिजीवियों के सम्मान का तमाशा बहुत हो चुका, अब जरूरत है, अनुशासन की… भावनाओं की रक्षा की, इसीलिए बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक—बौनैसर—समाज की रक्षा तो करते ही हैं, यह ध्यान भी रखते हैं कि बौद्धिक कर्म अनुशासन-हीनता का रास्ता न पकड़ ले…याद रहे, इन समाज-रक्षकों के बारे में बकवास करना दंडनीय अपराध है..

 

 

 

“लोगों को सिखाने के लिए, उनके सीखने को ‘मॉनिटर’ करने के लिए राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण आयोग, राष्ट्रीय अनुशासन संस्थान, विवेक-पुनर्निर्माण समिति आदि का गठन किया गया ही है….हम नाकोहस वालों का अपना मैंडेट है…कुल मिला कर टारगेट यह—कोई भी नागरिक किसी भी हालत में अपने चरित्र को, दूसरों की भावनाओं को चोट ना पहुँचा पाए। एकांत खतरनाक है, एकांत  में सवाल पैदा होते हैं, सवालों से निजी दुख और सामाजिक उत्पात जन्म लेते हैं, सो….क्या कहते हैं आप इंटेलेक्चुअल लोग उसे…हाँ, कैथारसिस, विरेचन….मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी…सारे समाज के लिए रंग-बिरंगा, सुंदर कैथार्सिस मुहैया कराने के लिए तो छोटे से शुक्रिया के  मुस्तहक तो हम हैं ही…

Life of the text and that of the city…(my presentation to the India-China Writers meet organised by Sahitya Akademi, New Delhi 28th nov. 2014.)

Life of the text and that of the city…

          By Purushottam Agrawal.

 

 

 

Brian Clark’s play, ‘Whose life is it anyway…’ , is about the agency of choice. Who will decide whether a person suffering from paralysis neck down should be ‘allowed’ to end his ‘miserable’ existence or must continue to live, as life per se is ‘sacred’ and under no circumstances the individual himself can be given the authority to end it; even if it is his own.

Why should my mind have gone back to the performance I watched almost three decades back in Delhi? As a matter of fact, whenever I think of life and its inevitable corollary- death, the play comes back to me; even if I am thinking only of the influence of life on the creation of literature.  The question is valid here also- whose life we are thinking about when we talk of the ‘influence’ on literature?

Is it author’s own life or life of the text? The text has a pre-life even before it takes shape in the words chosen and arranged by the author. And, every writer and reader knows for a fact, that once having come into being a work of art surpasses the life of its creator.  We are concerned here with life which influences the process of this coming into being. Hence the question—whose life?

Is it only the author’s life limited as it is both by time and space or is it a life larger than the one experienced by the author? Is it only the ‘real’ life or something ‘more than real’ to recall the title of David Shulman’s recently published, fascinating history of imagination in south India?

Does the life directly experienced by writer alone influence the act of writing? Does the ‘direct’ experience really make a description or reflection more authentic? The ‘authenticity’ claims rooted in the ‘real, direct’ experience of the author are not exactly new. In the late fifties and early sixties, many writers were justifying exclusively middle class concerns and ethos of their writings  in the name of ‘authenticity of feeling’. Once again, it is claimed by many these days that only s/he who has suffered on the margins, as a woman, as a colored person or as a Dalit can relate ‘authentically’ with that experience and reflect upon its cultural importance. This stance might sound politically correct at the first glance, but will it sound so under a serious philosophical scrutiny? So far as literature is concerned, does this ‘aesthetics of authenticity’ really point to the way of authentic creation and reception?

In the first place, any writing is actually writing of the memory. You do not right the experience per se; you commit its recall to words and that with an obvious gap between the moment of experience and the moment of its recall. Some additions and deletions are natural corollaries of such recall. The moment of experience outgrows its raw ‘authenticity’ in the very process of creative recall. A writer might have suffered in his life on the margins of the society, but in most of the cases, at the moment of writing, s/he is already part of the middle classes. Writer’s vocation as a rule is a middle class one, and one’s identity by definition consists of multiple social roles and relations.  Emphasizing only the ‘cultural’ or ‘ethnic’ aspect of identity might be tempting as a strategic stance, and precisely because of this, it hides more than it reveals. The middle class writer recalls the experience of margins from the vintage point of middle class status. Does this fact have a bearing on her choice or not?

Any sense of ‘identity’ (in literature or in politics) is bound to lack in authenticity, if it is confined only to the cultural or ethnic aspects, ignoring the social class part of the story. To be frank, the identity discourse without a reference to the political economy of class-system is bound to end up in the company of historically reactionary politics, because it rejects the very idea of the commonalities of those sufferings which emanate from the social structures, and hence can be ameliorated only by a shared struggle. The politics of cultural identity with its exclusive emphasis on the difference has contributed to waning of shared dreams of emancipation.  Moreover, we all know only too well that a piece of writing is ultimately judged on the basis of the depth and width, which the writer has been able to give her/ his memories of life-experiences.

And it is not just the writer’s life and experience. The whole point of writing is the perspective you put your experience in; perspective which includes your consciousness of the collective memory as codified in the language of your choice, your sense of being in flow of a continuous praxis called tradition, and the acute, mostly agonizing dialogue with the moment of history you are placed in. Realizing the significance of such dialogue, Aristotle tried to make amends for his guru’s act of expelling the poet from the ‘City’. He recognized that, ‘poetry is more subtle and philosophical as compared to history as poem is a universal expression while history expresses a certain context’.

In other words, it is not your individual life, its experiences and memories, but the potential life of the literary work which plays the determining role in the act of writing. The writer has to go beyond his own life to bring creative work to life. The very act of writing and of reading as well, is an act of trans-migration of ‘self’- an act of ‘par-kaya pravesh’ (assuming the body of other) – to recall a telling phrase from the cultural vocabulary of India. (Incidentally, I had articulated this idea way back in 2000, in an essay written in order to ‘face’ the question- ‘what is literature?’).  The primary tool of this act of ‘assuming the body of other’ is of course, imagination which must be in the process of constant refinement. The classical Indian poetics has the right term for such imagination-Pratibha- etymologically signifying ‘illumination’. This illumination works on what the ends of literature and art- creative as well as receptive.

Those who know the Hindi  novel ‘Tamas’  by Bhisham Sahni can never forget the opening sequence wherein a character is slaughtering  a pig and the text is setting the tone of the disturbing narrative the novel is going to unfold. The scene was praised by everyone not only for its metaphoric suggestion but also for its vividness; in fact, it would not be that suggestive if it were not that vivid.

And the writer himself has this to say about the sequence, “I never had the opportunity to know someone in the profession of skinning the animals, neither had I ever witnessed a pig being slaughtered, had no idea of the process at all. In fact, before writing this episode, even after, I continued to try to get some idea, how a pig is actually slaughtered.”

It is the agonised dialogue between the imagination (both at writer’s and reader’s ends); the cultural memory and the sense of location in tradition and the concerns and ambitions of the individual writer that makes the life of the text possible.

Meer Taqi Meer active in the 18th century, witnessing the tumultuous events that condensed in themselves  historical cataclysm put it most succinctly. Let me end with that succinct and poignant admonition from the poet:

“O tearful eye, still in deep slumber/ open the eyelids a bit, deluge has inundated the city”.

(किन नींदों सोती है, चश्म-ए-गिर्यानाक़, मिज़गाँ तो खोल, शहर को सैलाब ले गया।)

We all have to open the eyelids to the deluges that are inundating the city…it is not just my life, but the life of the text and that of the city….