लोकवृत्त के बारे में…

अंग्रेजी में पब्लिक स्फीयर; हिन्दी में लोक-वृत्त।

अपनी प्रिय मित्र फ्रांचेस्का ओरसिनी की पुस्तक ‘दि हिन्दी पब्लिक स्फीयर 1920-1940’  का हिन्दी अनुवाद देख कर बहुत खुशी हुई। नीलाभ द्वारा किया गया  यह अनुवाद ‘हिन्दी लोकवृत्त 1920-1940’ शीर्षक से वाणी प्रकाशन ने 2011 में छापा है।

जहाँ तक मेरी जानकारी है, ‘पब्लिक स्फीयर’ के लिए ‘लोकवृत्त’ शब्द का प्रयोग पहले-पहल मैने ही किया था।  फ्रांचेस्का की किताब अंग्रेजी में 2002 में छपी थी, उसके रिव्यू के बहाने, मैंने ‘आलोचना’ ( अक्टूबर-दिसंबर, 2003) में एक लेख लिखा था- ‘लोकवृत्त हिन्दी भाषा का या हिन्दी प्रदेश का?’

देख कर कुछ अजीब सा लगा कि  हिन्दी अनुवाद के लिए लिखी गयी भूमिका में फ्रांचेस्का ने लिखा है, “ पब्लिक स्फीयर के लिए एक सटीक हिन्दी शब्द ढूँढना मुश्किल रहा”। यह मुश्किल अनुवाद में जाहिर भी हो जाती है, किताब के नाम में पब्लिक स्फीयर के लिए ‘लोकवृत्त’ शब्द  है तो किताब की शुरुआत में ‘जनपद’। चौथे अध्याय में पब्लिक स्फीयर ‘हिन्दी की दुनिया’ बन गया है तो पाँचवें में ‘पॉलिटिकल  स्फीयर’ का अनुवाद ‘राजनैतिक क्षेत्र’ किया गया है।

2003 में लिखे गये अपने रिव्यू-आर्टिकल के शुरु में ही मैंने पब्लिक स्फीयर के लिए सटीक हिन्दी शब्द खोजने की मुश्किल पर कुछ विचार किया था। सूचना दी थी कि 1996 में लिखित लेख- ‘हिन्दी प्रदेश का वैचारिक संकट…’ में मैंने पब्लिक स्फीयर के लिए ‘लोकमानस’ शब्द का प्रयोग किया था, “ जो निश्चय ही अपर्याप्त था”।

आगे तो बेहतर यही है कि मैं ‘लोकवृत्त: हिन्दी भाषा का या हिन्दी प्रदेश का’ लेख के वे हिस्से यहाँ पेश कर दूँ जो बात को साफ करने में सहायक हो सकते हैं— जिन की दिलचस्पी हो, वे मित्र, जिज्ञासु पाठक पूरा लेख ‘आलोचना-  सहस्राब्दी अंक पंद्रह’, अक्टूबर-दिसंबर, 2003 ( पृ.113-125) में पढ़ ही सकते हैं-

“ …इन दिनों हिन्दी में पब्लिक स्फीयर-सार्वजनिक संसार- की कुछ चर्चा अकादमिक हलकों में हो रही है। हिन्दी के संदर्भ में ‘पब्लिक  स्फीयर’ की बात व्यवस्थित रूप से शुरु करने का श्रेय फ्रांचेस्का ओरसिनी को जाता है।…उनकी पुस्तक प्रकाशित होने के बाद कई जगहों पर, हिन्दी के संदर्भ में ‘पब्लिक स्फ़ीयर’ और पब्लिक डोमेयन की चर्चा सुनाई पड़ने लगी है।

 

“आमतौर से पब्लिक स्फ़ियर के लिए हिन्दी में सार्वजनिक क्षेत्र या  जनपद शब्द का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि यह लेख ‘लोकवृत्त’ शब्द का प्रयोग कर रहा है। क्यों? एक तो यही कि सार्वजनिक क्षेत्र हिन्दी में पब्लिक सेक्टर के लिए रूढ़ हो चुका है, और जनपद डिस्ट्रिक्ट के लिए। ग़ैर-जरूरी बिगूचन ( कन्फ्यूजन) से बचने के लिए बेहतर होगा कि हम पब्लिक स्फ़ियर के लिए किसी अन्य पद का प्रस्ताव करें। तो, फिर ‘लोकवृत्त’ ही क्यों?” ( पृ. 113)

इसके बाद यूरोप में पब्लिक और प्राइवेट की धारणाओं के उदय और हैबरमास की पब्लिक स्फियर संबंधी विवेचना की संक्षिप्त चर्चा करने के बाद मैंने लिखा था-

“पब्लिक स्फ़ियर में स्वयं पब्लिक का जो ‘संरचनात्मक रूपांतरण’ निहित है, ‘लोकवृत्त’ उस तक पहुँचने में हमारी सहायता करता है। अंग्रेजी के पब्लिक की ही तरह ‘लोक’ का पारंपरिक संबंध पदानुक्रमपरक मर्यादा से रहा है। इसी मर्यादापरक ( और ‘नॉर्मेटिव’ अर्थ) में आचार्य शुक्ल ने ‘लोकधर्म’ और ‘लोकमंगल’ शब्दों का प्रयोग किया था। इस मर्यादा से तर्कपूर्ण ज़िरह और उसके कारण उत्पन्न परिवर्तनों का संकेत  करना जरूरी है। यह ज़िरह आचार्य शुक्ल के पहले ही शुरु हो गयी थी और उनके बाद भी चलती रही। यह ज़िरह जिस क्षेत्र में हो रही थी, और जिस ढंग से हो रही थी, उसमें ‘लोकधर्म’ शब्द का  आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा शुक्लजी से सर्वथा भिन्न, बल्कि विपरीत अर्थ में प्रयोग ध्यान देने योग्य है। जहाँ आचार्य शुक्ल के लिए ‘लोकधर्म’ ‘आर्यधर्मानुमोदित वर्णाश्रम धर्म’ है, वहीं आचार्य द्विवेदी ‘लोकप्रचलित’  विश्वासों को ही नहीं ‘अंधविश्वासों’ को भी ‘लोकधर्म’ की परिभाषा मे ले आते हैं। इतिहासकारों के बीच प्रचलित शब्दावली याद करें तो आचार्य शुक्ल का ‘लोकधर्म’ ‘ग्रेट ट्रैडीशन’ को व्यंजित करता है, और आचार्य द्विवेदी का ‘लोकधर्म’ ‘लिटिल ट्रैडीशन’ को। आचार्य शुक्ल ‘लोकधर्म’ शब्द का प्रयोग ‘नॉर्मेटिव’ ढंग से करते हैं, आचार्य द्विवेदी ‘डिस्क्रिप्टिव’ ढंग  से।

“ लोकधर्म शब्द के बारे में यह ‘संवाद’ संकेत करता है—‘लोक’ शब्द की व्याप्ति और सांस्कृतिक संदर्भवानता की ओर। ‘सार्वजनिक’ के बरक्स, ‘लोक’ सिर्फ राजनैतिक-प्रशासनिक नहीं, सांस्कृतिक आशय से संपन्न शब्द है। इसका संकेत मनुष्य की सभी इहलौकिक गतिविधियोंकी ओर जाता है—लोकमर्यादा की अवधारणा का रूपांतरण तार्किक और इहलौकिक गतिविधियों का ही परिणाम है। ‘पब्लिक स्फ़ियर’ स्वयं पब्किल की अवधारणा में आए रूपांतरण से जुड़ा है, यह हमने देखा। किसी भी समाज में ‘पब्लिक’ मर्यादा की एक पारंपरिक अवधारणा होती ही है- और पब्लिक स्फ़ियर का उदय उस अवधारणा के रूपांतरण का कारण भी है, परिणाम भी। हिन्दी भाषा की सांस्कृतिक चेतना में ऐसी मर्यादाएं ‘लोकमर्यादाएं’ हैं, उनका पालन ‘लोकधर्म’ है: इन मर्यादाओं से जिरह करना किसी के लिए लोकनीति हो सकता है तो किसी के लिए ‘लोक-विरोध’ या ‘लोक-विद्वेष’ । कहने का आशय यह कि परंपराप्राप्त, शासक संरक्षित, ‘सार्वजनिक शुभ’ के अर्थ में लें, या निजता संपन्न नागरिकों के पारस्परिक संवाद से अर्जित ‘सामान्य शुभ’ के अर्थ  में—इस प्रसंग में ‘पब्लिक’ का सही प्रतिशब्द ‘लोक’ है न कि ‘सार्वजनिक’ या ‘जनपद’।

“इसलिए ‘पब्लिक स्फ़ियर’ के लिए ‘लोकवृत्त’ शब्द का प्रयोग अधिक तर्कसंगत और सार्थक है”।

2003 में प्रकाशित लेख की इस याद-दिहानी से, उम्मीद है कि “पब्लिक स्फीयर के लिए एक सटीक हिन्दी शब्द” खोजने में जो मुश्किल  फ्रांचेस्का और उनकी किताब के  अनुवादक के सामने आई, वह दूर हो सकेगी।

 

2 Responses to “लोकवृत्त के बारे में…”

  1. Aparna Manoj says:

    सारगर्भित लेख . जहां तक जनपद शब्द की बात है , वह तो district के रूप में ही सर्वमान्य रहा है . इतिहास में जनपदों का उदहारण इस शब्द को इन्हीं अर्थों में स्थापित करता रहा .
    सार्वजनिक क्षेत्र कहने से भी अर्थ उतना व्यापक नहीं लगता . पर फिर भी शब्द के करीब है .
    sphere को मानस के रूप में नहीं मना जा सकता .
    लोक वृत्त public sphere के अधिक करीब का शब्द है .
    सर इसे साझा करने के लिए धन्यवाद . पढ़कर कई बातें पता चलीं .

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