अश्वमेध
तुम बहुत सरपट दौड़े हो
थोड़ा ठहर जाओ
न, तुम नहीं थके,
जानता हूँ
लेकिन तुम्हारी दौड़ ने बहुतों को कुचला है
ठहर जाओ.
तुम्हारी रगों में फड़कती बिजली
तुम पर नहीं
दूसरों पर गिरती है
कोई वल्गा नहीं तुम्हारे मुँह में
फ़िर भी तुम्हारी पीठ खाली नहीं
वहाँ सवार है पताका
जिसकी फहराती नोंक
तुम्हें नहीं दूसरों को चुभती है
ठहर जाओ.
तुम पूजित हो, अलंकृत हो
ऊर्जा तुममें छटपटाती है
सारी दूब को रौंद कर जब तुम लौटोगे
बिना थके भूमंडल को नाप लेने के
उन्माद से काँपते, सिर्फ़, सिर्फ़ उत्तेजना के कारण
हाँफते
तब तुम्हें काट डालेंगे
वे ही लोग – जिनके लिए तुम दौडे थे.
वे काट डालेंगे
तुम्हारा प्रचंड मस्तक.
तुम्हारा मेध
उनका यज्ञ है .
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चिट्ठी
मैं हरिद्वार आऊँगा, समीर
तुमसे मिलने, ख़ुद से मिलने
बहुत दिनों, महीनों, बरसों सोचा
चिठ्ठी लिखूं
लिखकर पूरी नहीं कर पाया,
जो लिखना था नहीं लिख पाया
गोरख पांडे कनकराज की राह गए, समीर
उनका फ़ैसला अखबार में छ्पा है
लेकिन बहती नदी ने तुमसे…
तुमसे ज़रूर वह भी कहा होगा
जो अखबार में नहीं छपा है.
उसे सुनने आऊँगा, समीर
भगीरथी को छूने.
तुम्हारी कविता में वह बौद्ध भिक्खु आया
उसने वह कुआँ दिखाया
जिसमें पानी था, मंत्र भी दिया -’एत्थ’
फिर डूब गया – गहरे मौन में
मैं ही नहीं समझ पाया
मैं ही नहीं चल पाया.
लेकिन एक दिन ऐसा आएगा, समीर
जब मैं आऊँगा हरिद्वार
तुमसे मिलने, ख़ुद से मिलने
चल कर आऊँ या उड़ कर
बस में आऊँ या कलश में
आऊँगा ज़रूर
किसी दिन.
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स्मृति
नाचते मोर के पैरों की हरक़त
जिससे मनुष्य ने सीखा कत्थक
ताथेई…….ताताथेई…….. ताथेई…….. ता….
घनी हरियाली में छुपती
सिर्फ़ बेचैन आत्मा को दिखती…..कोयल की कूक
उस पल के नाजुक संतुलन में विफलता
सच को देख पाने, सह जाने और कह पाने में चूक
बाक़ी बस कलेजे के अनंत सूराख
में बरबस उठती हूक.
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उत्तररामचरित का एक श्लोक हिन्दी में
पड़ते हैं हृदय पर घन मार घन
टुकडे टुकडे तब भी हुआ नहीं मन
काया चाहे अकुलाए बार बार मोहवश
लेकिन मूर्च्छित नहीं है तब भी चेतन
एक आग सी लगती है सारी देह में
फ़िर भी भस्म नहीं हुआ है ये तन
कितने ही प्रहारों से भेदे मर्म विधि
नहीं होता, नहीं होता, नहीं होता नष्ट ये जीवन.
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विद्याधर
पुरानी किताब पलटते पलटते
पड़ी एकाएक निग़ाह
ओह!
यह तो पंख है
उसी सुनहरी तितली का
जिसके पीछे बरसों दौड़ा किया था
मैं.
एक पल पकडी ही गयी
तितली
आह!
कैसी थरथराती छुअन
कैसे चितकबरे धब्बे सुनहरे पंख पर
जैसे धरती से फूटा इन्द्रधनुष.
किताब, कापी के पन्नों के बीच दबा
तितली का पंख विद्या देता है
बताया गया था मुझे.
पंख नुचा, तितली मरी
मैं बना विद्याधर !
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वसीयत
छूट गयीं जो अधूरी, मुलाकातें तुम्हें देता हूँ
हों न सकी जो बातें, तुम्हें देता हूँ
जो कवितायें लिख न पाया, तुम्हें देता हूँ
जो किताबें पढ़ न पाया, तुम्हें देता हूँ
मर कर भी न मरने की यह वासना
स्मृति की बैसाखियों पर जीने की यह लालसा
तुम्हारी कल्पनाओं, यादों के आकाश में
तारे की तरह टिमटिमाने की यह कामना
यह भी तुम्हें देता हूँ
जहाँ से शुरू होती है आगे की यात्रा
वहाँ से साथ रहना है सिर्फ़ वह जो किया
अपना अनकिया सब का सब
पीछे छोड़
कभी वापस न आने का वादा
तुम्हें देता हूँ.
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समुद्र किनारे मीरा
तुम्हारी बाट देखते देखते
मैं स्वयं आ पहुँची तुम तक
मेरे समुद्र श्याम
अब तो अपनी बनाओ मुझे – निठुर
मत भरमाओ मुझे
मत छलो स्वयं को अब और
ये जो उठती लहरें
जिनकी बेचैनी बढ़ती पल प्रतिपल
ये लहरें नहीं तुम्हारे गहन अंतस में
छुपी उत्कंठाएँ हैं – लालसाएँ हैं ये – प्रिय मेरे.
यह जो विस्तार फैला वहाँ तक दूर तलक
यह विस्तार तुम्हारे पुष्ट, सांवरे वक्षस्थल का है
समुद्रश्याम
अँकवार लो मुझे
यह जिसे सब अस्ताचलगामी सूर्य सा देख रहे हैं
यह तो है स्यांतक मणि
द्विगुणित कर रही अपनी शोभा
तुम्हारे वक्षस्थल के मादक वर्ण से
तुम्हारा वक्षस्थल जिसके वर्ण में
घुल मिल गया है मेरी पुतलियों की
आतुरता का वर्ण
जिसमें समा गयी है मेरी आंखों की प्रतीक्षा
इतने लोभी हो तुम सांवरे,
तुमने मन ही नहीं, वर्ण भी हर लिया है
समर्पिता का
खड़ी हूँ तुम्हारे किनारे
यहाँ आ पहुँचने के बाद
उत्कंठा से – लज्जा से आरक्त
वैदूर्यमण्डित, स्यांतकसज्जित
तुम्हारे वक्ष के वाष्प से पूरित
आपादमस्तक प्रेमालोकस्नाता स्त्री मैं
खड़ी हूँ तुम्हारी पुकार की प्रतीक्षा में
तुम्हारे स्पर्श की बाट जोहती – साँवलिया !
पगतलों में अपनी लालसा लहरों से गुदगुदी करके
सताओ मत निर्दयी
पल पल खिसकती है पाँव तले से धरती
डर लगता है ना………नाथ जी!
पगतल को गुदगुदा कर लौटती हर लहर
रेत को ही नहीं थोड़ी थोड़ी कर मुझे भी ले जाती है
अपने साथ…..
कितना मीठा है डर ………..कितना मादक धीरे धीरे रीतना……
अब न लौटूँगी कान्हा…..पूरी की पूरी रीते बिना
लौटने में चमकता अँधेरा है……..स्वर्ग का…..धर्म का..
डरती हूँ घिर ना जाऊँ सदा के लिए चमकीले अंधेरे में
छोड़ आई सब कुछ पीछे
मेड़ता, मेवाड़, वृन्दावन……. सारे रण
पीछे छूट गए हैं तुम्हारी सखी से…….रणछोड
सम्मुख है केवल नील ज्योति प्रसार
शुद्ध श्यामल पारावार
तुम्हारा अनंत प्यार
विराट वक्ष – मेरे एक आधार
अब ना लौटाओ मुझे
बढ़ाओ बाँहें समा लो मुझे …..छुपा लो
छुपा छुपी में अब तो खिला लो मीता
अपनी मीरा को
लो मुझे……..मैं आई……..समुद्रश्याम
(originally published in Pratilipi)
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hope u r on kavitakosh.org
आदरणीय ,आपकी कविताये पढ़ी,खूब है..मैंने भी आपकी और अपना नया गजल संग्रह भेजा है,मिलगया होगा. आपकी स्वीकृति की रह देख रहा हूँ.
आपका
राकेश अचल
ग्वालियर
बहुत ही रोचक धन्यवाद,
nice to hear from a poet. thanks
आत्मा का मुक्त पंछी फिर किलोरें भर रहा है
काट कर हर पाश को फिर उड़ रहा है !
बहुत सुन्दर उदगार हैं इन अभिव्यक्तियों में . ह्रदय की अकुलाहट है और नितांत सच्चाई जो मधुर भी है . साधुवाद
sublime…..
भाषा के पट बंद करो अब
तरसें हम ऐसे चुम्बन को
आजीवन अनवरत सदा से
देह पाए स्पर्श अलौकिक .
सागर जल भिक्षा मांगे – मोती
तोड़ तनिक तो भित्ती .
तड़प कुमुदिनी हाय कैसे ,
खोजे उन्मादी प्रेमी को !
नित्य निशा, मैं खोलूं खिड़की
कहूँ चाँद से आ मिलने को
ढक मेरे मुख को अपने से .
भर श्वान्से अपनी मेरे में .
भाषा के पट बंद करो अब ,
खोलो खिड़की प्रेम राग की .
चाँद नहीं आता द्वारे से ,
झांके वह केवल खिड़की से !