diversity and multi-vocality of Hindu tradition.

Vaishnva sadhu Anantdas was the first biographer of Kabir, he wrote his Kabir-Parchai in CE 1588. In one episode, he tells us about the petition which the religious leader of Kashi made to Sikandar Lodhi, accusing Kabir of hurting the sentiments of Hindus and Muslims both. The petitioners are content describing Kabir’s “anti-Muslim” stance by just saying that he has stopped living like a Muslim; but about Hinduism, they refer to a whole lot of practices and belief-structures.
The point to be noted here is the inherent diversity and multi-vocality of Hindu tradition. This a characteristic which makes a ‘definite and fixed definition’ of Hinduism a very difficult task. It also baffles those whose eyes are fixated at fixing all phenomena once and for all.
Incidentally, this episode also underlines the tremendous influence Kabir must have enjoyed, which annoyed the self-proclaimed community and identity representatives
I am posting these paragraphs from ‘Akath Kahani Prem ki…’ citing from Anantdas’s parchai in continuation of a  dialogue with my dear friend Devdutt Pattanaik

कबीर के समकालीन ( उनके प्रशंसक हों या विरोधी) उनकी विशेषता भली भाँति समझते थे। उनकी कविता एक यदि करती थी तो उन्हीं को करती थी जो सामाजिक पहचान से ज्यादा मोल अनभय और अनुभव का मानते थे। बाकी लोगों के बारे में तो, अनंतदास बताते हैं: काशी के हिन्दू और मुसलमान नेता, भद्रजन, अपने अपने समुदाय के नेतृत्व का दावा करने वाले “प्रतिनिधि” गण कबीर की कविता के कारण नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध एक होकर पहुँचे थे सिकंदर लोदी के हुजूर में। बादशाह हैरान, परेशान—एक अदना जुलाहे ने ऐसा क्या गजब ढा दिया? पूछने लगा: भई मामला क्या है? उसने क्या किसी का माल मार लिया है? किसी की जमीन दबा ली है? गाँव-परगना छीन लिया है?
काशी के हिन्दू-मुसलमान प्रतिनिधियों का जवाब लाजवाब है। लाजवाब और दो टूक। उनकी माँग भी उतनी ही स्पष्ट है: इस ‘अमारग’ चलने वाले, हिंदू, मुसलमान दोनों से न्यारा चलने वाले (आजकल के मुहाविरे में, ‘ भावनाओं को ठेस’ पहुँचाने वाले) कबीर को फौरन काशी से निकाल दिया जाए:
कहै सिकंदर क्या है भाई।
गांव प्रगना लिया छिनाई।।
गांव-प्रगना नहीं लिया।
जुलाहै ऐक अमारग किया।।
मुसलमांन की छोड़ी रीती।
अरु हिन्दू की भानैं छीती।।
निंदै तीरथ, निंदै बेदू।
निंदै नवग्रह सूरज चंदू।।
निंदै संकर निंदै माई।
निंदै सारद गणपति राई।।
निंदै ग्यारस होम सराध्य।
निंदै बांभन जग आराध्य।।
निंदै मातापिता की सेवा।
बहन भांणजी अरु सब देवा।
निंदै सकल धरम की आसा।
षट दरसन अरु बारह मासा।
ऐसी बिधि सब लोक बिगारा।
हींदू मुसलमान तैं न्यारा।।
ता तैं हमैं मानैं न कोई।
जब लग जुलहा कासी होई।।
( मुसलमान होते हुए भी इसने मुसलमानों के रीति-रिवाज त्याग दिए हैं। हिंदुओं के रीति-रिवाजों की भी निंदा करता है। वेद, तीर्थ, नवग्रह, व्रत, श्राद्ध—सभी की निंदा करता है। और तो और जगत के पूज्य ब्राह्मणों की निंदा करता है। हिन्दू, मुसलमान दोनों से न्यारे इस कबीर ने लोगों को बिगाड़ दिया है, इसके काशी में रहते हमारी कोई नहीं सुनने वाला।)
असली संकट यही है—“तातैं हमैं मानैं न कोई”। हाशिए तक सीमित आवाज होती कबीर की, तो मुल्लाओं और ब्राह्मणों को ‘साह सिकंदर’ को जहमत न देनी पड़ती, खुद ही इस आवाज से निबट लेते। यह एक और धर्म की स्थापना के लिए उत्सुक आवाज होती तो भी शायद एडजस्टमेंट हो जाता। ऐसी आवाज कभी मुल्लाओं के विरुद्ध ब्राह्मणों के काम की होती तो कभी ब्राह्मणों के विरुद्ध मुल्लाओं के काम की। लेकिन यह तो धर्मसत्ता मात्र के विरुद्ध मनुष्य की आत्मसत्ता की आवाज है। तरह-तरह की सामाजिक अस्मिताओं के “प्रवक्ताओं” के विरुद्ध विवेकवान व्यक्तिसत्ता की आवाज है। जो व्यक्ति यह आवाज दे रहा है, उस पर न प्रलोभनों का असर हो रहा है, न घर वालों के समझाने-बुझाने का—यह आदमी खतरनाक है।

चौराहे पर पुतला ( ‘नया ज्ञानोदय’ फरवरी में प्रकाशित कहानी)

चौराहे पर पुतला।

मुख्यमंत्री सिंह साहब और पंडित गंगाधर के कदम एकदम मिले हुए थे। दोनों महानुभावों का ताल्लुक परस्पर विरोधी राजनैतिक पार्टियों से था, लेकिन यहाँ दोनों नेता राजनैतिक मतभेदों से उसी तरह कोई छह इंच ऊपर उठ कर चल रहे थे जैसे कि ‘अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा’ वाली हरकत करने के पहले युधिष्ठिर का रथ चला करता था। दोनों के नेतृत्व में चलते जन-समूह में भी राजनैतिक जुलूसों वाला छिछोरा जोश नहीं, धार्मिक चल-समारोह सरीखा भावपूर्ण उत्सव था। दृश्य भी ऐन वैसा ही– सबसे आगे शहनाई बजाने वाले अपनी चमकीली अचकनों में, फिर बैंड वाले अपनी दमकीली पोशाकों में, रास्ते पर पुष्प-वर्षा करते युवक-युवतियाँ,मुख्यमंत्रीजी और गंगाधरजी साथ-साथ। फौजी लोग क्या कदम मिलाएंगे, जिस तरह गंगाधरजी मुख्यमंत्री से कदम मिलाए हुए थे। मामला संस्कृति का था, और गंगाधरजी की पार्टी तो जानी ही सांस्कृतिकता के लिए जाती थी। जिस विवाद का हल करने आज जा रहे थे, उसके प्रसंग में भी इन मुख्यमंत्री ने,जो विवाद आरंभ होने के समय विधायक ही थे, और इनकी पार्टी ने तो शुरु में दुष्ट तत्वों का ही साथ दिया था, और आज देखो, ऐसा जता रहे हैं, जेसे जन-भावनाओं का सारा बोध इन्हीं को है…याने, मेहनत गंगाधरजी और उनकी पार्टी के लोग करें, विवाद की आँच सुलगाएँ, भावनाओं के आटे को हौले-हौले भून-भून कर, उपयुक्त मात्रा में शब्दों की शर्करा और चतुराई का घृत मिला कर; सुनहरी, स्वादिष्ट पंजीरी बनाएँ और जब प्रसाद बँटने का समय आए तो मुख्यमंत्री ही बाँटने वाले भी बन जाएँ और पाने वाले भी—यह भला कैसे हो सकता है। इसीलिए उम्र में मुख्यमंत्री से आगे होते हुए भी, गंगाधरजी कटिबद्ध थे कि संस्कृति के इस प्रसाद-वितरण समारोह में मुख्यमंत्री को आगे न होने देंगे।

प्रोफेसर रवि सक्सेना भी कोशिश तो जी-तोड़  कर रहे थे, दोनों नेताओं के साथ कदम मिला कर चलने की, लेकिन कामयाबी की राह में रोड़े बहुत थे। बरसों पहले वे इस नगर में लेक्चरर होकर आए थे। नौकरी तो एमए करते ही पा गये थे, लेकिन पीएचडी करने में बीस साल लगा दिये थे, सो भी वाइस-चांसलर के धमकाने पर ही की थी। पीएचडी के लिए समय निकालना मुश्किल यों था कि रविजी का अधिकांश समय पढ़ने-लिखने जैसे तुच्छ कामों में नहीं, छात्रों को क्रांति के लिए तैयार करने में गुजरता था या फिर साथी अध्यापकों को अपने ज्ञान से कायल करने और अपने प्रिय छात्रों से घायल करवाने में। दीगर सामाजिक दायित्व भी थे। मसलन, जो आज होने जा रहा था, उसे ही प्रगितशील शास्त्रसम्मता प्रदान करने में सक्सेनाजी ने पिछले कई साल लगा दिये थे। खूबी यह थी कि ऐसा करते समय वे मुख्यमंत्री और गंगाधरजी दोनों की पार्टियों की निंदा करके अपनी सत्ता-विरोधी छवि भी बनाए रखते थे। वे तथा उनके मौसेरे भाई अरुण काँख ढँकी रखते हुए ही मुट्ठी तनी दिखाने की कला में माहिर थे। अरुण तो मुख्यमंत्रीजी की पार्टी को भर मुँह गालियाँ देते देते ही, उन्हीं की कृपा से पिछले कई वर्षों से यूरोप में हिन्दी-सेवा कर रहे थे, दोनों बेटियाँ आईटी प्राफेशनल्स का पति-रूप में वरण कर आनंदपूर्वक अमेरिका में निवास कर रही थीं। रवि इस लिहाज से थोड़े पिछड़ गये थे, अभी तक यहीं इसी पिछड़े देश में पड़े थे। कलेजा फुँकता था, अपने इस पिछड़ेपन पर…करें क्या, यह नालायक जया…लाइफ वर्स करके रख दी है, अपने बेटर हाफ ने…अब इसी प्रसंग को लो…

खैर, जया का उपचार तो बस कुछ देर में हुआ ही चाहता है, अभी तो यहाँ ध्यान लगाएं, चल-समारोह में। इसमें शामिल होने को लेकर काफी पशोपेश से गुजरे थे प्रोफेसर साहब, अब तक तो रणनीति एकांत में मुख्यमंत्री की मुसाहिबी करने और खुले में उनकी खिल्ली उड़ाने की ही रही थी, मैनेज भी बखूबी कर लेते थे। लेकिन पिछले कुछ दिन से मुख्यमंत्री कामना करने लगे थे कि जो सुखद अहसास रवि उन्हें एकांत में प्रदान करते हैं, उसकी सार्वजनिक प्रस्तुति भी हो ही जाए। अब रवि क्या करें? ‘कोई बात नहीं, अपना लक्ष्य महत्वपूर्ण है, और रणनीति स्पष्ट। अरुण की ही तरह का चक्कर चलाना है। अब मुख्यमंत्री चाहते हैं तो यही सही, एकांत-सेवा की सार्वजनिक प्रस्तुति ही सही। वैसे भी, जहाँ तक आज के आयोजन का सवाल  है, आइडिया तो अपना ही था। बौद्धिक समर्थन देते ही रहे हैं, चलो, शामिल भी हो जाते हैं। काँख जरा सी और उघड़ेगी जरूर, कोई बात नहीं, मौका मिलते ही, फिर से ढाँप लेंगे। और फिर, चल-समारोह में मुख्यमंत्री के साथ चलते-चलते खिंचवाए गए फोटो काम तो आएंगे ही, थानेदार से ले कर वाइस-चासंलर तक’।

लेकिन आज, जब रवि मुख्यमंत्री और गंगाधरजी के कदमों से कदम मिला कर, कैमरों के जरिए आमो-खास के आकलन में वीआईपी स्टेटस हासिल करने के चक्कर में थे, तब…मुख्यमंत्री की कनखियों की भाषा समझने वाले सुरक्षाकर्मियों ने प्रोफेसर साहब को उनकी उचित जगह पहुँचा दिया था, याने चल-समारोह के दोनों नेताओं से कोई बीस कदम पीछे।

रवि सक्सेना को प्रेमचंद का अमर कथन बड़ी शिद्दत से याद आ रहा था, ‘साहित्य राजनीति के पीछे नहीं, आगे चलने वाली सचाई है…’ और उनका मन उपन्यास-सम्राट को जबाव भी दे रहा था,  ‘होगी आपके ख्याल में जनाब, हकीकत हम तो जानते ही हैं, आप भी देख लीजिए’। प्रेमचंद पर खीझ के साथ, रविजी को जया पर भी एक बार फिर से गुस्सा आने लगा था—‘उसी की वजह से पिछले बीस साल तबाह हो गये…बनती है इंटेलेक्चुअल की औलाद…मुझ सरीखे फर्स्ट क्लास, लेफ्टिस्ट इंटेलेक्चुअल की अंडरस्टैंडिंग कामरेड होने तक की सांस्कृतिक जिम्मेवारी तो ठीक से निभा नहीं पाई… पुतला छाया रहता था देवीजी के ऊपर, ‘क्या होगा पुतले का? लोग क्यों पीछे पड़ गये हैं बेचारे के?’

पुतला…पुतला…काश कोई इस हरामजादे पुतले को बम से ही उड़ा देता, कलात्मकता के नाम पर पतनशील सामंती संस्कृति को चौराहे पर परोसता, बेहूदा, लुगाई-लुभावन कमीना पुतला…पति साले के सारे मूड का, उन प्रेम-पलों से लेकर जीवन के सारे  पलों तक के लिए पटरा हो जाए, हमारी देवीजी तो अपनी कामना के पटरे पर पुतले को ही पधराए रहेंगी…कुछ कह दो तो समता-स्वाधीनता बखानने लगेंगी, स्टुपिड कहीं की.. मैं कब तक झेलता ऐन निजी पलों में होने वाला यह अनाचार; प्रगतिशीलता के चक्कर में कब तक उस हरामी पुतले को इजाजत देता कि वह मेरी लुगाई को लुभाता रहे.. प्रगतिशील हूँ, वामपंथी हूँ, नामर्द तो नहीं…’

‘धत्तेरे की, क्या हो रहा है यार मुझे, यह साला मेल शाविनिज्म मेरी चेतना में क्यों घुसा जा रहा है…नहीं, नहीं, नहीं… मर्द-नामर्द की बात नहीं, मैंने तो सार्वजनिक नैतिकता की रक्षा करने के जनवादी कर्तव्य का निर्वाह किया है। डिक्लास, वर्गच्युत तो अपने आप को न जाने कितने लोग करते आए हैं, इस साले पब्लिक एनेमी नंबर वन पुतले का उपचार करने के लिए, अपने ही नहीं न जाने कितनों के दांपत्य-जीवन की रक्षा करने के लिए मैंने तो स्वयं को विचारच्युत किया है। इतिहास-देवता मेरे इस बलिदान पर कितने खुश होंगे…’ इतिहास-देवता के भव्य दरबार में खुद को खिलअत पहनाए जाने  की कल्पना करते ही रवि रोमांचित और पुलकित हो उठे, लेकिन इतिहास–देवता के सामने पेशी जब होगी तब होगी, अभी तो यहाँ फोटो खिंचाने तक के रास्ते में मुख्यमंत्री के दुष्ट सुरक्षा-कर्मी आ अड़े थे, लेकिन, कोई बात नहीं…जैसे अपन पब्लिक में मुख्यमंत्री से दूरी बरतने को मजबूर हैं, वैसे ही मुख्यमंत्री भी तो…

मुख्यमंत्री  की मजबूरी समझते ही प्रोफेसर रवि सक्सेना पूरमपूर क्षणजीवी हो गये। वर्तमान क्षण का सत्य तो  यही है कि पुतले की बदमाशी का उपचार होने में बस कुछ ही पल की देर है। जया पड़ी दिखाती रहे, पुतले के प्रति करुणा, सराहना, चाहना और ना जाने क्या, क्या…विजय ने तो मेरा वरण कर ही लिया है। इस विजय-वरण के मनमोहक, मादक स्वरूप पर मोहित होते रविजी रोक नहीं सके खुद को जयकारा उछालने से, ‘सिंह साहब की जय हो, गंगाधरजी की जय हो…’

दोनों जयकारे एक साथ लगाए जाएं यह उस अलिखित समझौते का केंद्रीय प्रावधान था, जिसके तहत सिंह साहब और गंगाधरजी के कदम मिल कर उठ रहे  थे। विवाद का अंत करने की सद्भावना का ही प्रमाण यह फैसला भी था कि कोई राजनैतिक नारे इस जुलूस में नहीं लगेंगे सिवा सर्वमान्य नारे ‘भारत माता की जय’  के। और,मुख्यमंत्रीजी की जय या गंगाधरजी की जय को तो राजनैतिक नारा कहा नहीं जा सकता। आखिरकार, जिस विवाद के अंत का आज उत्सव मनाया जा रहा था, उसकी समाप्ति भारत माता की जय की सूचना तो देती ही थी; साथ ही दोनों महानुभावों की जय की भी। सो, चल-समारोह में शामिल भाव-विह्वल लोग बारंबार जयकारे कर रहे थे। तीनों स्वीकृत जयकारों–भारत माता की जय, मुख्यमंत्री सिंह साहब की जय और गंगाधरजी की जय—की बारंबारता के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता था कि जयकारे के  असली पात्र सिंह साहब और पंडितजी ही थे, भारत माता तो बेचारी राजनीति और संस्कृति के गुरु-गंभीर पाठ के पन्ने पर छोटा सा फुटनोट थी। रवि सक्सेना तो भारत-माता की अवधारणा को सिद्धांतत: ही दक्षिणपंथी भ्रम मानते थे, सो उन्होंने पूरे चल-समारोह में यह फुटनोट एक बार भी नहीं लगाया; गले की सारी ताकत असली जय पर ही केंद्रित रखी।

दोनों नेताओं के कानों में रवि सक्सेना के उछाले असली जयकारे सुख ढाल रहे थे। दोनों ने लगभग एक ही साथ पुचकारती निगाहों से रवि सक्सेना को देखा, लेकिन रविजी को बीस कदम का प्रोमोशन देकर अपने साथ चलने की अनुमति देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

यह सचमुच उत्सव का दिन था। पिछले बीस सालों से नगर ही नहीं, सारा देश जो संताप झेलता  रहा था, आखिरकार उसके अंत का दिन। हालाँकि कुछ लोग अभी तक संतप्त थे, संताप का अंत वे भी चाहते ही थे, हालाँकि किसी और विधि से। लेकिन विधि के विधान के बारे में तो बात वही पुरानी, ‘मेरे मन कछु और है विधना के कछु और’…। वक्त अपनी राह बढ़ता गया था; किसी और विधि की तलाश में लगे संतप्तों की तादाद घटती चली गयी थी। बचे-खुचे जो रह गये थे, वे और अधिक संतप्त थे, क्योंकि इन्होंने मुख्यमंत्री से उम्मीद बाँध रखी थी कि विवाद का अंत गंगाधर जैसे लोगों के दबाव में आए बिना, अच्छी तरह सोच-विचार कर किया जाएगा। बीस साल के अरसे में, गंगाधर तो वहीं के वहीं थे, लेकिन मुख्यमंत्री ये पाँचवें थे, और गंगाधर के विरोधियों को इन्हीं से सबसे ज्यादा उम्मीदें थीं। उम्मीद इन लोगों को विवाद पर विचार करने के लिए बनाए गये जस्टिस लेबयान आयोग से भी थी। लेकिन न्यायमूर्ति लेबयान ने भी फैसला अंत-पंत गंगाधरजी के मन-माफिक ही दिया था, और बचे-खुचे संतप्त ‘कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नजर नहीं आती’ की मनोदशा  को प्राप्त हो गये थे। उनकी निराशा का आलम यह था कि अपना बचा-खुचा संताप किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के जरिए व्यक्त करने की भी न उनके पास हिम्मत बची थी, ना ख्वाहिश। जो भी ख्वाहिशें बची थीं, वे फेसबुक और ट्वीटर के जरिए निंदा, कुंठा, संत्रास आदि की सर्जनात्मक अभिव्यक्तियों तक सिमट गयी थीं। असली दुनिया के हाशिए पर धकेल दिये गये संतप्त आभासी दुनिया में अपना कल्पनालोक सँवार रहे थे, सारे घटनाक्रम को नींदते, मुख्य-धारा को दूषते पुण्य-श्लोक उच्चार रहे थे। आभासी दुनिया के भीतर भी जोखिम कम नहीं थे, क्या जाने किसको कौन सी बात किस कारण खटक जाए; और आभासी दुनिया में की गयी आभासी टीका-टिप्पणी पर बिल्र्कुल ठोस टिप्पणी करने इलाके का थानेदार, आईटी एक्ट की धारा 66-ए से लैस आपके सर आ धमके। लेकिन फिर भी…

लेबयान आयोग की रिपोर्ट आने के बाद गंगाधरजी ने विजय-दर्प की हुंकार छोड़ी थी, और मुख्यमंत्रीजी ने पिंड छूटा वाली राहत की साँस। वे रिपोर्ट पर फौरन अमल करना चाहते थे। धनतेरस के दिन पुष्य-नक्षत्र का योग सोने की खरीदारी के लिए तो श्रेष्ठतम जाना ही  जाता है, वैसे भी परम शुभ योगों में इसकी गणना होती है। मुख्यमंत्रीजी ने तय किया था कि यह शुभ काम पुष्य नक्षत्र में,  धनतेरस के शुभ दिन ही संपन्न होगा। दुष्ट लोग भले ही सोने की खरीदारी से वोटों की खरीदारी की तुक मिलाते रहें, मुख्यमंत्री ऐसे तुक्क्ड़ों की परवाह करें तो हो चुका राज-काज। बीस सालों से चले आ रहे विवाद का निपटारा धन-तेरस के दिन होने का राजनैतिक संदेश यह था कि मुख्यमंत्री दिवाली का तोहफा दे रहे हैं।  इसीलिए बाकी आयोगों की रपटों के लिए भले ही सचिवालय गुमनामी का कब्रिस्तान साबित होता हो, लेबयान आयोग की रपट पर अमल करने में सरकार ने एक महीना भी नहीं लगाया। मुख्यमंत्री ने राजधानी से घोषणा कर दी थी कि वे धनतेरस को नगर पधारेंगे और इस विवाद का अंत हो जाएगा।

मुख्यमंत्रीजी और गंगाधरजी कदम से कदम मिलाते हुए, विवाद के अंत की ओर बढ़ रहे थे। सड़क किनारे खड़े और नाखड़े लोगों की ओर करबद्ध नमस्ते उछालने में भी दोनों के बीच पूरा तालमेल था। लग रहा था, दो सगे भाई इकलौती बहन को भात पहनाने जा रहे हैं। सुरक्षा-कर्मियों द्वारा अपनी सही जगह पर पहुँचा दिये जाने के बावजूद रवि सक्सेना मौका देखते ही मुख्यमंत्री और गंगाधर से चिपकने के गुंताड़े में पड़ जाते थे, हालाँकि जरा सी सफलता मिलते ही सुरक्षाकर्मी उन्हें फिर से पीछे धकेलने में पल भर की भी देर नहीं करते थे। लेकिन रवि क्या कम थे, समारोह के आगे-आगे उल्टे चल रहे फोटोग्राफरों के कैमरों में कम से कम दो-तीन बार तो मुख्यमंत्रीजी और गंगाधरजी के साथ दर्ज होने में कामयाबी उन्होंने पा ही ली थी। अपनी गुंताड़ेबाजी में रवि सक्सेना भात पहनाने जा रहे संपन्न सगे भाइयों के दरिद्र, दूर के रिश्ते के भाई जैसे लग रहे थे। सुरक्षा-कर्मियों को रवि की गुंताड़ेबाजी पर कभी खुंदक आती थी, कभी हँसी। इस तरह की हँसियों, खुंदकों, गुंताड़ों और बैंड-बाजों को साथ लिए हुए, यह जनसमूह वैसे ही जा रहा था जैसे भात पहनाने वाला भाई बहन को आश्वासन देने जाता है कि ब्याह की खुशी में भी बहन के साथ है  और जोखिम में भी। मुख्यमंत्रीजी और देशप्रेमीजी चौराहे पर खड़े पुतले को आज बताने जा रहे थे कि उसके अकेलेपन और निर्वासन के दिन दूर करने में, तमाम राजनैतिक मतभेदों के बावजूद दोनों नेता साथ हैं। जैसे भात के चल-समारोह में सबसे आगे भात का सामान थालों में  सजा कर ले जाया जाता है, वैसे ही इस चल-समारोह में मुख्यमंत्री और गंगाधरजी के ठीक पीछे-पीछे दो युवक विवाद-समाधान की सामग्री के थाल श्रद्धा और प्रेमपूर्वक हाथों में लिए चल रहे थे।

विवाद-ग्रस्त पुतला संगमरमर का था, सो निर्जीव ही कहलाएगा। लेकिन इंसान की शक्ल में ढलते ही पत्थर में भी कुछ तो इंसानियत आ ही जानी चाहिए, और इंसान अकेलापन कितनी देर सह सकता है? एकांत के बड़े से बड़े साधक को भी किसी न किसी पल दूसरे की जरूरत पड़ती है। अकेलेपन की महिमा साधने वाले साधक और पैगंबर भी अनुयायियों की तलाश में निकलते हैं। इंसान तो इंसान, भई आखिर जब परब्रह्म को भी कहना पड़ा कि एकोहं बहुस्याम-अकेला हूँ, बहुतों में बदल जाऊँ—तो हमारी आपकी क्या औकात।

खुशी या ग़म या गुस्से के पलों में तो इंसान को दूसरों की जरूरत और भी ज्यादा महसूस होती है। इस विवाद में भी कोई इंसान अकेला नहीं था, विवाद में वह इस तरफ हो या उस तरफ। मौका खुशी का हो या ग़म का, जीत का हो या हार का…हरेक के साथ कोई ना कोई था, हरेक किसी ना किसी के साथ था। अकेला था तो वह पुतला था, जिसको लेकर सारा विवाद था। संगमरमर में ढला वह इंसान पिछले बीस साल से अकेला था। फैन-क्लब बनाने के चक्कर में, सुंदरी-सहानुभूति बटोरने के चक्कर में अकेलेपन के गीत अलापते कवियों-कलाकारों के विपरीत, यह संगमरमरी पुतला सचमुच अकेला था। दुनिया के सारे मजे लूटते, साल के अधिकांश दिन यूरोप के एग्जाटिक स्थानों में बिताते, फिर भी स्वयं को उत्पीड़ित, निर्वासित बताते; करुण की सृष्टि करने की कोशिशों में वीभत्स का संचार करते कथाकारों-लेखकों के आत्म-घोषित निर्वासन के विपरीत, यह पुतला सचमुच निर्वासित था। विवाद के केंद्र में वह जरूर था, लेकिन विचार के केंद्र तो क्या,  हाशिए तक पर उसे कोई जगह हासिल ना थी।

उसकी जगह थी, बरसों से चले आ रहे अकेलेपन और निर्वासन में। चौराहे पर कहा जाने वाला संगमरमरी पुतला, अपने निर्वासन में चौराहे के एक कोने पर खड़ा था, कुछ दिन उसने भी चौराहे की रौनक देखी भी, उसमें कुछ अपना योगदान भी किया। बनाने वाले कलाकार का ही था यह विचार कि पुतले को चौराहे के हरियाले गोलंबर में नहीं, बल्कि उसके बाहर जहाँ दो सड़कें मिल रही हैं, वहाँ खड़ा किया जाए; इस तरह पुतला लोगों के आने-जाने के बीच पड़ता नहीं, उनके साथ होता लगेगा। कुछ दिन तक सब ठीक-ठाक रहा, लोग पुतले को देख मुस्कराते थे, पुतला भी उन्हें मुस्कराते देख खुश हो लेता था। लेकिन, जल्दी ही विवाद शुरु हो गया और फिर उसे वहीं खड़े-खड़े निर्वासित कर दिया गया था। उसके खड़े होने की जगह को ईंटों की गोल दीवार से घरे दिया गया। इस दीवार में एक दरवाजा भी था, लेकिन ताला-जड़ा।

पिछले बीस बरस से वह गोल दीवार के भीतर था, यहाँ तक कि उसके सर पर भी सीमेंट का चंदोवा तान दिया गया था, लक्ष्य यह था कि कोई उसे देख ना पाए—ना सड़क से, ना आस-पास के छज्जों और छतों से। पुतले का निर्वासन काला पानी भेज दिए गये बंदी का निर्वासन नहीं, अपने ही घर में नजरबंद कर दिये गये मनुष्य का निर्वासन था। उसका अकेलापन दीवार में जिन्दा चुनवा दिए गए इंसान का अकेलापन था। वह इस अकेलेपन को झेलते-झेलते थक चुका था, कभी-कभी  तो वह स्वयं ही टूट जाना चाहता था, लेकिन विवाद का एक पक्ष कहता था, हम तुझे मरने नहीं देंगे; और दूसरा ताल ठोंकता था कि हम तुझे जीने नहीं देंगे।

आज का दिन, विवाद की समाप्ति का ही नहीं  गोल दीवारों में कैद, चंदोवे में कैद पुतले की यंत्रणा की समाप्ति का दिन भी था। विवाद समाप्त होने से लोग बेहद खुश थे, उम्मीद करनी चाहिए कि पुतला भी खुश ही रहा होगा। दीवार के बाहर आकर, खुला आसमान फिर से देखने का मौका पाकर भला कौन खुश नहीं होगा, इन्सान हो या जानवर या फिर पुतला।

 

पुतले के अकेलेपन, संस्कृति के विलाप और नगर से देश तक फैलते  संताप की यह कथा आरंभ होती है, बीस बरस पहले।

पुतले का इस चौराहे के कोने पर खड़ा होना ऐसी कोई बड़ी बात नहीं थी। नगरपालिका ने अभियान चलाया था, नगर के सुंदरीकरण का; इसलिए किसी चौराहे पर पत्थर के मोर जड़े गये ताकि नयी पीढ़ी  ‘एक जानवर ऐसा जिसके सिर पर पैसा’ वाली पहेली को बूझने के क्लू सड़क चलते-चलते हासिल कर सके; कहीं नर्तक-नर्तकी प्रतिमाएं खड़ी कर दी गयीं कि आते-जाते लोग स्वयं नृत्य करें ना करें, उनके मन-मयूर तो नृत्य कर ही लें। यह सब पुतले-प्रतिमाएं बनवाए गये बड़े-बड़े कलाकारों से, उन्हें कला-कल्पना की छूट भी दी गयी ताकि नगरपालिका को कलाप्रेमी और महापौर को संवेदनशील होने की प्रतिष्ठा हासिल हो सके। कुछ कलाकारों ने यह छूट इतनी लंबी भी खींच ली कि खुद बनाए, खुदा समझे। ऐसी एक कलाकृति थी काले ग्रेनाइट की वह आकृति जिसे साधारण जन तो खैर क्या खा कर  समझते, अमूर्त कला के पारंगत पारखी भी जिसकी व्याख्या करने में चीं बोल जाते थे। किसी को यह ग्रेनाइट सीधा खड़ा प्रश्नचिन्ह लगता था तो किसी को उल्टा खड़ा मनुष्य। कलाकार से पूछा गया तो उन्होंने तिरस्कार और करुणा के समन्वित स्वर में आर्ट एप्रीशिएन कोर्स शुरु करने की सलाह नगरपालिका को नि:शुल्क दे डाली थी।

अपने कथा-नायक पुतले के निर्माता ने ऐसी कोई अमूर्त कलाबाजी नहीं की थी। उन्होंने तो साँवले संगमरमर का यह पुतला बनाया था, कोई पाँच साल के बच्चे का वह साँवला पुतला वहाँ खड़ा नहा रहा था, सर पर लोटे से पानी ढालता हुआ। लोटे से पानी लगातार गिरता रहे, इसकी व्यवस्था कर ही ली गयी थी। पानी लोटे से गिर, पुतले के सर और शरीर से गुजरता हुआ नाली से निकल जाता था। पुतले के चेहरे पर, मम्मी की मदद के बिना खुद नहाने का आत्म-गौरव, नहाने से आ रहा ताजापन, सहज भोलापन तो साफ पढा ही जा सकता था; लेकिन कहीं वह शरारत भी थी उसके चेहरे में, खड़े होने के अंदाज में, जो अपनी शारीरिक उम्र से कुछ ज्यादा मानसिक उम्र से संपन्न बच्चों में आ जाती है।

बच्चा नहा रहा था, लेकिन शरारती अंदाज में। हालाँकि सभी समझदार लोग मानते हैं कि बच्चा हो या जवान या बूढ़ा, औरत हो या मर्द, स्वास्थ्य के लिहाज से नहाना उसी तरह चाहिए जैसे कि पुतला नहा रहा था। शायद कलात्मकता के साथ-साथ यह स्वास्थ्य-परक सामाजिक संदेश भी देना कलाकार का मंतव्य ही था।

सांवले संगमरमर का बना, निहायत भोला दिखता यह पुतला नंगा नहा रहा था, उसकी कमर में चड्डी या कच्छा या अंगोछा पहनाने की जरूरत कलाकार ने नहीं समझी थी।

पुतले के पक्ष में यह जरूर कहा जाना चाहिए कि उसकी मुद्रा जान-बूझ कर कुछ दिखाने की नहीं थी, लेकिन फिर भी दुनिया देख तो रही ही थी, और दुनिया के कुछ सदस्य जो देख रहे थे उसके आकार-प्रकार; विश्वसनीयता-प्रामाणिकता आदि पर विमर्श भी कर रहे थे। आकार-प्रकार की प्रामाणिकता पर विमर्श के क्रम में यह प्रश्न भी उठा था कि पुतला पाँच वर्ष के बच्चे का है, या आठ-दस वर्ष के बच्चे का। कलाकार से पूछे जाने पर, वे प्रश्न की संवेदनहीनता और प्रश्नकर्ता की बुद्धिहीनता पर उखड़ गये थे, और स्वयं उत्तरहीन रहने का चुनाव कर लिया था। बहरहाल, पुतले की उम्र जो भी रही हो, यह तो था कि जो दुनिया पुतले को देख रही थी, उस दुनिया के कुछ सदस्यों को पुतला चुनौती देता प्रतीत हो रहा था, तो कुछ को आमंत्रण देता।

पुतले की यह बहुलार्थक स्नान-भंगिमा आगे चल कर कविता और अन्य सर्जनात्मक तथा वैचारिक उपक्रमों की भी विषय-वस्तु बनी। लेकिन, पुतले के नग्न-नहान के छींटे उस चौराहे से शुरु हो कर, सारे देश पर पड़ती विवाद की बौछारों में तो कुछ ही दिन में बदल चुके थे।

शुरु के दो-तीन सप्ताह तो खैरियत से ही गुजरे थे। पुतला नहाता रहा, पानी बहाता रहा, लोग आते-जाते, देखते-मुस्कराते रहे। धीरे-धीरे नगर के अश्लीलता-संवेदी राडारों ने अनुभव किया कि साइकिलों, मोटर-साइकिलों पर कालेज जाते लड़के पुतले के पास उतर न भी जाएं, तो रफ्तार जरूर कम कर लेते हैं। यह भी नोट किया गया कि पुतले के पास की पान-दुकानों का बिजनेस एकाएक वृद्धि को प्राप्त होने लगा है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह नोट की गयी कि कालेज जाती लड़कियों के झुंडों के कदमों की रफ्तार उस चौराहे पर ध्यातव्य ढंग से घटने लगी थी, और उनकी खी-खी का वाल्यूम बढ़ने लगा था। लड़के-लड़कियों की ही नहीं, अच्छे खासे सद्गृहस्थों की चाल में भी उस चौराहे पर धीमापन आने लगा था, वाहन चलाने वाले आपस में टकराने लगे थे। चाल पर पड़ने वाले ये कुप्रभाव चाल-चलन पर पड़ रहे कुप्रभाव के परिणाम भी थे और प्रमाण भी। नगर के गंभीर संस्कृति-प्रेमी लोग इस निष्कर्ष को प्रकाशित करने पर बाध्य हुए कि पुतले के कारण बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा है। अधिक सच्चे निष्कर्ष को अप्रकाशित रखने में ही बुद्धिमत्ता समझी गयी थी– पुतले के कारण बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, भाई-बापों के आत्म-विश्वास पर शोचनीय प्रभाव निस्संदेह पड़ रहा था।

बात गंगाधरजी के नोटिस में लाई गयी। वे अपनी पार्टी के कदरन समझदार नेताओं में गिने जाते थे, उन्होंने बात का बतंगड़ बनाने में पहले तो कोई रुचि नहीं ली; लेकिन जब उन्हीं की पार्टी के घनश्याम महाराज को पुतले के नग्न-नहान में राजनैतिक तीर्थ-लाभ की संभावनाएं नजर आने लगीं, तो गंगाधरजी गंभीर होने पर विवश हुए। उन्होंने पुतले द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता की निंदा करते हुए एक बयान तो जारी कर ही दिया, अपनी पार्टी के पार्षदों को निर्देश भी दे दिया कि नगर-पालिका में पुतले को हटाने का प्रस्ताव फौरन पेश कर दें।

तुरंत ही नगर के लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, कला-प्रेमियों, ललित-कला महाविद्यालय के छात्रों-अध्यापकों ने प्रतिक्रिया की। बयान जारी करके गंगाधरजी और उनकी पार्टी की इस माँग को फूहड़ और संस्कृति-द्रोही निरूपित किया, नगर-पालिका को ऐसे तत्वों के दबाव में ना आने की चेतावनी भी दे डाली। प्रोफेसर रवि सक्सेना भी इन लोगों में शामिल थे, बल्कि इस बयान की पहलकदमी करने वाले दो-तीन लोगों में से एक थे।

नगर-पालिका में प्रस्ताव लाया गया। गंगाधरजी की पार्टी अल्पमत में थी, अधिसंख्य पार्षद और महापौर मुख्यमंत्री की पार्टी के थे, उसी पार्टी की सरकार दिल्ली में थी। गंगाधरजी को फिर भी विश्वास था कि उनके पार्षदों का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो ही जाएगा, एक नाकुछ से पुतले की ही तो बात है। महापौर ने उन्हें आश्वस्त ही नहीं कर दिया, बल्कि उस शाम नगर-पालिका से निकलते-निकलते अखबार वालों से कह भी दिया कि पुतला हटाने का प्रस्ताव कल पारित हो जाएगा।

वह रात महापौर पर प्रेत-बाधा से भी ज्यादा भारी गुजरी। उन दिनों, अखबारों के दफ्तरों में टेलीप्रिंटर नामक जंतु पाया जाता था। उसी ने खबर महापौर के अपने निवास पहुंचने के पहले ही प्रदेश की राजधानी तक, मुख्यमंत्री के कार्यालय तक पहुँचा दी थी। महापौर घर में ठीक से घुस भी नहीं पाए कि पत्नी की बेहद खुश और किलकती आवाज कान में पड़ी थी, ‘सीएम ऑफिस से कई बार फोन आ चुका है, लगता है, अब महापौरी छोड़ राजधानी के बंगले में रहने के दिन आ ही गये, हे नहर वाली मैया चाँदी का सिंहासन, सोने का छतर चढ़ाऊंगी’…महापौर महोदय गद्-गद् हुए, लेकिन व्यक्तित्व की गंभीरता के तकाजे से महापौरनी को बस लाड़ भरी निगाह से देख कर, जरा सा मुस्करा कर ही रह गये, ‘ देखते हैं, कौन सा विभाग देते हैं, ऐरा-गैरा विभाग तो मैं लेने से रहा…’

अपने महत्वपूर्ण विभाग के मद में अभी ठीक से प्रवेश कर भी नहीं पाए थे कि फोन फिर से घनघना उठा, महापौर स्वयं ही लपके, महापौरनी ने इशारा किया कि स्पीकर स्विच ऑन कर दें, महापौर ने आँखों-आँखों में ही ऐसे बचकानेपन से उन्हें बरजा, और रिसीवर कान से लगाया, ‘जी बोल रहा हूँ…’

महापौर जिन बुद्धिमत्ताओं के लिए, उस पल के बाद ताउम्र खुद को बधाई देते रहे, उनमें से एक यह भी थी कि उन्होंने स्पीकर स्विच ऑन नहीं किया था। अब तक उन्होंने दूसरों से ही सुना था कि मुख्यमंत्री का गुस्सा बहुत खराब है, और यह भी कि गुस्से में आ जाएं तो कहनी-अनकहनी का कोई विवेक मुख्यमंत्री को नहीं रहता। आज फोन पर अपने कानों से उन्होंने जो सुना, उसके बाद मुख्यमंत्री के गुस्से के ही नहीं, वे मुख्यमंत्री की सर्जनात्मक गाली-क्षमता के भी जीवन भर के लिए कायल हो गये। गोपन-क्षणों की जो गतिविधियां उनकी कल्पना के भी परे थीं वे मुख्यमंत्री के मुख से नि:सृत गालियों में पूर्णतया संभाव्य बल्कि इतनी यथार्थ-परक लग रही थीं कि अब संपन्न हुईं कि तब हुईं। गोपन गतिविधियों को फौरन अंजाम देने की घोषणा करती इस कल्पना-सृष्टि के कर्ता पात्र मुख्यमंत्री स्वयं थे और भोक्ता की भूमिका उन्होंने गंगाधरजी के साथ-साथ महापौर को भी सौंप रखी थी। महापौर ने देवी-देवताओं को धन्यवाद दिया कि वे मुख्यमंत्री के साथ फोन-लाइन पर ही हैं, उनके शयन-कक्ष के एकांत में नहीं।

फोन रख कर जब पलटे तो महापौरनी नहर वाली माता के पक्ष में की गयी सिंहासन-छत्र घोषणा तो वापस ले ही चुकी थीं, आशंका से काँप भी रही थीं, उन्होंने महापौरजी को फोन हाथ में लिए काँपते देखा जो था। कुछ पूछने की ना जरूरत थी, ना हिम्मत।

महापौर बाहर वाले कमरे में आए, सचिव को बुलाया और बयान  डिक्टेट करने लगे।

अगले दिन महापौर की पार्टी ने नगर-निगम में पुतले को हटाने के प्रस्ताव का घोर विरोध किया, गंगाधरजी के पार्षद चीखे-चिल्लाए जरूर लेकिन न महपौर का कुछ बिगाड़ सके, न पुतले का।

महापौर अब तक उस भयानक दु:स्वप्न का कारण जान चुके थे, जिससे वे कल शाम जागती आँखों ही गुजरे थे। इतनी सर्जनात्मक गालियाँ संभव कराने वाला गुस्सा मुख्यमंत्री को पुतले के प्रति प्रेम के कारण नहीं, इस कारण आया था कि उस नंगे, बेहूदे पुतले को बनाने वाला कलाकार कोई ऐरा-गैरा नहीं, प्रधानमंत्री का खास-उल-खास था, उनके पारिवारिक मित्रों में से था। उनसे जो झाड़ मुख्यमंत्री ने खाई थी, उसी का पृथुल विस्तार मय गालियों के उन्होंने महापौर तक पहुँचाया था।

हंगामाखेज मीटिंग के बाद नगर-पालिका भवन की सीढ़ियाँ उतरते महापौर देख पा रहे थे कि अगले कुछ दिन झंझट में ही बीतने हैं।

महापौर जहाँ तक  देख पा रहे थे, झंझट की व्याप्ति उससे कहीं बहुत अधिक होने जा रही थी, यह दो ही दिन में साफ हो गया। उन दिनों चौबीसें घंटे खबरें  तोड़ते रहने वाले चैनल और सर्वव्यापी सोशल मीडिया भले ना रहे हों, अखबार तो थे ही। प्रधानमंत्री और कलाकार की मित्रता के समाचार को  लोक-वृत्त में स्थापित होने में कोई खास वक्त नहीं लगा। अब, मामला  पुतले का कम, सरकारी काम में निजी संबंधों के कारण प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप का बनने लगा, ऊपर से, खोंचड़ यह  कि नंगा पुतला बनाने वाले कलाकार का ताल्लुक गलत मजहब से था।

गंगाधरजी की पार्टी के लिए मामला अब स्थानीय अश्लीलता से बहुत आगे बढ़ कर राष्ट्र भर की सांस्कृतिक अस्मिता का बन गया। कलाकार को प्रेस वाले प्रधानमंत्री की नाक का बाल बता रहे थे, मुख्यमंत्री और महापौर को वह जान का बवाल लग रहा था, लेकिन करते क्या? उधर, गंगाधरजी की पार्टी ने प्रधानमंत्री की नाक के इस बाल की खाल खींच डालने का पूरा मन बना लिया। प्रधानमंत्रीजी की पार्टी भी ताल ठोंक कर मुकाबिले के लिए तैयार हो गयी।

उसके बाद की गर्मा-गर्मी में इतिहास-चक्र बड़ी तेजी से घूमा, जैसे गर्मी की दोपहर में छत का पंखा घूमता है। पुतले के निर्माता कलाकार महोदय प्रधानमंत्री के पारिवारिक मित्र तो थे ही, कलाकारों के जगत में भी उनका बहुत सम्मान था, दुनिया भर में नाम था। उनके बनाए पुतले को हटाए जाने की बात ने देखते-देखते कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रशन का ही नहीं, कला और साहित्य के प्रति लोकतांत्रिक राज्य-सत्ता की संवेदनशीलता और जिम्मेवारी के सवाल का भी रूप ले लिया। पुतले की हैसियत स्थानीय, प्रांतीय से बढ़ कर राष्ट्रीय हुई, फिर वैश्विक। गंगाधरजी की पार्टी को नंगा पुतला परंपरा और संस्कृति को अत्यंत अश्लील चुनौती अत्यंत द्रष्टव्य रूप में देता दिखने लगा, तो कलाकार समुदाय गंगाधरजी की पार्टी को नियमित रूप से कोणार्क और खजुराहो के चित्र दिखाने लगा। दोनों पक्षों की ओर से धरने-प्रदर्शन का दौर चलने लगा। जो बात हल्की-फुल्की सी लगती रही थी, धीरे-धीरे राष्ट्रीय ,समस्या का रूप लेने लगी। धरने-प्रदर्शन तनावपूर्ण बल्कि हिंसक होने लगे। कलाकार तो बेचारे क्या हिंसा करते, प्रधानमंत्रीजी की पार्टी भी जो करती थी, सो आधे मन से। हाँ, गंगाधरजी की पार्टी का सांस्कृतिक जोश पूरे उबाल पर था। उनके प्रदर्शनों में अश्लीलता के दुष्ट समर्थकों की शारीरिक समीक्षा करने और पुतला बना कर संस्कृति और शील को हानि पहुँचाने वाले, प्रधानमंत्री के सखा, कलाकार सरीखे परकीय तत्वों की तथाकथित कला-कृतियों का क्रिया-कर्म करने का उत्साह सक्रिय रूप से अभिव्यक्ति पाने लगा। उनके राष्ट्रीय नेता ने तो घोषणा कर दी कि वे देश के एक कोने से दूसरे तक, दूसरे से तीसरे तक पुतला-विरोधी, संस्कृति-रक्षक यात्रा निकालते हुए आएंगे, पुतले को उखाड़ेंगे फिर देश के चौथे कोने तक यात्रा ले जाकर पुतले को समुद्र में फेंक आएंगे। उनकी चुनौती थी कि ‘ हम तो पुतला ले जाएंगे; कोई रोक सके तो रोक ले…’

कलाकार समुदाय तो भला क्या खा कर इस चुनौती को झेलता, लेकिन प्रधानमंत्री की नाक बीच में फँसी होने के कारण उनकी पार्टी को जरूर स्टैंड लेना पड़ा कि दुनिया इधर की उधर हो जाए, पुतला जहाँ है वहीं रहेगा, जैसा है वैसा ही रहेगा। पुतले की सुरक्षा के लिए केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात कर दिये गये।

रवि पुतले के घोर समर्थक थे, नंगे नहाने के उसके लोकतांत्रिक अधिकार के पक्ष में पहला बयान जारी करने वालों में तो उनका नाम था ही, बाद में भी वे पुतले के पक्ष में लिखते-बोलते रहे थे। उधर, मामले के स्थानीय से राष्ट्रीय बनने के अनुपात में ही अश्लीलता-संवेदी राडारों और संस्कृति-प्रेमियों की चिंता भी बढ़ती जा रही थी, हिंसा भी। पुतला समर्थक होने के नाते एक दो बार गालियाँ तो रवि को भी खानी पड़ीं थीं, लेकिन हिंसा से साफ बच गये क्योंकि उस पार्टी में भी उनके अपने लोगों की कोई कमी नहीं थी। उन्हें गालियाँ देने वाले लौंडों को भी शुक्लाजी ने विभाग में रवि के सामने ही डाँटा, और निर्देश दिया था कि दुनिया भर मे आग भले ही लगा देना, लेकिन खबरदार, जो हमारे प्रो. रवि सक्सेनाजी की तरफ आँख उठा कर देखा। शुक्लाजी रवि के सहकर्मी थे, और उन्हीं की तरह लौंडों से जिस-तिस को पिटवा देने की प्रेरणादायक क्षमता में माहिर भी। रवि के प्रति उनके नरम रवैए का कारण था। रवि प्रगतिवाद-मार्क्सवाद आदि दिव्य अमूर्तनों का सार्वजनिक नाम-जाप एवं पूजा-पाठ करते हुए, असली साधना जातिवाद, क्षेत्रवाद और सर्वोपरि, समान-स्वार्थवाद जैसे मूर्त देवताओं की करते थे। इसी साधना की एक विधि यह थी कि हिन्दी के जातीय रूप के तौर पर खड़ी बोली के प्रचंड समर्थक रवि अपने क्षेत्र के किसी भी मनुष्य को देखते ही क्षेत्रीय बोली में शुरु हो जाते थे।

शुक्लाजी भी रवि के क्षेत्र के निवासी  थे। उनसे रवि का निन्यानबे फीसदी संवाद खड़ी बोली हिन्दी के बजाय क्षेत्रीय भाषा में ही होता था।  दोनों विद्वानों की परस्पर विरोधी विचार-धाराओं के अंदर-अंदर बहती व्यवहारिकता की धारा के बीच  समान स्वार्थों का वह द्वीप भी था जहाँ हृदय का हृदय से गोपन, प्रिय संभाषण हुआ करता था। ऐसे गहन हार्दिक संबंध के चलते शुक्लाजी को करनी ही थी रवि सक्सेनाजी की सहायता। उस दिन के बाद से, नगर के न जाने कितने पुतला-समर्थकों की सांस्कृतिक ठुकाई हुई, लेकिन रवि का बाल तक नहीं बाँका नहीं हुआ। शुक्लाजी से प्राप्त हार्दिक सहायता पुतला समर्थक क्रांति करते करते प्रतिक्रियावादी ताकतों से सुरक्षित रहने में रवि के बहुत काम आई। काँख भी दबी रही, मुट्ठी भी तनी रही। दूसरी तरफ यही स्थिति मुख्यमंत्री की पार्टी के प्रसंग में थी। शुक्लाजी के जरिए रवि की पहुँच गंगाधरजी तक थी, तो जैन साहब के जरिए मुख्यमंत्री तक। सब कुछ आनंद से चल रहा था, प्रगतिशील बुद्धिजीवी का जीवन इस पिछड़े देश के सुख-भोग के साथ ही, अमेरिका में टीचिंग असाइनमेंट, और फिर ग्रीन-कार्ड प्राप्ति जैसे महत्तर सुखों के भोग की दिशा में भी निरंतर प्रगति कर रहा था। रवि मन ही मन पुतले के आभारी थे कि नंगे ने मुख्यमंत्री से चिपकने का बहाना दिया, लोक-परलोक सुधारने का अवसर दिया।

इस बीच इंटरनेट, मोबाइल फोन और प्राइवेट टीवी चैनलों के जरिए इन्फोटेनमेंट क्रांति के युग का श्रीगणेश होने लगा था। अब, पुतले का नंगापन भी चौराहे तक ही न रह कर घर-घर पहुँचने लगा, और यहीं से रवि शुरु हुआ की आनंद-कथा में बिगूचन-तत्व का प्रवेश। उनके अपने ड्राइंग-रूम में बजरिए टीवी, पुतला जब पहली बार नजर आया तो उन्हें कुछ अजीब सा अहसास हुआ। टीवी पर चलती रिपोर्ट में रिपोर्टर सारे विवाद का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य दे रही थी, कैमरामैन विभिन्न कोणों से पुतले को दिखा रहा था…रवि की नजर पुतले के कोणों पर क्या होती, वह तो रिपोर्टर-सुंदरी की देह के कोणों पर ही थी। लेकिन, उसी पल,  रवि को यह क्यों दिख रहा था कि जया पुतले की ओर कुछ ज्यादा ही देख रही है…

उस वक्त तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन रात में जया के अनमनेपन  से उनका माथा ठनका, इतना ठंडापन…इतनी उदासीनता जैसे कि बस बेमन से पत्नी-धर्म निभा रही हो…मामला क्या है…

किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले उचित पड़ताल करना वैज्ञानिक मनोवृत्ति की माँग थी। रवि ने उन पलों को किसी तरह निबटाया, जया के ठंडेपन से आधे ठंडे तो वे हो ही गये थे, बाकी की खानापूरी किसी तरह कर, पीठ फेर कर सो गये…सो क्या गये, वैज्ञानिक मनोवृत्ति की माँग पर विचार करते रहे। अगले दिन, घूमने के लिए रवि जया को  लेकर पुतले वाले चौराहे से ही गुजरे, जया की कनखियों, नजरों और चेष्टाओं पर वैज्ञानिक दृष्टि रखते हुए। रवि का शक यकीन में बदलने लगा… कहीं कुछ गड़बड़ है जरूर…लेकिन अभी धीरज से काम लेना ही बेहतर है, रात में देखते हैं…

यह रात भी वैसी ही थी, जैसी कि पिछली रात…फर्क यह था कि इस रात, जया के ठंडे, निपटाऊ तरीके से बाहर निकल कर रवि मुँहफेरी नींद के हवाले होने की बजाय छज्जे पर आ गये, सिगरेट सुलगाई और सोचने लगे…

शाम को पुतले पर पड़ी जया की नजर उचटती नजर थी, या कसकती? उचट कर वह नजर पुतले के चेहरे तक ही रुकी रह गयी थी या सरक कर कमर के नीचे तक भी गयी थी? और क्या फिर वहाँ से चुप सी चतुराई के साथ फिसलती हुई मेरी कमर के नीचे तक नहीं आई थी? पुतले की कमर पर जो नजर उमंग के साथ घूम रही थी, वह मेरी कमर तक आते-आते क्या उदासी को छुपाती सी नहीं लग रही थी ?

और, अभी कुछ ही देर पहले, उन पलों में, वहाँ हाथ फेरते समय, क्या जया की हथेली ऐसी नहीं लग रही थी कि फिर वहाँ रही है, छू कुछ और रही है…चल वहाँ रही है, जा कहीं और रही है…आम तौर से बिटर-बिटर आँखें  खोले रहने वाली जया पिछले कुछ दिनों से आँखें मूँद क्यों लेती है? मूँद भर लेती है, या मुँदी आँखों किसी और को देखती रहती है…

और, वह हरामी पुतला…जया की नजरों के  सफर को देखते-देखते क्या उसने मुझे आँख नहीं मारी थी?

क्या बेहूदा बात करते हो यार, पत्थर का पुतला…

बेहूदा बात का मतलब? जो बेहूदा खुलेआम सबको दिखा सकता है, वह और क्या बेहूदगी नहीं कर सकता?

कैसी बातें कर रहे हो, इररेशनल….सीधे बात करो ना जया से…

बेवकूफ हूँ क्या…बात करूँ…क्या बात करूँ…कौन मान कर देगी ऐसी बात…और फिर अपनी प्रगतिशील छवि में मर्दवादी होने का बट्टा मैं खुद ही लगाऊँ…किसी और तरह से सत्य का अंतिम निर्धारण करना होगा, करना ही होगा…और जल्दी से जल्दी…

अगली रात समस्या और गंभीर हो गयी। साहित्यिक संस्कारों से संपन्न रवि और जया प्रेम करते समय कुछ कविताएँ आदि याद किया करते थे, स्वरचित भी, पररचित भी। जया ने विवाह के कुछ ही दिन बाद एक कविता रची थी—‘ मेरे पुरुष, मेरे अनूठे पुरुष, कितना मादक, मृदुल है तुम्हारा परुष स्पर्श…’ जया के अधरों से होने वाला इस कविता का अस्फुट उच्चार रवि को बहुत भाता और लुभाता था।

लेकिन, उस रात, उन पलों में, वहाँ हाथ फेरते हुए, जया के मुख से जो अस्फुट स्वर निकले थे, उनकी टेक, ‘मेरे पुरुष’ थी या ‘मेरे पुत…’ जोकि समय रहते सँभाल ली गयी थी। जया उस समय रवि को सराह रही थी या पुतले को? आज जया के अनमने होने से पहले ही रवि पूरी तरह ठंडे हो गये। जया को ताज्जुब हुआ। उसकी ताज्जुब भरी, सवाल करती आँखो के जबाव में कहीं अपनी नफरत आँखों में उतर ना आए, इसलिए रवि ने फौरन मुँह फेर लिया।

संदेह की कोई गुंजाइश अब बाकी नहीं बची थी। दोष जया का नहीं, उस हरामजादे पुतले का था, जिसकी नंगई का मैं मूर्खों की तरह समर्थन करता आया हूँ। वे उठे और छज्जे में जाकर सिगरेट के जरिए विचारक मुद्रा में प्रविष्ट हो गये। विचार का मुद्दा यह था कि यार कुछ भी कहो, पुतला है तो बच्चे का ही, तो, फिर…वह, साला प्रतिक्रियावादी, पतनशील आधुनिकतावादी फ्रायड…उसके कहने में कुछ दम भी था क्या? ये साले अपने स्थानीय दक्षिणपंथी…इनका कहना कि ‘बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव…’ इसमें भी कुछ…

रवि को कुछ बरस पहले देखी फिल्म ‘चक्र’ का एक संवाद याद आने लगा, ‘दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ में या तो पेट है, या उसके नीचे वाला…’। फिल्म देखने के बाद रविजी ने मार्क्स और फ्रायड के इस प्रतिक्रियावादी घालमेल की, और अपनी प्रगतिशील छवि को धता बता कर, परदे पर यह संवाद बोलने के लिए नसीरुद्दीन शाह की भूरि-भूरि निंदा की थी।  आज भी…वे स्वयं तो पूरी कोशिश कर रहे थे, इस घालमेल से बचने की;  विचार-धारा के प्रति निष्ठा बनाए रखने की…लेकिन सच यही था कि विचारों की धारा भले ही पेट तक जा कर रुक जाए, अनुभव और अनुभूति का रेला पेट से नीचे की ओर ही खिंचा चला जा रहा था।

सवाल फिर से वही कि पुतला है तो आखिरकार बच्चे का…एकाएक रवि के चित्त में गुत्थी का समाधान कौंधा, कहीं ऐसा तो नहीं कि जया की निगाह वर्तमान के बजाय भविष्य पर; यथार्थ के बजाय उसमें निहित संभावना पर रहती हो…?

इस हृदय-विदारक प्रश्न की गहराई ठीक से मापने का एक ही तरीका था। रवि लपक कर कमरे में आए। बत्ती जलाए बिना ही, मेज की दराज से इंचीटेप निकाला, और उत्तेजना से काँपते हाथ लिए, आशंका में धड़कता दिल लिए बाथरूम में जा घुसे, नाप लेने लगे और इस ह्रदयविदारक सत्य से टकराए कि तीस साल की उम्र में भी आकार उस पाँच साल के बताए जा रहे पुतले के आकार से कुछ कम ही था। उनके सामने स्पष्ट हो गया कि वर्तमान के यथार्थ में निहित भविष्य का सत्य यही है कि आज से कुछ साल बाद ही, ‘इन दि मोमेंट ऑफ हीट, हिज थिंग इज बाउंड टु बी स्ट्रांगर, लांगर ऐंड थिकर…’ आगे मन में जो आया वह रवि से शब्दों में ढालते भी नहीं बन रहा था… ‘दैन माइन…’

अर्थशास्त्र के ज्ञाता मित्रों से इकॉनामी ऑफ स्केल के बारे में सुना था। इस वक्त, रवि अपने भीतर फीयर ऑफ स्केल झेल रहे थे। हाथ में पकड़ा इंची-टेप उन्होंने घिन और गुस्से से भर कर एक तरफ उछाल दिया था; लेकिन स्केल, माप, पैमाना जैसे शब्दों और इनसे सूचित होने वाली वस्तुओं  से जो भय, वितृष्णा और घिन वे महसूस कर रहे थे, उसे कैसे फेंकें? कहाँ फेंकें? ये तो अब जीवन भर ढोया जाने वाला बोझा है, पूर्व-जन्म के पापों की तरह…

मैं कोई मूर्ख भाग्यवादी हूँ क्या?

यह रवि के ह्रदय-परिवर्तन का पल था। उनके मन में साफ हो गया कि कलात्मक संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक जीवन में नग्नता का समर्थन  करना निहायत जन-विरोधी हरकत है, ऐसी हरकत जो कि वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक आकलन की दृष्टि से प्रतिक्रियावादी तत्वों को ही मजबूत करती है। पुतले के नंगेपन का जो समर्थन करते आए थे, वह रवि को अपनी ऐतिहासिक भूल -‘हिस्टारिक ब्लंडर’- लगने लगा।

सवाल यह था कि इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने की रणनीति और कार्यनीति क्या हो? जन्मजात रणनीतिकुशलता के कारण, आत्म-साक्षात्कार और भूल-साक्षात्कार के इस मार्मिक पल में भी यह वास्तविकता रवि की आँखों से ओझल नहीं थी कि बात जहाँ तक पहुँच चुकी है, प्रधानमंत्री की नाक जिस तरह पुतले के साथ बिंध चुकी है, उसे देखते हुए पुतले का हटा दिया जाना तो असंभव है। ‘मौजूदगी तो उस कमीने नंगे की झेलनी ही पड़ेगी, बंधु’, रवि ने स्वयं से कहा, ‘व्यावहारिक यही है कि जिस बेहूदगी से हरामजादा दिखा-दिखा कर मुझे चिढ़ाता और जया को लुभाता रहता है, उस बेहूदगी  का इलाज करके ही संतुष्ट हो लिया जाए’।

लेकिन वह इलाज हो कैसे?

सवाल पर थोड़ी ही देर सोचने के फलस्वरूप रवि फिर से एकबार अपनी मौलिकता और सर्जनात्मकता पर मुग्ध होने का अवसर पा गये। इस मुग्धता के साथ वे बाथरूम से भी बाहर आए, और किसी हद तक ‘स्ट्रांगर, लांगर, थिकर’ वाली तुलना की मर्मांतक वेदना से भी। उन्होंने द्वंद्वात्मक पद्धति का सार्थक उपयोग कर, थीसिस-ऐंटी थीसिस के परस्पर अनुप्रवेश से गुजरते हुए सिंथेसिस की खोज कर ली थी। यह खोज भारतीय परंपरा की मूल समन्यवयात्मक जीनियस के भी सर्वथा अनुरूप थी।

बाथरूम में चिंतन के पल बिताने के बाद रवि  पुतले को एकदम  हटा ही देने या उसे नंगा ही रहने देने के अतिरेकों के परे समाधान की दिशा में बढ़ गये थे। इंचीटेप लेकर बाथरूम में घुसने के पहले तक समाज में कला-संवेदना फैलाने की बात करते आए थे, इंचीटेप फेंक, बाथरूम से निकलते समय संवेदना फैलाने की बजाय, रवि पुतले को चड्डी पहनाने के समर्थक हो चुके थे।

यही एकमात्र रास्ता था। नंगेपन की बेहूदगी से स्वस्थ संस्कृति को, विवाद से नगर बल्कि देश को, और पुतले की चिढ़ाऊ चुनौती से स्वंय रवि को राहत देने वाला रास्ता सिर्फ और सिर्फ चड्डी से हो कर जाता था। इसी में सबकी भलाई थी। यही वह पंथ था जिस पर महाजनों को चलना चाहिए। तुच्छ जन तो पीछे-पीछे स्वयं ही आ जाएंगे। सो, कोशिश महाजनों को पटाने की होनी चाहिए। मुख्यमंत्री और गंगाधरजी को मनाया जाना चाहिए कि अपनी-अपनी जिदें छोड़ कर पुतले को चड्डी पहना कर वहीं खड़े रहने देने के मध्य-मार्ग पर चल पड़ें। रवि की आँखें अपनी महानता पर स्वयं गद्-गद् होने के कारण भर आईं…कितना बड़ा काम, कितने घोर विवाद का निबटारा करा रहे हैं प्रभु…आई मीन इतिहास-प्रभु मुझ से…धन्य हो भगवन…आई मीन धन्य हो, इतिहास देवता…भरे कंठ के मौन शब्दों के जरिए रवि इतिहास-देवता को कृतज्ञता के पुष्प अर्पित कर रहे थे…

यह कृतज्ञता का पल था, यह आत्म-साक्षात्कार का पल था, यह इतिहास के मंदिर में आत्मार्पण का पल  था, यह ऐसा कुछ कर जाएं कि यादों में बस जाएं वाले जोश का पल था, यह दूरगामी सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान कर पाने के संतोष का पल था, यह ऐतिहासिक भूल को सुधारने के शुभारंभ का पल था।

यह चड्डी-पल रवि सक्सेना के जीवन में लक्ष्य की स्फटिकवत् स्पष्टता का पल था।

इस पल के बाद से, पुतले की नग्नता औरों के लिए जो हो, रवि के लिए नितांत निजी चुनौती थी; चड्डी औरों के लिए जो हो, रवि के लिए जीवन का लक्ष्य थी, शब्द और कर्म की एकता का प्रमाण थी। अब तो, बस, मन में ठान ली थी, सो ठान ली थी–हरामजादे पुतले  को चड्डी ना पहनाई तो,  ‘क्या किया, जीवन क्या जिया…’

अब रणनीति सोचनी थी। पुतले को चड्डी पहनाने के सपने के साथ ही काँख और मुट्टी की नाजुक द्वंद्वात्मकता को  भी तो साधे रखना था, पुतले के उपचार के साथ ही अपने और सपने भी पूरे करने थे। जरूरत थी सतत सावधान साधना की।

रवि के जीवन के पिछले बीस साल इसी साधना के साल थे।

धीरज और चतुराई के साथ रवि ने चड्डी-परियोजना पर अमल आरंभ किया। सबसे पहले तो लेख लिखा विवाद का समाधान संवाद के जरिए करने का आव्हान करते हुए। लोगों को, खासकर कलाकार समुदाय को बात अच्छी भी लगी, लेकिन जब संवाद-सभा में रवि ने बीच का रास्ता सुझाया कि पुतले को चड्डी पहना दी जाए तो कलाकार समुदाय उखड़ गया। इस तरह तो कलाकृति की ऐसी की तैसी हो जाएगी, यह तो वैसा ही है कि ललित कला अकादमी में टंगें न्यूड कैनवासों पर साड़ी पेंट कर दी जाए, या खजुराहो से लेकर आज तक के नग्न शिल्पों को निक्कर पहना दी जाए। यह कैसी बेतुकी और इनसेंसिटिव बात कर रहे हैं, रवि? सभा में मौजूद जया रवि का सुझाव सुन कर सनाका खा गयी। रवि उसकी ओर देख ही नहीं रहे थे कि वह आँखों-आँखों में रवि से इस तरह गुलाँट खाने की वजह दरियाफ्त कर सके।

कलाकारों, बुद्धिजीवियों के बीच रवि संदिग्ध हुए जरूर, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री और गंगाधर दोनों की तीखी निन्दा करके फिर से कलाकार-बुद्धिजीवी समुदाय को अपनी मूल क्रांतिकारिता का विश्वास दिलाया। उधर, जैन साहब के साथ जा कर मुख्यमंत्रीजी से, और शुक्लाजी के साथ जा कर गंगाधरजी से मिलने में भी देर नहीं लगाई। बात दोनों नेताओं को जम भी गयी, तय हुआ कि यदि सरकार ऐसी कोई पहलकदमी करे तो गंगाधरजी सुनिश्चित कर लेंगे कि उनकी पार्टी भी पुतले को हटाने की जिद छोड़ कर उसे चड्डी पहनाने पर राजी हो जाए।

समस्या थी, बेहूदे कलाकारों की ओर से। वह मोर्चा भी रवि ने ही सँभाला, उन्होंने सामाजिक दायित्व की उपेक्षा करने वाले, नग्नता को कलात्मक मूल्य का दर्जा देने वाले कलावाद के खिलाफ ताबड़तोड़ कड़े से कड़े लेख लिखे, लिखवाए, भाषण दिए, दिलवाए। कुछ बुद्धिजीवियों को मुख्यमंत्री की ओर से आश्वासन और पद-पुरस्कार भी दिलवाए। माहौल धीरे-धीरे चड्डी के पक्ष में बनने लगा। यह सब करते हुए रवि को पुतले पर इन दिनों गुस्से और नफरत का अहसास तो होता ही था, ईमानदारी के पलों में वे उस नंगे के प्रति कृतज्ञ भी होते थे। आखिर यह उस नंगे का ही कमाल था कि मुख्यमंत्री से रवि लगभग हर सप्ताह मिलते थे, यह उस बेहूदे का ही कमाल था कि रवि के लिए मुख्यमंत्री तक पहुँचने के वास्ते जैन साहब और गंगाधरजी तक पहुँचने के वास्ते शुक्लाजी अप्रासंगिक हो चले थे।

लेकिन, चड्डी साधना इतनी आसान फिर भी नहीं थी। मुख्यमंत्री के लिए तो बिल्कुल ही नहीं थी। प्रधानमंत्री की नाक जहाँ फँसी हो, उस मामले में सरकार किसी भी तरह के समझौते का रुख दिखाए तो दिखाए कैसे?

मुख्यमंत्री ने तय किया कि कलाकार से बात करके उन्हें चड्डी पहनने, माफ कीजिएगा, पुतले को चड्ड़ी पहनाने को राजी कर लें, फिर बाकी कलाकार, बुद्धिजीवी आदि तो मान ही जाएंगे। पहले तो, उन्होंने कलाकार महोदय से परवारे ही बात करने की सोची थी, लेकिन लगा कि कहीं पीएम उखड़ गये तो?  उधर पीएम भी अब विवाद से चट चले थे, जिसने उन्हें ना उगलते बने ना निगलते की दशा में ला छोड़ा था। सोचने लगे थे कि पुतला चड्डी पहन ही लेगा तो कौन सा आसमान टूट पड़ेगा? कभी कभी स्वयं को कोसते भी थे कि खामखाह नंगे पुतले को नाक का सवाल बना बैठे। ऐसे में, कलाकार स्वयं मान जाए तो क्या हर्ज है? वैसे भी, बात मुख्यमंत्री करेंगे, अपनी कला-प्रेमी और दृढ़ राजनेता की छवि तो बनी ही रहनी है। उन्होंने मौनं स्वीकृतिलक्षणं वाली मुद्रा अपना ली।

कलाकार से बात करने का अनुभव मुख्यमंत्री के लिए बड़ा दुखदायी सिद्ध हुआ। एक तो, न जाने कितने बरस बाद, उन्हें भाषण देने की बजाय लेना पड़ गया। कलाकार सिद्धहस्त मूर्तिकार होने के साथ ही सिद्धमुख, अनथक बोलक भी थे, और अपने महत्व  से अवगत भी। उन्होंने न मुख्यमंत्री के समय की परवाह की, न मूड की। पूरे पचास-साठ मिनट का क्लास-रूम लेक्चर दे डाला, सो भी कलाकृति की इयत्ता, उसके अस्तित्व की पावन स्वायत्तता, शरीर की समग्रता में हर अंग की अपनी समग्रता की अनुल्लंघनीय पवित्रता, कला में नग्नता की महिमा, स्नान में निर्वस्त्रता का महत्व सरीखी शब्दावली से लिथड़ा हुआ।

कलाकार ने कला के प्रति संवेदनशीलता का मार्मिक उपदेश देते देते मुख्यमंत्री को लोक-कथा के उस पात्र की दशा में पहुँचा दिया था, जिसे प्याजों से बचने के लिए जूते खाने पड़े थे, और जूतों से बचने के लिए प्याज। मुख्यमंत्री के मन में बार-बार आ रहा था कि कलाकार का कुछ उपचार तो स्वयं उसी विधि से कर दें, जिस विधि की दूरभाष पर की गयी घोषणा मात्र ने महापौरजी को प्रेतबाधा की प्रतीति करा दी थी; बाकी के लिए साले को ऐसे उपचारों के लिए विख्यात, अपने विश्वस्त पुलिसकर्मियों के हवाले कर दें।

काश, यह मूर्तिकार पीएम का मुँहलगा न होता… काश इतने सारे टीवी चैनल कुकुरमुत्तों की तरह उग ना रहे होते…काश नौजवानों के बीच इंटरनेट नामक बीमारी का इतना विस्तार ना हो रहा होता…

इतने सारे काशों के आगे कुछ कर पाना मुख्यमंत्रीजी के लिए कठिन था। अब तो प्रधानमंत्री का मार्गदर्शन लेना ही पड़ेगा।

प्रधानमंत्री मन ही मन पुतले से, पुतले के निर्माता कलाकार से, सारे माहौल से कुढ़े बैठे थे, लेकिन मुख्यमंत्री को कुढ़न की हवा तक नहीं लगने दी। उनकी सारी बात ध्यान से सुनी, उनके प्रदेश के और उनके स्वास्थ्य के हाल-चाल पूछे। पुतले के बारे में एक शब्द नहीं बोले। एपाइंटमेंट का समय समाप्त हो चला, मुख्यमंत्री बेचैन हो चले। क्या करें? एकाएक प्रधानमंत्री ही बोले, ‘चुनाव निकट आ रहे हैं, सोचता हूँ, आपकी प्रतिभा और क्षमता  का उपयोग संगठन के लिए किया जाए…’

मुख्यमंत्री को बचपन में पढ़े अनेक मुहावरों का बोधार्थ और भावार्थ एक ही झटके में सिद्ध हो गया। उन्हें मालूम पड़ गया कि पाँव के नीचे से धरती कैसे खिसकती है, रीढ़ की हड्डी में ठंडक कैसे दौड़ती है, सर पर आसमान कैसे टूट पड़ता है, जबान कैसे तालू से चिपक जाती है। उनका चेहरा अपने ही नहीं, प्रधानमंत्री के कुर्ते से भी ज्यादा सफेद हो गया। हे प्रभो…यह क्या…यह क्यों…

प्रधानमंत्री मेज पर रखी फाइलें देखने लगे थे। मुख्यमंत्री ने किसी तरह अपने बिखरते तन-मन को समेटा, और कुर्सी से उठने की तैयारी करने लगे। एकाएक प्रधानमंत्री फाइलों पर निगाह टिकाए टिकाए ही आकाशवाणी सी करते हुए बोले– ‘लोकतंत्र में न्यायिक प्रक्रिया का भी तो महत्व है, आखिर, हम कानून का राज चला रहे हैं, किसी की मनमानी नहीं…’

आकाशवाणी करके प्रधानमंत्री तो अपने मौन में, और फाइल में पुन: प्रविष्ट हो गये। इधर, आकाशवाणी से लाभान्वित मुख्यमंत्री को अब दूसरी तरह के मुहावरों का अर्थ सिद्ध होने लगा। दिखने लगा कि कैसे मन-मयूर नृत्य कर उठता है, कैसे अंधेरी सुरंग के सिरे पर रोशनी की किरण नजर आने लगती है।

अपनी राजधानी वापस पहुँचते ही, मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व के लिए देश की ओर से कृतज्ञता प्रकट की, साथ ही,  पुतला विवाद हल करने के लिए एक आयोग के गठन की घोषणा कर डाली। यह भी स्पष्ट कर दिया कि आयोग की रपट आने तक पुतले जहाँ है, वहीं रहेगा,जैसा है, वैसा ही रहेगा, लेकिन रहेगा लोगों की निगाह से दूर। इस तरह पुतले के एकांतवास और निर्वासन के दिन आरंभ हुए, उसे आनन-फानन में दीवार और चंदोवे में कैद कर दिया गया।

आयोग की नियुक्ति में थोड़ा समय लगा। न्यायमूर्ति लेबयान जब इस एक सदस्यीय  आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए तो कलाकारों और पुतले के अन्य समर्थकों के बीच हर्ष की लहर दौड़ गयी और गंगाधरजी की पार्टी में अमर्ष की। लेबयान साहब खाँटी लिबरल थे, पुतला-विवाद में भी कला की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वाधीनता आदि की बातें कर चुके थे। गंगाधरजी ने बयान जारी करके चेतावनी दे दी कि आयोग के अध्यक्ष लेबयान हों, या देबयान; नंगई किसी भी दशा में सहन नहीं की जाएगी। देश की सांस्कृतिक परंपराओं और नगर के चरित्र के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति कदापि नहीं दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सबको करना ही होगा। रहे कलाकार, लेखक आदि, सो उनमें से अधिकांश धीरे-धीरे मानने लगे थे कि यार, ‘और भी ग़म हैं, जमाने में पुतले के सिवा’।

जस्टिस लेबयान ने भी बयान जारी किया कि अपनी सिफारिशें वे बहुत सोच-विचार कर, गहन और विशद अध्ययन के बाद ही देंगे। और, उन्होंने अपने इस बयान पर सचमुच ‘लेटर ऐंड स्प्रिट’ में अमल कर दिखाया। मामले की तह तक पहुँचने के लिए समाज, साहित्य, संस्कृति, कला और परंपरा के अंतस्संबंधों को समझना जरूरी था। कलाकारों, लेखकों का मानस समझने के लिए उनके उत्सवों के औपचारिक-अनौपचारिक हिस्सों में हिस्सेदारी भी जरूरी थी। सो, जस्टिस लेबयान अंतर्राष्ट्रीय साहित्य समारोहों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक में नियमित रूप से, सरकारी खर्चे पर मौजूद रहने लगे। लेबयान साहब पुतले के भाग्य का फैसला करने का गंभीर दायित्व निभाने अनेक बार बुकर एवार्ड की सेरेमनी में शामिल हुए, अनेक बार एकेडमी एवार्ड्स के फंक्शन में। कान भी गये, स्टाकहोम भी हो आए। देश में भी उन्होंने जयपुर लिटफेस्ट  से लेकर मुंबई में फिल्मफेयर नाइट तक के समारोह खूंद डाले। यही नहीं, समारोह-धर्मिता के बाहर, दैनंदिन जीवन में संस्कृति की उपस्थिति का मर्म समझने के इरादे से जस्टिस लेबयान संसार के कोने-कोने में गये। अफ्रीका महाद्वीप में जरूर ईजिप्ट, मोरक्को, दक्षिण अफ्रीका और मारीशस को छोड़ किसी अन्य देश में कदम रखना लेबयान साहब ने जरूरी नहीं समझा, बाकी तो दुनिया का कोई देश लेबयान आयोग की रिपोर्ट के परिशिष्ट का हिस्सा बनने से बच नहीं पाया।

काम इतना फैला-पसरा हो, तो समय-सीमा का क्या मतलब? जब भी आयोग की घोषित अवधि पूरी होती, लेबयान साहब एक्सटेंशन माँग लेते, जोकि फौरन मिल भी जाता। पुतले के सच्चे समर्थकों को लगने लगा था कि सारा मामला नूरा कुश्ती में बदल गया है। लेबयान आयोग की असली भूमिका विवाद को टालते-टालते ठंडा कर देने की है। लेबयान साहब ऐसी बातें करने वालों को समझाने की कृपा बीच-बीच में कर देते थे।उनका कहना था कि विवाद खड़ा करना आसान है, उसका स्थायी समाधान धीरज से ही खोजा जा सकता है। ऐतिहासिक महत्व की गतिविधियों को समय के अखबारी पैमाने पर मापना बेवकूफी है। आयोग सिफारिश देगा तो ऐसी कि सब मानें, अनंत काल तक के लिए मानें, यह नहीं कि आज सिफारिश दी, कल दूसरे आयोग की नियुक्ति की नौबत आ गयी।

इतनी गंभीरता से लिया लेबयान आयोग ने अपनी संभावित सिफारिशों के स्थायित्व को कि उनका इंतजार करते करते, लेबयान आयोग की नियुक्ति करने वाले मुख्यमंत्री धरा-धाम से ही सिधार गये, सिफारिश नहीं आई। उन्हें आकाशवाणी के जरिए मार्गदर्शन देने वाले प्रधानमंत्री भी पीछे-पीछे चले गये, सिफारिश नहीं आई। पुतले के निर्माता कलाकार वृद्धावस्था को प्राप्त हो कर सिद्धहस्तता और सिद्धमुखता दोनों से वंचित हो चले, सिफारिश नहीं आई। गंगाधरजी अपनी पार्टी में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते स्थानीय से राष्ट्रीय नेता बन गये, सिफारिश नहीं आई। नयी पीढ़ी पुतले के बारे में स्थानीय इतिहास और विश्वव्यापी अंतर्जाल के जरिए ही जानने की अवस्था को प्राप्त हो गयी, सिफारिश नहीं आई। कुछ लोग तो यह तक भूल चले कि लेबयान आयोग का गठन हुआ किसलिए था, लेकिन सिफारिश नहीं आई तो नहीं ही आई।

इन बीस सालों में पुतला-विवाद काफी कमजोर पड़ गया था। जस्टिस लेबयान जब इस सिलसिले में किसी नयी विदेश-यात्रा पर जाते या सरकार से एक्सटेंशन की माँग करते या कोई नेता बयान देते तब आ जाने वाली थोड़ी-बहुत गर्माहट को छोड़ दें तो बस ठंडक ही ठंडक थी। सबसे गहरी ठंडक आ गयी थी रवि और जया के संबंधों में, यहाँ तक कि दोनों को इस ठंडक की आदत सी पड़ गयी। पुतले के लोटे से बहता पानी जैसे नाली में बहने की बजाय  बर्फ की नदी के रूप में रवि और जया के बीच जमने लगा था। बरस-दर-बरस मोटी होती जा रही इस बर्फ की परत यदि कभी पल-दो-पल के लिए दरकना भी चाहती तो, उन पलों में भी जया की मुस्कान में रवि को कहीं न कहीं पुतले की शरारती मुस्कान छुपी दिख जाती थी।

जया कभी-कभी सोचती थी कि मुझे तो बस पुतले को देख कर हँसी आई थी, रवि को मेरे गालों पर लाज की लाली कैसे दिख गयी? मैं पुतले को देख कर कम हँसी थी, और रवि के भोले से बुद्धूपन पर अधिक। इस भोलेपन को बेवकूफी में किसने बदला? जिस प्यार से मैं हँसी थी, उसे बेतुकी तुलना में किसने बदला? दोस्ती की जिस जमीन पर खड़ी मैं हँस रही थी, उसमें निराधार ईर्ष्या की बारूदी सुरंग किसने लगाई?

जया इन प्रश्नों के उत्तर भली भाँति जानती थी, लेकिन जानने का फायदा क्या था?

कभी-कभी रवि के सामने भी आते थे इस तरह के सवाल। लेकिन, हमेशा सही होने की गलतफहमी तो उनकी चेतना के पोर-पोर में पैबस्त थी। उनकी चेतना अपने सदा सही होने के जिस अँधेरे कमरे में निवास करती थी, उसमें किसी और के सही होने की संभावना की किरणें कभी कभी ही झाँक पाती थीं। रवि का मन ऐसी झिर्रियों को बंद  करने में देर भी नहीं लगाता था, जिनसे किसी और के सच के किरणें इस अँधेरे कमरे में घुस पाएँ। रवि अपने सतत प्रकाश के अँधकार में थे, और ऐसे अँधकार से निकल पाना…

नामुमकिन नहीं, तो, बहुत, बहुत मुश्किल जरूर था।

 

चौराहे पर नहाने का नाटक करता बदमाश पुतला रवि की जिन्दगी के हर कोने में घुस गया था। शतरंज की बिसात पर जैसे घोड़ा सब मोहरों को फलांगता चलता है, वैसे ही वह हरामी पुतला जब चाहता, ढाई घर की दुलत्ती मारता और रवि को जहाँ जी चाहे दबोच लेता। उसके लिए कोई क्षेत्र वर्जित क्षेत्र नहीं था। क्लास, स्टाफ-रूम, बाजार, सभा-सेमिनार…यहाँ तक कि रवि और जया के ऐन अपने पलों में भी कमीना बीच में आ घुसता। स्ट्रांगर, लांगर, थिकर की भवितव्यता के आंतक में रवि और सिकुड़ जाते, जया और मुरझा जाती।

कभी-कभी रवि झल्लाते अपने आप पर, कभी रोते अपने भाग पर। तर्कशीलता का सहारा लेकर अपनी इस मनो-व्याधि से निकलने का यत्न करते, लेकिन विधिवत सायकाट्रिस्ट से मिलना उन्हें कतई मंजूर नहीं था, जया ने एक बार सुझाव दिया था तो संध्याकालीन सुरा-वंदन करते रवि के मुँह से गालियाँ निकलने लगी थीं। जया के लिए तय करना मुश्किल हो चला था कि वह इस बीमार इंसान पर दया करे या इस कूढ़मगज, जिद्दी पति में एक हाथ जमा दे। दोनों ही विकल्प असंभव से थे, जया ना तो ठीक से रवि नाम के इंसान पर दया कर पाती थी, और रवि नाम के पति का उपचार। जो कर पाती थी, उसे दया और घृणा, कृपा और क्रोध के बीच कहाँ रखा जाए, इस उलझन को जया कभी नहीं सुलझा सकी।

रवि जल्दी ही अपनी झल्लाहट, अपने भाग्य पर रुदन से बाहर निकल कर अपनी मर्दानगी साबित करने पर उतारू मर्द, प्रतिशोध के लिए खड्ग-हस्त पुरुष-पुंगव में बदल जाते। स्वयं को सायास चड्डी-साधना में डुबो देते।

आज इस साधना की सार्थकता का दिन था।

लेबयान  साहब ने रिपोर्ट दे दी थी। इस बीच तीन मुख्यमंत्री और बदल चुके थे, वर्तमान का नंबर पाँचवाँ था। प्रधानमंत्री भी तीसरे चल रहे थे, हालाँकि केंद्र और राज्य में शासक पार्टी वही थी, इसलिए पुतले और लेबयान दोनों के प्रति कमिटमेंट भी ऐन वैसा भले ना हो, तो भी था जरूर।  रिपोर्ट ने कलाकारों को भी निराश किया और पुतले के आम समर्थकों को भी। कुछ दुष्टों ने तो लेबयान आयोग की दीर्घकाय रिपोर्ट को ‘खोदा पहाड़, पाई चुहिया’ की संज्ञा भी दे डाली। दुनिया भर की सभ्यताओं में कला की स्थिति का विस्तृत विवेचन करते हुए; कला, समाज,राज्य और कानून के संबंधों पर गंभीर विमर्श करते हुए लेबयान साहब इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि, यों तो, पुतले की कलात्मक स्वायत्तता और समग्रता, उसकी सहज नग्नता में ही है; किंतु, समाज और कला के संबंधों की नजाकत को देखते हुए; व्यापक जन-भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, पुतले को चड्डी पहना देना ही उचित होगा।

लेबयान साहब ने यह सिफारिश भी लगे हाथ कर दी कि पुतले की चड्डी को बेगार की तरह से न लिया जाए। ऐसा नहीं कि गंदी सी रबड़ या प्लास्टिक की चड्डी पहनाई, और छुट्टी पाई। चड्डी रोजाना बदली जानी चाहिए, पर्याप्त संख्या में चड्डियो की व्यवस्था होनी चाहिए, सारी चड्डियाँ एक ही रंग और एक ही डिजाइन की नहीं होनी चाहिएँ। चड्डी पहना दिए जाने के बावजूद पुतले से छलकते ताजगी और नवीनता के अहसास पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

आज का चल-समारोह इन सिफारिशों पर अमल का ही समारोह था। आगे-आगे चल रहे नौजवानों के हाथ में जो थाल थे, उनमें पूरी तीस चड्डियाँ थीं। आज पहनाई जाने वाली, शांति और सद्भावना के सफेद रंग की चड्डी एक अलग थाल में अकेली सुसज्जित थी। केयरटेकर की नियुक्ति हो चुकी थी, आज मुख्यमंत्री और गंगाधरजी द्वारा संयुक्त रूप से पहली चड्डी पहनाई जाने के बाद, नियमित रूप से पुतले की चड्डियाँ बदलना, धुलवाना, उनकी सार-सँभाल करना केयरटेकर का ही काम होने वाला था।

सारी व्यवस्थाएँ ठीक थीं, बस पुतले का आवरण हटना था। उसके पहले नेताओं का माल्यार्पण से स्वागत, फिर उनके भाषण और दूसरे रीति-रिवाज हस्बमामूल होने ही थे…इस  सब  के बाद, गोल दीवार के दरवाजे पर बरसों से जड़ा ताला खोला गया…

पुतले का आवरण अंतत: हटा, और हटते ही…

गंगाधरजी को पुराणों का कलि-काल वर्णन याद आने लगा, कभी विष्णुपुराण के श्लोक याद आएं, तो कभी अग्निपुराण के। कलिकाल में वस्तुएँ अपना धर्म त्याग देती हैं, आग जलना बंद कर देती है, पानी बहना…सब कुछ उलटा-पुलटा हो जाता है, यहाँ तक कि मनुष्यों का कद छोटा होने लगता है, लोग बौने होने लगते हैं…चौंक पड़े गंगाधरजी…कलियुग यानी बौना समय, बौनों का समय…याने हमारा समय…लेकिन, गंगाधरजी किसी भी पुराण के कलियुग वर्णन में वैसा कुछ होने का संकेत याद नहीं कर पा रहे थे जैसा उनके सामने इस पल था…

उधर, मुख्यमंत्री का पुराण-बोध तो प्रधानमंत्री के वंश-पुराण तक ही सीमित था, हालांकि उस पुराण में भी चमत्कारों की कोई अभाव नहीं था, लेकिन ऐसी अनहोनी के संकेत तो वहाँ भी नहीं थे।

प्रो. रवि सक्सेना की प्रतिक्रिया दोनों महानुभावों से कुछ कुछ मिलती-जुलती; कुछ-कुछ अलग थी…जो देख रहे थे उसे देख कर मन में अचंभा भी था, क्रोध भी, लेकिन खुद के सही साबित होने के संतोष का बोध भी…मैं तो पहले से ही जानता था कि हरामी कुछ अनहोनी करेगा ही करेगा, जिस दिन साले ने मुझे सताया था, बरसों से चले आ रहे, अच्छे-खासे दांपत्य-जीवन के बावजूद इंचीटेप हाथ में उठवाया था, मैं तो उसी दिन भाँप गया था इस कमीने का हरामीपन….यार लोग मुझे ही पागल समझने लगे थे, परम-प्रिया जया जी तो चोरी-छुपे सायकाट्रिस्ट से कंसल्ट भी कर आई थी, साली गंदी-गंदी फैंटेसी खुद पालती थी, सायकिक केस मुझे बताती थी, अब यहाँ लेके आ अपने उस फ्रायड की नाजायज औलाद सायकाट्रिस्ट को…देख, देख इस साले पुतले की हरकत…

सही साबित होने के संतोष के अजीब से क्रुद्ध बोध के साथ ही रवि हताश भी बहुत थे…चकित तो वे क्या सारा जन-समूह था, टीवी पर लाइव कवरेज देख रहा सारा देश था…

जो लोग पुतले को उसके निर्वासित एकांत में भेज उसकी नियति पर विमर्श, विवाद, संवाद और संग्राम करते रहे थे, आज उनके चकित होने का ही दिन था। नहीं, पुतला गायब नहीं हुआ था, वह अपनी उसी जगह पर था जिसे उसकी जेल में बदल दिया गया था। लेकिन आज पुतले ने जेल को चुपचाप अपनी जगह में फिर से बदल डाला था, अपने निर्वासित एकांत को अपने होने की खामोश मुनादी में बदल डाला था।

पुतला वहीं था, नहा वैसे ही रहा था, लेकिन था वैसा ही नहीं, जैसा कि बीस साल पहले। उसे निर्वासित करने वालों ने सोचा था कि सड़ता रहेगा, विवाद का निपटारा होने तक; पुतला निर्वासन में सड़ने की बजाय एकांत में बड़ा हो गया था। थाल में भात की  सामग्री की तरह  सजा कर लाईं गयीं चड्डियाँ तो पाँच साल के बच्चे के लिए थीं, और यहाँ भतैयों के सामने नहा रहा था–पचीस साल का सजीला, सांवला, संगमरमरी नौजवान…वैसे ही भोले शरारतीपन के साथ, अकेले नहा सकने  के आत्म-विश्वास के साथ, निर्वस्त्र नहा सकने के सुख के साथ…पुतले के भोले शरारतीपन के सामने गंगाधरजी को याद आ रहे पुराणों का कलि-काल-वर्णन उलटा हो गया था। गंगाधरजी को समझ नहीं आ रहा था कि इस उलटबाँसी का क्या अर्थ निकालें कि जीवित होने का दावा करने वाले मनुष्य जिस कलिकाल में बौने होते जा रहे हैं, उसी कलिकाल में पत्थर का यह जड़ पुतला अपने कद में बढ़ता चला गया था।

जो चड्डियाँ पुतले को पहनाने के लिए लाईं गयी थीं, वे उसकी निर्वस्त्रता के आगे छोटी पड़ गयीं थीं, और उसे चडडी पहनाने पर आमादा अक्लें उसकी हिमाकत के सामने बौनी हो गयीं थीं। पथरीले पुतले की खामोशी के आदी लोग खुद पथरीली खामोशी में चले आए थे। कलियुग-वर्णन सटीक उतर रहा था। सभी वस्तुएँ अपना-अपना स्वधर्म त्याग रहीं थीं। बैंड वाले बैंड बजाना भूल गये थे, नारे लगाने वाले नारे लगाना। चीख-चीख कर खबरें तोड़ने वाले, हरेक इंसान से तुके-बेतुके सवाल पूछने वाले और खुद को देश भर की आवाज बताने वाले टीवी एंकर तक हकबका कर चुप हो गये थे।

इस खामोशी में, यह मंजर यह नजारा सीधे या टीवी के जरिए देख रहे अंतर्जालजनित-ज्ञान-संपन्न महानुभवों और देवियों की स्मृतियों में यूरोप के विभिन्न म्यूजियमों में संरक्षित निर्वसन पुतले प्रकट होने लगे थे… स्मृतियाँ तो यूरोप की सैर कर रही थीं, वर्तमान पल में महानुभावों की चेतना में कुंठा और ईर्ष्या सक्रिय हो चली थी और देवियों की चेतना में जिज्ञासा और कामना…

सारा देश स्तब्ध था, मौन था, लेकिन प्रोफेसर रवि सक्सेना के भीतर, संगमरमरी चट्टान के इस दुष्ट टुकड़े, साँवले पुतले को देख कर चट्टानें तोड़ने वाले डायनामाइट के विस्फोट हो रहे थे… अपनी जन्मजात प्रगतिशीलता को साथ लिए दिए ही उन्हें, इस पल धार्मिक अंधविश्वासों पर विश्वास ही नहीं उन्हें जीने की अदम्य कामना भी हो रही थी। वे एक पल अपनी कल्पना किसी राक्षस के रूप में कर रहे थे कि इस दुष्ट को कच्चा ही चबा जाएँ, अगले पल किसी अगियाबैताल ऋषि-मुनि के रूप में कि शाप उच्चारें और पुतला अपने अंग-प्रत्यंग-उपांग सहित खंड-खंड हो जाए। लेकिन पुतला तो खड़ा था, पुतला तो बड़ा था, अपने अंग-प्रत्यंग-उपांग सहित बड़ा। एक पल के लिए ही सही, रवि को इस घोर कुंठा के क्षण में भी अपनी तारीफ करने का मन हो आया, ‘देखा, मेरा सहज कवि-स्वभाव। पुतले की कमीनगी तक कविता बन कर ही, खड़ा और बड़ा के अनुप्रास में ही, दर्ज हो रही है मेरे मन में…’

लेकिन, अगले ही पल उनके क्रोध का लावा जया की ओर बह निकला था—तिरिया चरित्तर, तिरिया चरित्तर साला…

फिर पालिटिकली इनकरेक्ट मुहावरा…

ऐसी की तैसी पालिटिकल करेक्टनेस की…तिरिया-चरित्तर नहीं तो और क्या है कि पहले पुतले के नंगेपन का खुलेआम समर्थन किया, फिर मेरा लिहाज करने का नाटक करके बाहर तो चुप रहने लगी, लेकिन घर में… तिरिया-चरित्तर, तिरिया-चरित्तर…शुद्ध तिरिया-चरित्तर… साजिश थी दोनों की।  यह साला पुतला यहाँ चुपचाप खड़ा-खड़ा बड़ा होता रहा, वहाँ वो कमीनी मेरी धरम की पत्नी सब जानते हुए चुप्पी साधे रही…मेरा कार्टून बनाती रही…मिल कर किया है दोनों ने….इस साले का तो क्या करें, लेकिन इस लुगाई को ठीक नहीं किया तो मैं वाकई…साला और कुछ नहीं, शुद्ध ककोल्ड ही रहा…

कुछ ही देर पहले तक सिंह-गर्जना के अंदाज में उछाले गये  जयकारों के जरिए जया की पराजय का उत्सव मनाते रवि, इस पल कूं-कूं तक ठीक से नहीं कर पा रहे थे। वे इस हृदय-विदारक वेदना को और उसे सारे जीवन झेलने के अभिशाप को ऐन आँखों के सामने देख रहे थे कि  कद-काठी में ही नहीं;  जया के मन में उसके और खुद के बीच चलने वाली जिस तुलना की आशंका में रवि पिछले बीस साल में लगातार कमजोर, बौने और दुबले होते चले गये थे, उस तुलना में भी, पुतला निश्चय ही, स्ट्रांगर, लांगर और थिकर हो गया था।

 

Kumbh Mela at Jaipur Litfest.

¨ The colonization of mind is the greatest stumbling block in the way to understand the past and present of any non-European society including India. Some people think the pre-British India  was just frozen in time. There was hardly anything there except constant atrocities and deep-rooted irrationality British Raj brought enlightenment, it brought dynamism, it brought unshackling of mind. On the other hand, some people are convinced that India before the British  rule was a vertibale heaven on earth. All our problems have caused by the foreigners. In other words, forget about solutions, we Indians are not even capable of creating our own problems. Both of these contradictory perceptions of India’s past emanate form the same source–Colonial Episteme””

(भारत, बल्कि किसी भी गैर-यूरोपीय समाज के अतीत और वर्तमान को समझने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है-  चेतना का उपनिवेशीकरण। कुछ लोगों को लगता है कि अंग्रेजी राज की स्थापना के पहले का भारत धरा पर स्वर्ग समान था। हमारी हर समस्या विदेशियों की देन है। दूसरे शब्दों में, अपनी समस्याएं हल तो हम क्या करेंगे, इतनी भी सामर्थ्य परमात्मा ने भारतीयों को नहीं दी है कि अपने लिए कुछ समस्याएं खुद भी पैदा कर सकें।दूसरी ओर, कुछ लोगों को लगता है कि अंग्रेजी राज आया तो मुक्ति आई, प्रगति आई, आधुनिकता आई, वरना तो भारतीय समाज तो जैसे बर्फ में जमा हुआ था। अंग्रेजी राज के पहले  के भारतीय जन-जीवन में, अत्याचारों और तर्कविहीन परंपराओं के अंधानुगमन के सिवाय, था क्या? परस्पर विरोधी दिखने वाले ये मूल्यांकन असल में एक ही जमीन पर खड़े हैं। वह जमीन है— औपनिवेशिक ज्ञानकांड की जमीन…)

This evening in Jaipur, I was recalling the above-mentioned opening statement of  ‘Akath Kahani Prem ki’ while having a lively chat with Devdutt Patnaik, well-known author and management consultant, and his friend Partho Sengupta. They were very excited about what I said at  the  Kumbh Mela session yesterday at Jaipur Litfest where I had spoken along with Diana Eck and James Mallenson. In this session, I pointed out that Kumbh in our cultural memory and in the idiom of our languages has become a metaphor not of faith alone, but also of celebration of diversity and debate. Any congregation with these qualities is described as Kumbh. In fact, in the opening ceremony, the JLF itself was described as Kumbh Mela of literature and ideas.

To reduce Kumbh to just Shahi Snanas and the Naga Sadhus is to reduce a lively cultural experience to the Exotica Indica created by the colonial gaze. Like any metaphor or word, the significance of Kumbh can be appreciated only if you ‘read’ it as part of a narrative. Kumbh is an opportunity for ‘holy baths’ alright, but it is also an opportunity to reach out to the people. So much so, Swami Dayanada Sarswati who had no sympathy for most of the practices of his contemporary Hinduism, put on a “Pakhand Khanini Pataka” ( the standard challenging the false beliefs) at Haridwar Kumbh  inviting debate and deputations on his interpretation of the Vedas. He was only following the age-old practice of the Kumbh Melas. It was at the Ujjain Kumbh on the 11th may of 1921, that Bhagwadacharya had challenged the Ramanuji Vaishnavs who did not respond, and Bhagwadacharya declared that day as the day of deliverance for Ramanadis. The Fascinating story Of Bhagawadacharya Ramanandi can be read in my essay , ‘In Search of Ramanand’.

James Mallenson, himself a Ramanandi Bhagat could relate with this immediately.

Kumbh a provides an opportunity of deciding the issues of power, hierarchy and heritage. After all, India is not and never was a static, frozen or ”a-historical” society. It was a society having its own material questions along with spiritual quest. Of course, It was and is an unique society, uniqueness, however  lied not in the problems,  but in the solutions it sought. This is something, Raymond Schwab had reminded his European readers in 1950.

I was asked a question about Kumbh, in fact, religiosity in general becoming so popular in this era of  science and rationality. I pointed out that the science as such in itself can not act as an antidote to faith of any kind. In this sense, science and rationality do not necessarily go hand in hand. The fact of the matter is that more empty we become inside, more religious we  turn outside.

It was an interesting session with such a lively audience participation.

 

 

इस माहौल में विवेकानंद

12 जनवरी स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन है। विवेकानंद मेरे बाल और किशोर जीवन के हीरो थे, एक हद तक आज भी हैं। आज यह लेख आप लोगों के सामने रख रहा हूँ। यह राजेन्द्र माथुर द्वारा संपादित ‘नवभारत टाइम्स’ में पहले पहले छपा था, शायद 1990 या 1991 की बारह जनवरी के आस-पास।

बाद में यह मेरी पहली प्रकाशित पुस्तक, ‘संस्कृति: वर्चस्व और प्रतिरोध’ ( पहला संस्करण, 1995) में संकलित किया गया।

शायद आपको अच्छा लगे, यह लेख विवेकानंद-जयंती के अवसर पर।

इस माहौल में विवेकानंद

विवेकानंद का नाम सुनते ही औसत हिंदू दिमाग में क्या तस्वीर उभरती है ? गेरुआ वस्त्रधारी, सुदर्शन, तेजस्वी संन्यासी, जिसने सितम्बर, 1893 की शिकागो धर्म-संसद में हिन्दू धर्म की महानता और मनीषा के झंडे गाड़ दिए । हिंदू होने पर शरमाने की बजाय गर्व करना सिखाया और साबित किया कि हम किसी से कम नहीं । यह तस्वीर असत्य नहीं, अर्द्धसत्य है । इसकी व्यापक लोकस्वीकृति का कारण भी असल में इसका अधूरापन ही है । अपने धर्म पर गर्व विवेकानंद अवश्य करते थे । इस गर्व का, राजनीतिक रुप से पराधीन समाज के लिए, अर्थ भी बहुत ज्यादा था । मामला राजनीतिक पराधीनता के बावजूद सांस्कृतिक स्वाभिमान बनाए रखने का था । लेकिन विवेकानंद का स्वाभिमान कूपमंडूकों के आत्मविश्वास से तो भिन्न था ही; उन पक्षियों के आक्रामक गर्व से भी अलग था, जिनकी सभा में दोपहर अँधेरी होती है ।

विवेकानंद की समग्र चिंता और गतिविधि को एक अधूरी तस्वीर तक सीमित भी तो वे ही लोग करना चाहते हैं, जो तीखे सवालों की चिलकती धूप के अस्तित्व तक से इंकार करने के इच्छुक हैं । ऐसे विवेकानंद उनके काम के हैं, जो हिंदुत्व पर गर्व करना सिखाएँ । लेकिन शूद्रराज और समाजवाद की बातें करने वाले विवेकानंद ? कर्मयोगी की नैतिकता का आधार आस्तिकता को नहीं, सामाजिक न्याय के संघर्ष को मानने वाले विवेकानंद ? वे तो झंझट पैदा करेंगे । सो, उनकी अधूरी तस्वीर को ही सब कुछ मानो । सन्यासी की तेजस्विता पर गर्व करो, लेकिन उस आत्म-संघर्ष और आलोचनात्मक विवेक से कोई वास्ता न रखो, जिससे तेजस्विता संभव हुई । विवेक की जीवंत उपस्थिति को जड़ प्रतिमा बना दो और चुनिंदा तारीखों पर फूलमाला अर्पित कर दो । यही नहीं, इस प्रतिमा के जरिए ऐसे सवालों का मुँह बंद कर दो, जिनसे विवेकानंद तब टकराए और सौ बरस बाद आज भी टकराते । परम्परा के अपहरण की इस राजनीति के शिकार विवेकानंद अकेले नहीं हैं । इसीलिए सवाल सिर्फ उनका न होकर सारी सांस्कृतिक विरासत को समझने और उसे मुक्ति की दिशा में विकसित करने का है । स्वयं विवेकानंद के शब्दों में, “ताकत के बूते निर्बल की असमर्थता का फायदा उठाना धनी-मानी वर्गों का विशेषाधिकार रहा है, और इस विशेषाधिकार को ध्वस्त करना ही हर युग की नैतिकता है ।” (स्‍वामी विवेकानंद, ‘कम्‍पलीट वर्क्‍स,’ मायावती संस्‍करण, कलकत्‍ता,1950, खंड-।, पृ.434- 35.)

 

विवेकानंद धार्मिक व्यक्ति थे, राजनीतिक नहीं । राजनीति से उनकी विरक्ति तो “खबरदार, मुझे छूना मत” किस्म की थी । इसीलिए यह और भी ध्यान देने की बात है कि वे नैतिकता की परिभाषा विशेषाधिकार पर आधारित सत्तातंत्र के खिलाफ संघर्ष के रुप में करते   हैं । तो क्या विवेकानंद धर्म का सिर्फ इस्तेमाल कर रहे थे ? जो व्यक्ति यह कहे कि “भूखे के सामने भगवान पेश करना उसका अपमान हैं”,  वह कैसा धार्मिक व्यक्ति था ? जो व्यक्ति यह पूछे कि “ धर्म को सामाजिक नियमों से क्या प्रयोजन ?” और फिर कहे कि “धर्म को कोई हक नहीं कि समाज के नियम गढ़े । उसे चाहिए कि अपनी हद में रहे ।” उसे क्योंकर धार्मिक माना जाए । ख़ास कर आज के माहौल में, जबकि ‘साधु-संत’ खुले आम राजनीतिक उठा-पटक में लगे हुए हैं । आख़िर विवेकानंद के लिए धार्मिक होने का मतबल क्या था ?  उनकी कठोर सामाजिक आलोचना और सक्रियता का धार्मिकता से किस प्रकार का संबंध था ? ऐसे सवालों के संदर्भ में विवेकानंद का अर्थ समझने के लिए रामकृष्ण परमहंस को समझना अनिवार्य है । साथ ही उस परिवेश के बुनियादी सवालों को भी, जिसकी बेचैनी विवेकानंद के धर्म में वाणी पा रही थी । ऊपर से देखें तो गुरु-शिष्य दो विपरीत छोरों पर थे । विवेकानंद सुदर्शन, बलिष्ठ युवक थे, तो परमहंस क्षीणकाय । विवेकानंद अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे भद्रलोक थे, तो रामकृष्ण दक्षिणेश्वर मंदिर के साधारण शिक्षित पुजारी । विवेकानंद संशयवादी, बुद्धिवादी थे, तो परमहंस आस्थावान साधक ।

रामकृष्ण की साधारणता ही उनकी असाधारणता थी । वे बहुत सहज रूप से विवेकानंद (जो तब तक नरेंद्र ही थे) के सीधे सवाल का सीधा जवाब दे सकते थे, “हाँ, मैंने ईश्वर को देखा है । ऐसे ही, जैसे इस वक्त तुम्हें देख रहा हूँ ।”  बँधे-तुले धर्म और महीन तर्क के प्रति उदासीन निजी अनुभव पर आधारित यह आत्म-विश्वास रामकृष्ण परमहंस को मध्यकालीन भक्तों की परम्परा से जोड़ता है । रुढ़िवादी शास्त्र-धर्म के विरुद्ध जो लोकधर्म भक्तों की बानी में रचा-बसा है, रामकृष्ण परमहंस का व्यक्तित्व उसी लोकधर्म का मूर्त रुप था । साधना के नितांत निजी धरातल तक परमहंस ने हर धर्म – हिंदू, इस्लाम, ईसाई – को अपनाया था । वे संवादी सबके थे, अन्धानुयायी किसी के नहीं ।

भक्ति-संवेदना की विलक्षणता यही है कि उसने प्रेम को ही आधार माना – भक्त और भगवान का संबंध हो या मनुष्य और मनुष्य का । रामकृष्ण परमहंस के व्यक्तित्व में इस विलक्षणता ने प्रामाणिक और समकालीन अर्थ पाया तथा विवेकानंद के कर्म में व्यावहारिक विस्तार । विवेकानंद जब नारायण को दरिद्र में देखते थे, दरिद्र नारायण की सेवा को ही धर्म का सार कहते थे, तो वे उनके अपने शब्दों में “गुरु के उपदेश को जीवन में उतारने की चेष्टा” ही कर रहे थे । यह उपदेश बहुत गहरे अहसास के रुप में मिला था, युवक नरेंद्र को । जब उन्होंने निर्विकल्प समाधि पाने की साधक-सुलभ इच्छा प्रकट की, तो गुरु ने उन्हें झिड़क दिया,  “धिक्कार है तुम्हें । मैं समझता था, तुम असंख्य आत्माओं के वट वृक्ष बनोगे, तुम केवल अपना स्वार्थ विचार रहे हो ।” (सत्‍येंद्रनाथ मजूमदार, ‘विवेकानंद चरित’, नागपुर, 1967, पृ.161)

परमहंस केवल नरेंद्र को धिक्कार रहे थे या उस समूचे बोध को, जिसके लिए धार्मिक होने का अर्थ था – सामाजिक यथास्थिति का सहायक होना या फिर केवल अपने मोक्ष की चिंता करना । यह धिक्कार नरेंद्र के लिए इस सच्चाई का साक्षात्कार बना कि मुक्ति अकेले को नहीं मिला करती । वे धर्म को किसी राजनीतिक प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, वे निस्संदेह धर्म को जी रहे थे, लेकिन उसे नया अर्थ देते हुए । जड़ता के स्थान पर संघर्ष से धर्म को परिभाषित करते हुए । विवेकानंद उन भाग्यवानों में से नहीं थे, जिन्हें हर सवाल के तैयार जवाब मिल जाते हैं, वे उन अभागों में से भी नहीं थे, जो ऐसे रेडीमेड जवाबों को जीवन, धर्म और संस्कृति का सार मान बैठते हैं । उन्होंने न तो धर्म की प्रचलित अवधारणा स्वीकारी, न देश का चालू विचार । उन्होंने सचमुच भारत की खोज की – पूरे दो बरस देश के कोने-कोने में घूमकर उन्होंने भारतीय समाज की ताकत और कमजोरी को परखा । इस परख के ही क्रम में ही वे स्वयं को भी परख सके । जो लोग समझते हैं कि विवेकानंद को सारा बोध कन्याकुमारी के तट पर एक ही रात में हासिल हो गया, वे विवेकानंद की आंतरिक-बाह्य खोज के मर्म को समझ ही नहीं सकते ।

सन् 1891 में पैर में चक्कर लेकर निकले तेजस्वी संन्यासी विवेकानंद ने सब कुछ त्याग दिया था । सब कुछ त्याग देने का नुकसान भी होता है । वह यह कि व्यक्ति स्वयं को बहुत ऊपर समझने लगता है । ‘पवित्र’ होने के नाते उसे उन सबसे घृणा का अधिकार प्राप्त हो जाता है, जिन्हें वह स्वयं अपवित्र मानता हो । अप्रैल, 1891 में स्वामी विवेकानंद खेतड़ी नरेश के अतिथि थे । एक दिन ऐसा हुआ कि एक वेश्या को गाना सुनाने के लिए तलब किया गया । पवित्र संन्यासी क्षुब्ध होकर कमरे से चले गए । दुनियादार लोगों की वासना और तिरस्कार की आदी स्त्री को पवित्र सन्यासी का यह तिरस्कारपूर्ण रवैया बहुत गहरे चुभा और यह चुभन उसने व्यक्त की, सूरदास के पद में, “प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो ।” यह विवेकानंद के पवित्रतावादी अहंकार के विगलन का क्षण था । ( रोमाँ रोलाँ, ”दि लाइफ ऑफ विवेकानंद एण्‍ड दि यूनिवर्सल गॉस्‍पेल”, कलकत्‍ता,1965,पृ.24-25; तथा मजूमदार, पूर्वोक्‍त, पृ.313-4.) उसके बाद वे कभी लांछितों, वंचितों और दलितों के प्रति सामाजिक तिरस्कार में हिस्सा नहीं बंटा सके । बल्कि इन लोगों के लिए उनकी करुणा समाज के ‘पवित्र’ भद्रलोक की कठोरतम आलोचना में व्यक्त हुई ।

विवेकानंद संभवतः अपने समय के अकेले सवर्ण कुलोत्पन्न विचारक थे, जिन्होंने भारत के उच्च वर्ग और सवर्ण समाज को बतौर सामाजिक समूह के ऐसी लगती हुई बातें कहीं, “शुद्ध आर्य रक्त का दावा करने वालो, दिन-रात प्राचीन भारत की महानता के गीत गाने वालो, जन्‍म से ही स्‍वयं को पूज्‍य बताने वालो, भारत के उच्‍च वर्गो, तुम समझते हो कि तुम जीवित हो ! अरे, तुम तो दस हजार साल पुरानी लोथ हो….तुम चलती-फिरती लाश हो….मायारुपी इस जगत् की असली माया तो तुम हो, तुम्‍हीं हो इस मरुस्‍थल की मृगतृष्‍णा….तुम हो गुजरे भारत के शव, अस्‍थि-पिंजर…..क्‍यों नहीं तुम हवा में विलीन हो जाते, क्‍यों नहीं तुम नये भारत का जन्‍म होने देते ?” (स्‍वामी विवेकानंद, ‘कम्‍पलीट वर्क्‍स’ (खण्‍ड-7), पृ.354.)

 

विवेकानंद समकालीन राजनीति से दूर ही रहते थे, लेकिन उनका धर्म सामाजिक सत्‍ता के सवाल से लगातार टकराता था। यही कारण है कि राजनीति से कोई वास्‍ता न रखने वाले स्‍वामी विवेकानंद बार-बार राजनीतिकर्मियों के प्रेरणास्रोत बने, और यही कारण है कि शोषणकारी समाजसत्‍ता को बनाए रखने के इच्‍छुक लोग विवेकानंद को हथियाने की कोशिश बार-बार करते रहे और अब भी कर रहे हैं, ताकि उनकी प्रखर सामाजिक चेतना को छद्म राष्‍ट्रवाद के हित में इस्‍तेमाल किया जा सके। इस खतरे का अहसास स्‍वयं विवेकानंद को था। इसीलिए उन्‍होंने कहा था, ”लोग देश-भक्‍ति की बातें करते हैं। मैं देश-भक्‍त हूँ, देश-भक्‍ति का मेरा अपना आदर्श है।…..सबसे पहली बात है, हृदय की भावना। क्‍या भावना आती है आपके मन में, यह देखकर कि न जाने कितने समय से देवों और ऋषियों के वंशज पशुओं-सा जीवन बिता रहे हैं ?  देश पर छाया अज्ञान का अंधकार क्‍या आपको सचमुच बेचैन करता है? …..यह बेचैनी ही देश-भक्‍ति का पहला कदम है।” (विनय रॉय द्वारा उद्धृत, ‘सोशियो पॉलिटिकल व्‍यूज़ ऑफ विवेकानंद’-पी.पी.एच., नयी दिल्‍ली, 1983, पृ.54-55.)

 

गरीबी, शोषण और अज्ञान के अहसास से बेचैन होना ही देश-भक्‍ति का पहला प्रमाण है-पिछले सौ साल में इस कसौटी की प्रासंगिकता बढ़ी ही है। इस माहौल में, जबकि सामाजिक न्‍याय और देश-भक्‍ति को अलग-अलग किया जा रहा है, जबकि राष्‍ट्रवाद को आक्रामकता और घृणा का पर्याय बनाया जा रहा है, तब यह कसौटी सच्‍ची देश-भक्‍ति और छद्म-राष्‍ट्रवाद के बीच अंतर करने के लिए बहुत जरुरी है। इन असली सवालों को राजनीतिक एजेंडा से गायब ही कर देने को जो लोग राष्‍ट्रवाद कहते हैं, और फिर विवेकानंद के नाम की माला जपते हैं, वे सचमुच धन्‍य हैं और धन्‍य है पाखंड कर सकने की उनकी क्षमता।

 

विवेकानंद के समय को हम नवजागरण का समय कहते हैं। उनके परिवेश की बुनियादी समस्‍या यही थी। भारतीय समाज का सामाजिक-सांस्‍कृतिक नवजागरण। कैसे यह महादेश अपनी सांस्‍कृतिक पहचान फिर से प्राप्‍त करे?  कैसे यह विराट् जनसमुदाय सामाजिक स्‍पंदन प्राप्‍त  करे ?  कौन-सी बाधाएँ हैं इस संभावना के रास्‍ते में ?  कौन-सा सामाजिक तबका हटा पाएगा इन बाधाओं को ?  हमारे अपने समय में भी ये सवाल अप्रासंगिक नहीं हो गए हैं, बल्‍कि पिछले सौ साल के अनुभवों ने कुछ नए सवाल और खड़े कर दिए हैं। विकास का अर्थ और उसकी कसौटी क्‍या है ? भारतीयता की पहचान क्‍या है ? दलितों, स्‍त्रियों की कोई हिस्‍सेदारी सामाजिक सत्‍तातंत्र में होनी चाहिए या नहीं ? यदि हां, तो कैसे ? यदि नहीं, तो क्‍यों नहीं ? धर्म की मनुष्‍य के अंतर्जगत तथा सामाजिक जीवन में क्‍या भूमिका है ? हम अपने समाज की किस बात पर गर्व करें और किसके खिलाफ़ संघर्ष ? ये सवाल हमारे वर्तमान को गहरे में मथ रहे हैं। इस मंथन के माहौल में हम विवेकानंद की बैचेनी से क्‍या हासिल कर सकते हैं ? उनकी भावनाओं तथा विचारों की हमारे वक्‍त में दिशा कौन-सी हो सकती है ? परम्‍परा को समझने के असली सवाल ये ही हैं, और इन्‍हीं को भुलाने की कोशिश वे लोग करते हैं, जो विवेकानंद जैसी बेचैन मेधा को एक अधूरी तस्‍वीर में बदलने का अनुष्‍ठान कर रहे हैं।

 

‘कर्मयोग का आदर्श’ नामक प्रसिद्ध व्‍याख्‍यान में विवेकानंद ने कर्मयोग की विलक्षण परिभाषा की, “इस प्रकार कर्मयोग नि:स्‍वार्थ सद्कर्मों द्वारा मुक्‍ति प्राप्‍त करने का नैतिक और धार्मिक प्रयत्‍न है । कर्मयोगी के लिए जरुरी नहीं कि वह किसी सिद्धांत विशेष का अनुगमन करे, आत्‍मा आदि के सवालों पर विचार करे। भगवान में विश्‍वास करना तक कर्मयोगी के लिए अपरिहार्य नहीं है।” (‘सेलेक्‍शंस फ्रॉम स्‍वामी विवेकानंद’, कलकत्‍ता, 1957, पृ.30.) यह इस कारण, क्‍योंकि विवेकानंद के अनुसार जीवन का मूल प्रतिमान आस्‍तिकता नहीं, बल्‍कि नैतिकता है, और नैतिकता का सार है – स्‍वतंत्रता के लिए संघर्ष, शोषण को विशेषाधिकार मानने वाली व्‍यवस्‍था के विनाश के लिए संघर्ष।

 

विवेकानंद ने हिंदू समाज के संदर्भ में इन सारे सवालों पर विचार किया। दासता का स्रोत, उनके अनुसार, कूपमंडूकता और जाति प्रथा में निहित था। वे अपने समाज से सच्‍चा प्‍यार करते थे । इसलिए झूठे गर्व के जरिए लोगों को भरमाने की बजाय ताकत और कमजोरी को ठीक-ठीक पहचानने का प्रयत्‍न करते थे। कूपमंडूकता और जाति प्रथा के जरिए समाज की छाती पर सवार उच्‍च वर्ग को धिक्‍कारते हुए विवेकानंद राष्‍ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए बने-बनाये राष्‍ट्रवाद की पोटली उठा लाने के लिए नहीं दौड़ पड़ते थे। वे जानते थे कि राष्‍ट्र दरिद्रनारायण में निवास करता है, और उसे “जागना है – हलधर किसान के झोंपड़े से, मछुआरे की कुटिया से, नीची जातियों के बीच से…… राष्‍ट्र को जागना है – कारख़ानों और बाज़ारों से, जंगलों और पहाड़ों के निवासियों के बीच से। इन साधारण लोगों ने हजारों बरस अत्‍याचार सहे हैं, और इसी कारण उन्‍हें रक्‍तबीज जैसी विलक्षण जीवनी-शक्‍ति प्राप्‍त हो गई है ….. उन्‍हें आधी रोटी भी मिल जाए, तो ऐसी ऊर्जा उपजेगी उनके बीच, जो सारी दुनिया को हिलाकर रख देगी। भारत के उच्‍च वर्गों, अतीत के अस्‍थिपिंजरों । ये जनसाधारण ही हैं आने वाले भारत के भाग्‍यविधाता ।”( ‘कम्‍पलीट वर्क्‍स’,  (खण्‍ड-7), पृ.309-10.)

 

इस आने वाले भारत की व्‍यवस्‍था की कल्‍पना विवेकानंद शूद्रराज के रूप में करते थे। शूद्र शब्‍द का प्रयोग भी वे केवल जातिवाचक अर्थ में नहीं, शोषित वर्ग के अर्थ में करते थे। उन्‍होंने उपनिवेशवाद के बारे में कहा था कि “इसके कारण समूचे के समूचे राष्‍ट्र शूद्र दशा में पहुंच गए हैं।” वे इतिहास को ब्राह्मण राज, क्षत्रिय राज, और अपने समकालीन समय को वैश्‍यकाल के रूप में देखते हुए आने वाले समय में शूद्रराज, अर्थात् दलितों, शोषितों के राज को अपरिहार्य मानते थे। विवेकानंद संभवत: पहले भारतीय थे, जिन्‍होने स्‍वयं को सामाजिक-आर्थिक अर्थ में ‘समाजवादी’ कहा, बेशक इस सावधानी के साथ कि “भले                                                                                                                                                                                                                                                                 ही समाजवाद आदर्श व्‍यवस्‍था न हो, लेकिन न कुछ से तो बेहतर ही है।”

 

विवेकानंद का विरोधाभास यह था कि वे जनसाधारण को गैर-राजनीतिक रखना चाहते थे,  जो कि संभव ही नहीं था । सामाजिक-सांस्कृतिक दासता के स्रोत पर चोट ही तो असली राजनीतिक कार्यवाही है। जो यह चोट करना चाहे, वह स्‍वयं राजनीति से कितना ही दूर भागे, राजनीति उसे कहां भागने देगी ?  इस बात को ध्‍यान में रखते हुए सोचना चाहिए कि इस वर्तमान में विवेकानंद के विचारों की दिशा क्‍या हो सकती है ?

 

विवकोनंद कवि भी थे । अपने अंतर्द्द्धों से वे कई बार कविता में ही टकराते थे । वे सच्‍चे धार्मिक व्‍यक्‍ति थे, सो कई बार उनके मन में नितांत वैयक्‍तिक साधना की इच्‍छा बलवती हो उठती थी। दरिद्रनारायण की सेवा के गुरुमंत्र और वैयक्‍तिक साधना के इस द्वंद् से विवेकानंद बार-बार टकराते दीखते हैं – कविताओं में, व्‍यक्‍तिगत पलों में, यहां तक कि सार्वजनिक लेखों, भाषणों तक में। इस सारे आत्‍मसंघर्ष के बाद हम उनके जीवन में अंतत: वही सच्चाई उभरती देखते हैं, जिसे रोमाँ रोलाँ ने ये शब्‍द दिए हैं : ”हां, विवेकानंद जैसा कवि बार-बार इस नर्क में लौटने को बाध्‍य है। यह उसकी नियति ही है, जीने का एकमात्र तर्क ही है- बार-बार जन्‍म लेना, इस नर्क की ज्‍वाला से संघर्ष करना, उससे झुलसते जनों में प्राण फूँकना, उन्‍हें बचाने के लिए स्‍वयं अपनी आहुति दे देना ही उसका धर्म है।” (रोमाँ रोलाँ, ‘विवेकानंद’ लोकभारती, इलाहाबाद, 1993, पृ.105)  ‘धर्म’ की इस समझ के कोण से देखें, तो विवेकानंद वहां नहीं हैं, जहां खोखले, आक्रामक ‘गर्व’ की टकसाल में हिंदू राष्‍ट्र का खोटा सिक्‍का ढाला जा रहा है। बल्‍कि वे वहां हैं, जहां उनकी कल्‍पना के शूद्रराज की संभावनाएँ टटोली जा रही हैं। विवेकानंद उन लोगों के साथ कैसे हो सकते हैं, जो ‘इस नर्क की ज्‍वाला’ में और ईंधन डाल रहे हैं?  कैसे हो सकते हैं वे उनके साथ, जो करोड़ों वंचितों को आपस में लड़ाकर धर्म और देश-भक्‍ति का नाम लेने का दुस्‍साहस करते हैं?  हमारे माहौल में दासता के स्रोत क्‍या हैं ?  उसके नए-नए रुप कौन-से हैं ?  मुक्‍ति की संघर्ष-यात्रा किस रास्‍ते चलेगी ? जो ये सवाल सच्‍चे मन से पूछे, विवेकानंद की परिभाषा पर खरे उतरने वाले देश-भक्‍त और कर्मयोगी वही हैं । ऐसे लोग विवेकानंद के प्रतिमा-पूजक हों या न हों, उनके विचारक्रम में हमराही अवश्‍य हैं। इस माहौल में विवेकानंद के सच्‍चे उत्‍तराधिकारी महंत, मठाधीश और राजमाताएँ नहीं, शंकर गुहा नियोगी और मेधा पाटेकर सरीखे लोग हैं। वे किसान, मजदूर, दलित, स्‍त्रियाँ तथा नौजवान हैं, जो शोषण-मुक्‍त समाज की स्‍थापना और मानवीय गरिमा की प्रतिष्‍ठा के लिए इस नर्क की ज्‍वाला से जूझ रहे हैं।

 

 

 

 

और क्या होंगे अभी…..

‘आउटलुक’ साप्ताहिक की वार्षिकी  में प्रकाशित मेरा लेख….भगवान जाने, संपुादक जी ने इसे छापते समय  शीर्षक क्यों बदल दिया….

 

और क्या होंगे अभी…..

 

‘हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी?’ सौ साल पुराना यह सवाल आज के भारत में नये सिरे से गूँज रहा है। ना तो सवाल पूछने वाले वही हैं, ना सवाल पूछे जाने का संदर्भ वही है, लेकिन सवाल वही है। बड़े सवालों के जबाव इतिहास के अलग अलग मोड़ों पर बदलते रहते हैं, लेकिन सवाल फिर भी बने रहते हैं।

मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ द्वारा इस सवाल के पूछे जाने के कोई तीस बरस बाद, जवाहरलाल नेहरू अपनी ‘भारत की खोज’ में नोट कर रहे थे कि उनकी सभाओं में जब भी नारा लगता है, ‘भारत माता की जय’; वे लोगों से पूछते हैं कि ‘कौन है यह भारत माता, जिसकी जय का नारा लगा रहे हैं, जिसकी जय हम सब चाहते हैं?’ और फिर नेहरू लिखते हैं कि वे बताते थे लोगों को, कि ‘आप सब लोग स्वयं है भारत माता, हिन्दुस्तान का एक एक इंसान है भारत माता, भारत माता की जय का असली मतलब यही है कि साधारण हिन्दुस्तानियों की जय हो, उन्हें विदेशी शासन से ही नहीं, आंतरिक शोषण और अन्याय से भी मुक्ति मिले’।

ए. आर. रहमान ने ‘वंदे मातरम’ का बेहद मार्मिक,  निजी स्पर्श वाला रूप तैयार किया है, ‘अम्मां तुझे सलाम’। आप ने देखा-सुना ही होगा। इसे सुनते हुए, भारत माता की जय के किसी भी अन्य रूप को सुनते हुए मन में सवाल आते हैं, शायद आपके मन में भी आते हों कि क्या ऐसा जयकारा छत्तीसगढ़ और ओडिशा के आदिवासियों के मन में भी उतने ही सहज रूप से गूँजता होगा? यह जयकारा क्या उत्तरी मध्य-प्रदेश के उन सहरिया जनों के मन में भी गूँजता होगा, जिन में कुपोषण का स्तर इथियोपिया से भी बदतर पाया गया है, जिन की आबादी में डॉक्टरों की उपलब्धता हर एक लाख पर दस के आस-पास है? भारत अवधारणा के प्रति उन मणिपुरियों का रवैया क्या होगा जिनके प्रांत का महीनों तक चलने वाला घेराव, देश-दुनिया से, जिनके संपर्क का पूरी तरह टूट जाना राष्ट्रीय मीडिया के लिए महत्वपूर्ण समाचार नहीं बन पाता?

ये सवाल कई संदर्भों में, कई अवतारों में दोहराए जा सकते हैं। उन लड़कियों के संदर्भ में जो प्रेम करने के अपराध में ‘अपनों’ द्वारा नाक बचाने के लिए काट डाली गयीं, उन लोगों के संदर्भ में जो अपनी जाति या धर्म के कारण अपमान से ले कर प्राण-हरण तक झेलने को अभिशप्त हैं।

और, चूँकि हम बात कर रहे हैं, आजाद होने के पैंसठ साल बाद, ‘संप्रभु,लोकतांत्रिक गणतंत्र’ बनने के बासठ साल बाद; इसलिए यह सवाल सचमुच बहुत गहरी बेचैनी के साथ गूँजने वाला सवाल है- ‘हम कौन थे, क्या हो गये, और क्या होंगे अभी”।

ध्यान रखना चाहिए कि भारत यूरोपीय तर्ज का राष्ट्र-राज्य भले ही स्वाधीनता आंदोलन के फल-स्वरूप बना हो, लेकिन हिमालय के दक्षिण में, और हिन्द महासागर के उत्तर में स्थित भूखंड के निवासियों की संस्कृति के साझेपन की चेतना, इस भूखंड के एक सभ्यतापरक इकाई होने की चेतना महाभारत, विष्णुपुराण,कालिदास और सम्राट अशोक तक जाती है। विष्णुपुराण के अनुसार, हिमालय के दक्षिण में स्थित भू-भाग का नाम भारत, और इसकी सभी संततियों का नाम भारती है। मार्के की  बात है कि विष्णुपुराण का भारत-बोध  अल्लामा इकबाल के तराना-ए-हिन्दी में जस का तस चला आया है; भूगोल, विविधता और आत्म-गौरव तीनों ही स्तरों पर-

परबत वो सबसे ऊंचा हमसाया आसमां का

वो संतरी हमारा, वो पासबां हमारा

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा

यूनान ओ मिस्र ओ रोमां सब मिट गये जहाँ से

अब तक मगर है बाकी नामो निशां हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा।

आगे चल कर भले ही, इकबाल ‘ चीनो अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा/ मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा’ के फेर में पड़ गये हों, लेकिन ‘तराना-ए-हिन्दी’ में वे भारत नामक सभ्यतापरक इकाई और उसकी पहचान ‘भारतीयता’ की निरंतरता और विशिष्टता को बिल्कुल ठीक पहचान रहे थे। ऐसी अद्वितीय निरंतरता का कारण है, सारे विवादों और झगड़ों के बावजूद संवादधर्मिता में विश्वास और सांस्कृतिक साझेपन का बोध। इस बोध और विश्वास ने ही भारतीयता को वह ताकत दी है कि विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं इसमें अपना योगदान करती रही हैं, उनका उद्भव भारत भूखंड की सीमाओं के भीतर हुआ हो बाहर।

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ‘विविधता में एकता’ पर जो बल था, वह इसी पारंपरिक सभ्यता-बोध का समकालीन मुहावरे में प्रस्तुतीकरण था, कोरा तात्कालिक नारा नहीं। लेकिन स्वाधीनता आंदोलन और उसे संभव करने वाले बौद्धिक उपक्रमों की सीमाएं भी भुलाईं नहीं जा सकतीं। गुप्तजी के सवाल- कौन थे क्या हो गये, और क्यो होंगे अभी’  में सोचने का आव्हान भी था, ‘आओ मिल कर विचारें सभी’। दिक्कत यह थी कि इस सभी में व्यंजित ‘हम सब’ के बीच खाई थी। जो हम इस तरह की कविताओं में बोल रहा था, उसमें सारी सदिच्छा के बावजूद दलित, आदिवासी और स्त्री की आवाज की जगह बहुत ही कम थी। औपनिवेशिक ज्ञानकांड और प्रशासन ने जिस बौद्धिक को रचा, उसकी चेतना में और उसके प्रभाव के कारण सारे समाज की चेतना में एक तरह का संवेदना-विच्छेद पैदा हो गया था, जो आज तक चला आ रहा है। संवेदना-विच्छेद से मेरा आशय है—अपने समाज के फौरी अतीत, जीवंत परंपराओं और अपने जन-साधारण की रोजाना जिन्दगी को निर्धारित करने वाले सोच-विचार और दैनंदिन व्यवहार की अवहेलना करना। यह मान लेना कि किसी सुदूर प्राचीन अतीत में भारतीय समाज में आंतरिक गतिशीलता रही हो तो रही हो, अंग्रेजी राज के जड़ें जमाने के पहले याने अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के भारत में सिवाय सांस्कृतिक जड़ता के कुछ बचा ही नहीं था। इसी संवेदना-विच्छेद के कारण, भारतीय आधुनिकता के जनक राजा राममोहन रॉय मान लिये गये, आज तक माने जाते हैं। भारतीय समाज की अपनी परंपरा में, देशभाषाओं में विकसित होती रही देशज आधुनिकता की संवेदना के साथ संवाद कायम करने के प्रयास, गाँधीजी जैसे अपवादों को छोड़ दें तो, बहुत ही कम हुए।  इस संवेदना-विच्छेद के दो एक ही रूपक याद कर लेना फिलहाल काफी होगा।

औपनिवेशिक ज्ञानकांड की अब तक चली आ रही ताकत के बताए हम जानते हैं कि विधवा-दहन पर रोक लगाने की पहली कोशिश राजा राममोहन राय के प्रयासों से विलियम बेंटिंक ने की थी। वास्तविकता यह है कि इन प्रयासों के सौ साल पहले, जयपुर नरेश जयसिंह अपने राज्य में विधवा-दहन प्रथा पर रोक लगा चुके थे। जिस अठारहवीं सदी को भारतीय इतिहास में ऐसे घोर अंधकार का युग मान लिया गया है जिसमें कि कहीं कोई उदार, प्रगतिशील स्वर था ही नहीं, उसी अठारहवीं सदी में बिहार में दरिया साहब और हरियाणा में चरनदास भक्ति-संवेदना के मुहाविरे में सामाजिक आलोचना ही नहीं, सामाजिक एक्टिवज्म भी कर रहे थे। चरनदास का साथ उनकी दोनों बहनें दयाबाई और सहजोबाई दे रहीं थीं, और दरिया साहब के साथ उनकी जीवन-संगिनी भी सक्रिय थीं। इसी अठारहवीं  सदी में, मारवाड़, गुजरात और मुल्तान के हिन्दू व्यापारी अरब सागर पार करके काहिरा तक और कैस्पियन सागर पार करके रूस तक जा रहे थे, वहाँ बस्तियाँ बनाने के साथ ही, समुद्र पार करके  अपने वतन आते-जाते रहने का सिलसिला अबाध रूप से बनाए हुए थे। लेकिन औपनिवेशिक ज्ञानकांड केवल ब्राह्मण समुदाय के रीति-रिवाजों को भारतीयता का प्रमाण मानते हुए ‘सिद्ध’ कर रहा था कि हिन्दू तो समुद्र यात्रा को पाप मानते थे।

अपनी जन्म-कुंडली में ही ऐसे संवेदना-विच्छेद के ग्रह लेकर जन्मी ‘भारतीयता’ में यह होना ही था कि ‘हम’ और ‘सब’ के बीच खाई पैदा हो जाए। इस लिहाज से, पिछले कोई दो दशकों से चल रहे विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों के राजनैतिक-सांस्कृतिक आत्म-रेखांकन का महत्व स्पष्ट होता है।  ‘एकता’ सामाजिक रूप से वर्चस्वशील तबकों के वर्चस्व को दी गयी मनोहर संज्ञा भर न रह जाए, इसके लिए यह जरूरी भी है कि ‘विविधता में एकता’  से परिभाषित होने वाली  भारतीयता में विविधता को उसका उचित महत्व मिले।

लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ और सिर्फ विविधता पर ही बल देना उचित है? एकता के वर्चस्वशील सूत्रों के स्थान पर लोकतांत्रिक सूत्रों की तलाश जरूरी है या नहीं? ऐसी तलाश के अभाव में विविधता को विखंडन में बदलने से कैसे रोका जाएगा? यदि हर सामाजिक अस्मिता केवल अपनी ही मुक्ति की चिंता करे तो क्या किसी की भी मुक्ति संभव हो पाएगी? यदि यह तर्क मान लिया जाए कि दलित की बात दलित ही कर सकता है, और स्री की बात स्री  ही, तो फिर नागरिकता की अवधारणा का क्या होगा? क्या हम एक लोकतांत्रिक मिजाज की रचना नागरिकता की धारणा की उपेक्षा करके कर सकते हैं? हम नहीं भूल सकते कि  भारतीय समाज की बनावट ही  ऐसी है कि यहाँ न धक्कामार ब्राह्मणवाद चल सकता है, न धक्कामार गैर-ब्राह्मणवाद। किसी भी धार्मिक, सांस्कृतिक या भाषाई अल्पसंख्या के प्रति घृणा के आधार पर राजनीति अवांछनीय तो है ही, भारतीय समाज के स्वभाव के कारण दूरगामी तौर पर असंभव भी है। अल्पसंख्या चाहे मुसलमानों/ ईसाइयों की हो, चाहे ब्राह्मणों की।

विविधता में एकता सचाई है, बल्कि कहें कि विविधता तो ऐतिहासिक सचाई है और एकता ऐतिहासिक, राजनैतिक कामना। यह कामना किस हद तक संवेदनात्मक सचाई बन पाई है या बन पाएगी, सवाल यह है।  और सन दो हजार बारह में तो लगता यही है कि विविधता में एकता का संतुलन कुछ गड़बड़ाया है। कारण ऐतिहासिक भी हैं, और राजनैतिक आकांक्षाओं और स्वार्थों से जुड़े हुए भी।  हालत यह हो चली है कि सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों और उनकी राजनीति पर इतना बल है कि भारतीय नागरिकता की, उसमें निहित साझे सपनों की बात करना पिछड़ापन माना जाने लगा है। पहचानें आगे आ गयी हैं, सपने पीछे छूट गये हैं। साझे सपनों के ताने-बाने को, उन्हें वास्तविकता में बदलने  वाले तंत्र को ही ‘संप्रभु भारत’ के  संविधान निर्माताओं ने, ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ का नाम दिया था। डॉ. अंबेडकर ने सबसे बड़ी चुनौती भी याद दिलाई थी- ‘राजनैतिक लोकतंत्र को  सामाजिक लोकतंत्र में बदलना’। लोकतंत्र याने वह व्यवस्था और  वह मिजाज जो किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी व्यक्ति-सत्ता के आधार पर करे, न कि उसकी जन्मजात अस्मिता के आधार पर।

आज हालत यह है कि विधायिका में महिलाओं को आरक्षण देने का विरोध सबसे ऊंची आवाज में वे करते हैं जो जातीय अस्मिताओं के आत्मरेखांकन को राजनैतिक मुहावरे में ढाल रहे हैं। जिन पर समाज के लोकतांत्रिकीकरण की जिम्मेवारी है, और इसी जिम्मेवारी के निर्वाह के लिए संविधान जिन्हें ताकत देता है, वे खापों और पंचायतों के ऊंट-पटांग फरमानों पर चुप्पी साधते ही नहीं,कई बार उन्हें जायज ठहराते भी सुने जा सकते हैं। कहा जाता है कि ‘भई यह तो फलाँ समाज का अपना मामला है, सरकार इसमें क्यों पड़े?’ ध्यान देने की बात यह है कि इस किस्म के वक्तव्यों में ‘समाज’ का मतलब जातियों की पंचायतों और पहचानों से होता है। गोया भारतीय समाज का तो कोई मामला है ही नहीं, जो भी मामले  हैं वे इस या उस जाति के समाज के ही हैं।

निस्संदेह, जाति-व्यवस्था और उससे उपजे पूर्वग्रह, अत्याचार हमारे समाज की कड़वी सचाई हैं। सवाल लेकिन यह है कि इस व्यवस्था को समाप्त करना है या किसी बदले हुए रूप में जारी रखना है? भारतीयता की अवधारणा के लिहाज से, विविधता में एकता की फिर से परिभाषा करने के लिहाज से, और राजनैतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र में बदलने के लिहाज से, यह सवाल केंद्रीय सवाल है।

इस बात को दो टूक रूप से कहने की और मन में बसाने की जरूरत है कि एक तरह के जातिवाद का विकल्प दूसरे तरह का जातिवाद नहीं हो सकता, जातिवाद के जाल को लोकतांत्रिक चेतना की छुरी से ही काटा जा सकता है, दूसरे जातिवाद के जाल से नहीं। दो जाल आपस में उलझ कर जो कर सकते हैं, वह आप और हम आज के भारत में देख ही रहे हैं। एक तरह के अस्मितावाद के अतिचार को खत्म करने के लिए दूसरी तरह के अस्मितावाद के अतिचार को रामबाण मानना व्यर्थ है। व्यक्ति की हो, या समुदाय की, किसी भी  अस्मिता का आत्मरेखांकन राजनैतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र में  बदलने की दिशा में तभी चल सकता है, जब कि ‘आत्म’ का रेखांकन करते हुए, वह ‘अन्य’ के प्रति भी संवेदनशील रहे। भारतीयता की अवधारणा को पुनर्नवा करने के लिए बेहद जरूरी है कि हम सब याद रखें कि लोकतंत्र केवल संख्याओं के बूते नहीं, संस्थाओं और मर्यादाओं के बल पर चलता है। विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता का घटना, उनकी  मर्यादाओं का ध्वस्त होना अंतत: उन्हीं के लिए घातक है जो कमजोर हैं।

 

 

 

 

चेंग चुई…..मेरी यह कहानी प्रगतिशील वसुधा-91 में प्रकाशित…

चेंग-चुई.

-पुरुषोत्तम अग्रवाल।

 

‘यह मकबरा सा क्यों बना दिया है भई’

‘सर, इसे मकबरा मत कहिए’ सागरकन्या ने प्रवीण की कम-अक्ली पर तरस खाते हुए कहा, ‘यह चेंग-चुई आर्किटेक्चर है…’

चेंग-चुई?

प्रवीणजी बहुत बड़े अफसर बनने  के बाद एलाट हुआ बंगला देखने आए थे। देश के बड़े सेवकों का जैसा होना चाहिए वैसा ही बंगला था। विशाल, भव्य, गरिमापूर्ण। लेकिन प्रवीण अकेले आदमी, जोरू ना जाता, अल्लाह मियाँ से नाता टाइप। इतने बड़े घर का करेंगे क्या? मकबरे सरीखे डोम पर निगाह पड़ते ही उनकी दुष्ट कल्पना सक्रिय हो गयी थी। सोचने लगे कभी कभी, आधी रात में सारे घर की बत्तियां बंद कर, सफेद कुर्ता पाजामा धारण कर, हाथ में मोमबत्ती लेकर गृह-भ्रमण किया करेंगे। ‘ गुमनाम है कोई, बदनाम है कोई’ या ‘नैना बरसें रिमझिम, रिमझिम’ जैसे किसी धाँसू घोस्ट-सांग की सीडी सही बैकग्राउंड स्कोर देगी। मरने के बाद का हाल तो कोई कह नहीं सकता। सारे ज्ञान और सारी सर्जनात्मक, खुराफाती क्षमता के बावजूद अपन भी नहीं कह सकते-यह बुनियादी सचाई प्रवीणजी भी जानते ही थे। सोच यह रहे थे कि जीते जी भूत बनने में कितना मजा आएगा। उच्च कोटि के इंटेलेक्चुअल के मजे और मूर्खों के मजे में कुछ फर्क भी तो होगा। सबसे बड़ी बात तो यही कि अपने  इस मजे में डिफरेंस का भी ऐसा स्टेटमेंट होगा कि मार्क्स के प्रेतों का बखान करने वाले ज्याक देरिदा भी अपने प्रेतावतार में प्रसन्न हो जाएंगे। ‘देखो न यार’, प्रवीण ने अपने आप से कहा, ‘फिल्मों में सफेद कपड़े पहना कर, नीम अंधेरी रातों में गाना गाने का काम महिलाओं से ही कराया जाता है, अपनी रची इस घोस्ट स्टोरी में अपन इस सेक्सिस्ट स्टीरियो-टाइप को भी तोड़ेंगे और सदा के लिए न सही, कभी कभार तो आधी रातों में अपने प्रेत बनने का नजारा भी आप ही देखेंगे, बतर्ज ‘आप ही डंडी, आप तराजू, आप ही बैठा तोलता…’।

प्रवीणजी के अफसर ने प्रवीणजी के सिनिकल पोयट-फिलासफर को धकियाया, और बंगले को ठीक से देखना शुरु किया। यहाँ रह कर देश की सेवा करने में मजा तो आएगा। दोमंजिला बंगला। नीचे तीन, ऊपर दो बेडरूम। टायलेट-बाथ अटैच्ड । ऊपर की मंजिल पर, कोने का एक कमरा बिना अटैचमेंट के भी। यह रहने वाले की इच्छा पर कि इसे स्टोर मान ले या पूजा अथवा प्रेयर रूम। सागरकन्या फरमा रही थीं, ‘इंटरनेशनल ट्रेंड है न सर दीज डेज, आपने तो देखा ही होगा, आजकल एयरपोर्ट्स पर भी प्रेयर-रूम होते हैं। वैसे आप चाहें तो इस कमरे को स्टोर-कम-प्रेयर रूम के तौर पर भी यूज  कर सकते हैं, ज्यादातर एलाटी करते ही हैं’।

‘याने भगवान की औकात वही मानते हैं, जो घर के फालतू या इफरात सामान की’, प्रवीणजी सोचने लगे, ‘ उनकी माँ को अगर सुझाव दिया जाए कि उनके लड्ड़ू गोपाल के लिए घर की बुखारी का एक कोना मुकर्रर किया गया है तो सुझाव देने वाले की कितनी पीढ़ियों को, चुनिंदा सुभाषितों के जरिए वैतरणी तार देने में माताराम को कितना समय लगेगा’। वह जानते थे कि पूजा-घर में टायलेट ना बनाने के डिजाइन से तो माताराम भी सहमत ही होंगी, लेकिन उनके अपने  मन में यह जरूर आया कि एलाटी और उसके परिवार के बेडरूम्स में तो टायलेट्स हैं लेकिन भगवान के लिए?

यह अतिप्रश्न था। व्यावहारिक और पारमार्थिक दोनों ही धरातलों पर। भगवान के बारे में ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते। भगवान वैसे भी सवालों के जबाव देने के फेर में पड़ते नहीं। पड़ने लगें तो नाक में दम हो जाए। उनकी तरफ से उत्तर  देने का काम हो, या उनके नाम पर आहत भावनाओं की जंग छेड़ने का, करना भक्तों को ही पड़ता है। ऐसे में भगवान के भक्तों के रोष की परवाह किये बिना कोई पूछ भी ले टायलेट विषयक अतिप्रश्न तो भगवान का उनके जैसा ही खुराफाती कोई भक्त यह प्रति-प्रश्न भी तो कर सकता है ना कि सारी दुनिया और क्या है बे?

और, फिर भगवान तो दो जहाँ के मालिक हैं। ऐसे सवाल तो इस दुनिया के भी छोटे-बड़े मालिकों के बारे में भी नहीं पूछे जाते। मालिकों के टायलेट से जुड़ा सवाल मिलियन डालर क्वेशचन की कोटि में आता हो न आता हो, अपने ही देश के प्रसंग में, इस सवाल का जबाव जरूर मिलियन रुपीज आंसर साबित हो सकता है…

एकाएक प्रवीणजी की यादों के स्क्रीन पर कालेज के दिनों की फतेहपुर सीकरी यात्रा की डाक्यूमेंट्री चलने लगी। खसखसी दाढ़ी वाले बुजुर्ग गाइड मियाँ शहंशाह अकबर की सुलहकुल नीति का नॉस्टेल्जिक लहजे में बयान  कर रहे थे। आजकल के दंगे फसाद के माहौल को अकबर के सुनहरी दौर के बरक्स रखते हुए ऐतिहासिक पछतावे से गुजर रहे थे, और कोशिश कर रहे थे कि पछतावे के कुछ छींटे इन नौजवानों के दामन पर भी नजर आएँ। नौजवान पछता रहे थे या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता। हाँ, सिक्स्थ सेंस से यह जरूर जान रहे थे कि उनकी  कन्या-मित्रों के मन में अपने अपने बायफ्रेंड्स के लल्लूपन की तुलना शहंशाह अकबर की शानदार पर्सनाल्टी के साथ जरूर चल रही है। सो, कुढ़ रहे थे, और कर ही क्या सकते थे।

उधर, बुजुर्गवार का बयान जारी था, ‘ देखिए हाजरीन, यह दीवाने आम याने  बादशाह सलामत का दरबार रूम, यह दीवाने खास, यहीं बादशाह दीनो मजहब, मंतिको फलसफा के आलिमों के साथ गहरे मसलों पर तवील गुफ्तगू किया करते थे….और यह इस तरफ उनकी ख्वाबगाह, मतलब बेडरूम, यहाँ वे आराम फरमाते थे…”

बाकी लोग आधी ऊब आधी दिलचस्पी के साथ बादशाह सलामत की दिनचर्या का  कंडक्टेड टुअर ले रहे थे। लेकिन समीर जो आगे चल कर बहुत अच्छा और बहुत उपेक्षित बल्कि कुछ उचकबुद्धुओं के शब्दों में दयनीय कवि बना, इस वक्त अपना निजी इंवेस्टिगेशन कर रहा था। ख्वाबगाह में इधर-उधर घूमा, बाहर तक ताक-झाँक कर आया। लौटा तो, संबोधित गाइड को किया, “सुनिए चचा” लेकिन फिर जिज्ञासा उनके सामने नहीं जैसे सारे इतिहास के सामने ठेठ पुरबिया लहजे में ऱखी, “बादशाह सलामत झाड़ा कहाँ फिरते थे जी?”

मुगलिया शान के कसीदों से ऊबते, जिसे सिस्क्थ सेंस से जान रहे थे, उस तुलनात्मक अध्ययन से जलते लड़के तो जितना जरूरी था, उससे भी ज्यादा जोर से हँसे ही, अकबर की पर्सनाल्टी से टू मच इंप्रेस होती लड़कियों के लिए भी इस सवाल पर हँसी रोकना मुश्किल हो गया। इन साधारण मर्त्य मानवों से अलग, प्रवीण और उनके जैसे ज्ञानी, अवसर के अनुकूल न होने पर भी, जिज्ञासा की मूल वैधता को स्वीकारते हुए उसके सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक निहितार्थों की पड़ताल में जुट गये।

गाइड बुजुर्ग तड़प उठे थे। मुगलिया सल्तनत का नॉस्टेल्जिया कहिए या मुश्तर्का कल्चर का, इस गुस्ताख सवाल पर उनकी भँवें ही नहीं टेढ़ी हुईं, खसखसी दाढ़ी भी गुस्से से काँपने लगी। बोले कुछ नहीं, एकाएक आदाब अर्ज करके चल दिए, पैसे भी लेने को राजी नहीं। किसी तरह प्रवीण ने ही बात सँभाली थी। गाढ़ी उर्दू और गाढ़ी हिन्दी को बोलचाल की जुबान के समर्थक कितना भी कोसें, इस गाढ़े वक्त साथ गाढ़ेपन ने ही दिया। मर्जी होने पर प्रवीण साध सकते थे दोनों तरह का गाढ़ापन। सो, उन्होंने काफी हाई फंडा उर्दू बोलकर ‘अहमकों के इस हुजूम में वाहिद बाशऊर शख्स’ होने का यकीन बड़े मियाँ को दिलाया, समीर की गुस्ताखी की माफी माँगी, और बुजुर्गवार को फीस देकर, उनकी दुआएं हासिल कर उन्हें विदा किया।

इस अनुभव की याद ने प्रवीण को रोका पूजारूम में अटैच्ड टायलेट-बाथरूम न होने के बारे में अतिप्रश्न करने से।

लेकिन ड्राइंग रूम के पीछे के इस विशाल हाल में, सपाट छत की जगह, मकबरे के गुंबद जैसा आकार देखकर रहा नहीं गया, पूछ बैठे, और ज्ञानान्वित हुए कि यह चेंग-चुई आर्किटेक्चर है। तिलमिलाए भी कि आज तक नाम नहीं सुना था, चेंग-चुई का। मामला चाहे मकान का हो, चाहे श्मशान का, प्रवीणजी को सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता में कहीं भी, किसी से भी पीछे रहना सुहाता नहीं था। विडंबना देखिए कि इस निहायत फैशनेबल (और इस कारण, प्रवीणजी के इंटेलेक्चुल संसार के अलिखित नियमों के अनुसार, अज्ञानी होने को अभिशप्त) बाला ने चेंग-चुई के बहाने प्रवीणजी को अज्ञानी सिद्ध कर ही दिया। ‘पढ़ना कम कर दिया है, साले, तुमने, लिखने और भषणियाने ज्यादा लगे हो’- प्रवीण जी ने खुद को खबरदार किया।

उधर सागरकन्या बड़े अफसर और प्रसिद्ध विद्वान के टू-इन-वन को इंप्रेस करने के अवसर का पूरा लाभ उठा रही थीं, ‘अभी अपने यहां किसी ने नाम तक नहीं सुना है, सर। लोग फेंग सुई तक ही रह गये हैं। मैं तो एक बार इनके साथ शिप पर आइवरी कोस्ट से गुजरी थी.. ही इज़ विद दि मर्चेंट नेवी, यू नो…. वहां चीनी डायस्पोरा की एक बस्ती थी उन्होंने अपनी क्लासिकल ट्रैडीशंस के साथ लोकल नालेज का हाइब्रिड करके फेंग सुई का जो रूप रिकंस्ट्रक्ट किया, उसे चेंग-चुई कहते हैं,’ सागर कन्या पोस्ट-मॉडर्न शब्दावली से गुजर कर असली चीज पर अब आईं, ‘चेंग-चुई का प्रिंसिपल है कि ऐसा डोम बनाने से पाजिटिव एनर्जी सारे घर में सर्कुलेट करती है, यहाँ जो वैक्यूम बनता है, वह सारी नेगेटिव एनर्जी को एब्जार्ब करके, प्यूरिफाई करके उसे पाजिटिव एनर्जी में बदल कर सारे स्ट्रक्चर में सर्कुलेट कर देता है, स्प्रिचुअल एनर्जी का रिसायकलिंग सिस्टम बन जाता है चेंग-चुई के हिसाब से डोम बनाने से…हमारी फर्म ने तो पेटेंट करा लिया है, चेंग-चुई का…अब इन दि एंटायर साउथ एशिया, बस हमारी ही फर्म चेंग-चुई प्रिंसिपल्स के इन एकार्डेंस मकान बनाती है, इसीलिए तो मिनिस्ट्री ने आप जैसे टॉप ऑफिशियल्स की इस कॉलोनी का कांट्रैक्ट हमें दिया है….बिटवीन मी ऐंड यू सर, जब मिनिस्टर साहब को मालूम पड़ा तो ही वाज लिटिल अपसेट कि… ऑनली फॉर ऑफिसर्स…अब आपकी दुआ से ऐंड विद दि ग्रेस ऑफ गॉड ऑलमाइटी, मिनिस्ट्रियल बंगलोज का काम भी हमीं को मिलने वाला है’।

‘लेकिन मेरे यहाँ आने के पहले दीवारों की  सीलन तो ठीक करवा देंगी ना आप, लीकिंग पाइप्स हैं शायद…’

‘ ओ, नो, सर, दिस इज आलसो चेंग-चुई, ताकि आप कभी भी अपरूटेड महसूस न करें, आपकी जडें ही नहीं आपका लेफ्ट-राइट भी बैक टू फ्रंट, सदा भीतर से नम बना रहे, आपकी पर्सनाल्टी और रिलेशनशिप्स में कभी रूखापन न आए…आप तो जानते ही हैं सर कि आजकल फैमिलीज के भीतर ह्यूमन रिलेशंस कितने रूखे और खोखले होते जा रहे हैं…हमने मकानों के चेंग-चुई डिजाइन के जरिए एन्स्य़ोर किया है कि रिश्ते  भीतर से नम रहें औऱ घर में पाजिटिव एनर्जी लगातार मूव करती रहे…बाई दि वे आप तो हिन्दी के राइटर भी हैं न सर?’

पहले मकबरे का सा गुंबद, अब यह सीलन, इसमें भी साला यह चेंग-चुई का आर्किटेक्चर…प्रवीण एक के बाद इन गुगलियों से हिल गये थे, हिन्दी के राइटर होने की याद दिलाए जाने से हकबका गये। इतना ही कह पाए, ‘हाँ, तो?’

‘मेरे हसबैंड एक्टिव इंटरेस्ट लेते हैं हिन्दी राइटिंग में, ही इज ए शॉर्ट स्टोरी राइटर एज वेल एज ए पोयट…’

प्रवीण को चेंग-चुई से बड़ा खतरा मंडराता दिखने लगा। अगला वाक्य यही होने वाला है कि जब आपको टाइम हो, हम लोग आते हैं, हसबैंड की पोयम्स सुन कर कुछ एडवाइज कीजिएगा। हिन्दी का लेखक या प्रोफेसर होने के यों तो कई कुपरिणाम हैं, लेकिन पिछले कई बरसों से जिससे प्रवीण सर्वाधिक आतंकित रहे आए थे, वह यही था- एक से बढ़ कर एक नमूनों की राइटिंग हाजत रफा कराने का माध्यम बनना…। एक से एक चुनिंदा बेवकूफों की रचनाशीलता का मूल्यांकन करना, उनकी महान रचनाओं पर राय देना। साहब लोगों की दुनिया में हिन्दी का लेखक चांदमारी का बोर्ड था। जिन्हें हिन्दी में अपनी क्रिएटिविटी फायर करने की लत लग जाए, उन्हें अपनी इलीट दुनिया में न पाठक मिलते थे, न श्रोता। इस दुनिया में प्रवेश करने के बाद प्रवीण को, भलमनसाहत कहिए या एटीकेट की विवशता, दर्जनों कुड हैव बीन नोबल लारेट्स एमेच्योर्स की फायरिंग झेलने का दुर्भाग्य भोगना पड़ा था,  अब उनका धीरज जबाव देने लगा था। एक भी पल गँवाए बिना, उन्होंने कवर-पोजीशन ले ली,‘ मैं किसी हिन्दी राइटर का लिखा कुछ नहीं पढ़ता’…बात को थोड़ा मजाक का टच देने के लिए आगे जोड़ा, ‘सिवा अपने…’

सागरकन्या को प्रवीण का कथन न तो मजाक लगा, न बुरा और न ही उसे कोई  ताज्जुब हुआ, ‘आई नो दैट सर, हसबैंड भी यही बताते हैं, मैंने भी फील किया, वो क्या है कि एक बार हमारे घर पर गैदरिंग हुई थी तो सारे के सारे राइटर्स बस फॉरेन या एट बेस्ट इंडियन इंगलिश ऑथर्स की ही बात  कर रहे थे, या अपनी खुद की राइटिंग्स की। सो आई नो… बट,  मैं तो कह यह रही थी कि उस गैदरिंग में भी, और वैसे भी मैंने नोट किया है कि कंटेंपरेरी हिन्दी राइटिंग, इन पर्टिकुलर फिक्शन में, नमी पर बड़ा एंफेसिस है। सम एक्सप्रेशंस इन दैट गैदरिंग वर रियली फेबुलस….लाइक…मेरी चेतना भीतर से नम हो गयी, जड़ों की नमी पत्तों तक आ गयी ऐंड आँखों में ही नहीं सारी देह में नमी छा गयी…यू नो…’

गुगली पर गुगली… प्रवीणजी को लगा, अब तो शॉट खेल ही लिया जाए, ‘तो आपके हिसाब से हिन्दी की कंटेपरेरी राइटिंग में भी आपका चेंग-चुई काम कर रहा है, आप मकान बना रही हैं, लेखक लोग कहानियाँ बना रहे हैं..दोनों चेंग-चुई के हिसाब से…राइट?’

‘ऐंड वाय नाट सर?’ सागरकन्या पर प्रवीणजी की चोट का कोई असर नहीं हुआ, ‘किसी चीज से इंप्रेस या इंफ्लुएंस होने के लिए उसे जानना कोई क्रिटिकली जरूरी थोड़े ही है। क्रिश्चियनटी विदाउट क्राइस्ट…यू नो…’

प्रवीणजी की हालत सेंचुरी बनाने के आदी, लेकिन जीरो पर आउट हो गये बैट्समैन की सी हो गयी। ग्लव्स उतारते, पैवेलियन की ओर वापस जाते बस इतना ही कह पाए, ‘सागरकन्या जी, आभारी हूँ आपका, कि चेंग-चुई की पाजिटिव एनर्जी से भरे इस मकबरे…आई मीन मकान में रहने जा रहा हूँ। सफेद कुर्ता-पाजामा और मोमबत्ती आपकी दुआ से मेरे सामान में है, गुमनाम है कोई की सीडी का जुगाड़ कर लूंगा, बस फिर अपने मकबरे…सॉरी अगेन..मकान… में अपना प्रेत-विचरण देखने का सौभाग्य प्राप्त करूंगा। बहुत शुक्रगुजार हूँ…क्या कमाल किया है इस मकान के डिजाइन में व्याप्त, और बाकी सारी चीजों में व्याप्त होती जा रही चेंग-चुई विद्या ने कि मकबरे में रहने के लिए दफ्न होना जरूरी नहीं रहा, और प्रेत बनने के लिए मरना…’।

‘वाट ए क्यूट एक्सप्रेशन, सर’ सागरकन्या के मुँह से हँसी की खनखनाहट बरसने लगी, ‘एनीवे, आप शिफ्ट तो कीजिए, आई एम एब्साल्यूटली श्योर, कभी छोड़ना नहीं चाहेंगे इस बंगलो को, मन ही नहीं करेगा कभी भी, देख लीजिएगा…यही तो है चेंग-चुई का कमाल…’  एकाएक उसने घड़ी देखी, ‘सॉरी सर, मुझे निकलना होगा, बाय सर, बट यू हैव ए वे विद वर्ड्स, मकबरे में रहने के लिए दफ्न होना जरूरी नहीं, प्रेत बनने के लिए मरना जरूरी नहीं, क्या बात है…’ हँसी फिर से खनखनाई…

खनखनाहट गूंजती रही- यही तो है चेंग-चुई का कमाल…गुमनाम है कोई…यही तो है चेंग-चुई का कमाल…गुमनाम है कोई…यही तो है चेंग चुई का कमाल…

 

 

उन दिनों जेएनयू…

 

यह लेख सुमन द्वारा संपादित पुस्तक ‘जेएनयू में नामवरसिंह’ ( राजकमल, 2009) में संकलित है…

उन दिनों जेएनयू…

 

-पुरुषोत्तम अग्रवाल.

 

1. सफेद हाथी.

 

 

1987 में जब नामवरजी साठ साल के हुए, ज्ञानरंजन ने पहल का अंक उन पर केंद्रित किया था। मुझे भी उस अंक में लिखने का  सौभाग्य मिला, मैंने लिखा, ‘वे सिर्फ पढ़ाते नहीं सिखाते हैं’। यही लेख सुधीश पचौरी ने ‘नामवर के विमर्श’( 1995) में पुनः प्रकाशित किया। फिर नामवरजी के पचहत्तर वर्ष पूरे करने पर,  2002 में  अमृत महोत्सव कार्यक्रम में  प्रभाषजी और केदारजी के आदेश पर भाषण दिया, जिसे ओम थानवी ने जनसत्ता में प्रकाशित किया। यह भाषण नामवरजी के व्यक्तित्व के बारे में नहीं, ‘दूसरी परंपरा की खोज ’  के बारे में था, कुल मिला कर आलोचनात्मक।  नामवरजी के व्यक्तित्व  के बारे में तो पूरे बाइस साल बाद ही लिख रहा हूं। आशा है कि जब वे एक सौ एक वर्ष के होंगे, तब भी उनके बारे में कुछ लिखने के लिये मैं उपलब्ध रहूंगा।

यह लेख  जेएनयू के नामवरजी के बारे में है। भारतीय भाषा केंद्र की विशेषताओं, कोर्सेज, अध्यापकों के बारे में नहीं, यह लेख जेएनयू के जेएनयूपन और नामवरजी के नामवरपन के बारे में है। ऐसे व्यक्ति का हलफनामा है यह लेख-जिसे अपने जेएनयूआइट होने पर आज तक बेधड़क अभिमान है,   जिसके बारे में कहा जाता है कि वह नामवरजी के निकट है, लेकिन खुद जिसे ऐसा कोई मुगालता नहीं।

नामवरजी सन चौहत्तर में जेएनयू आए;  भारतीय भाषा केंद्र को नामवरजी ने बनाया। सोचना यह चाहिए कि जेएनयू ने नामवरजी को, और अनेक अध्यापकों, छात्रों, कर्मचारियों को, नागरिकों को बनाने में कोई विशेष भूमिका निभाई या नहीं? यों तो जेएनयू भी एक और यूनिवर्सिटी ही थी और है, लेकिन क्या सचमुच जेएनयू के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता?  कुछ संस्थाएं किसी समाज में मानक का दर्जा क्या योंही हासिल कर लेती हैं?

शांतिनिकेतन, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बीएचयू, एएमयू, सागर,जामिया, जेएनयू ये सब क्या सिर्फ इमारतें हैं? या ये सपने हैं- जागती आँखों सपने देखने के आदी, ‘विचित्र’ लोगों द्वारा देखे गये सपने। ऐसे सपने जिन्हें देखना और जिनकी ताबीर करना जितना मुश्किल है, चौपट कर देना उतना ही आसान। जेएनयू ने इतने दिनों तक खुद को बचाए रखा, यह क्या  भावुक हो जाने लायक बात नहीं? खासकर इन दिनों जबकि जेएनयू गोया खुद ही अपनी निजी पहचान से पिंड छुड़ाकर भीड़ में शामिल होने को व्याकुल दिख रही है।

शांतिनिकेतन, आईआईएस,  बीएचयू, सागर, जामिया – ये सब सपने इतिहास के एक खास मोड़ पर  देखे गये सपने थे। राजनैतिक के साथ-साथ बौद्धिक और सांस्कृतिक स्वाधीनता भी हासिल करने की हौंस रखने वाले  समाज में कुछ शानदार शख्सियतों द्वारा देखे गये सपने। जेएनयू भी एक सपना था। ऐसे समय में देखा गया सपना जो अब ‘रेस्टलेस सिक्सटीज’ के नाम से इतिहास में दर्ज हो चुका है। साठ के उस दशक की वह विश्वव्यापी बेचैनी सत्तर के दशक तक भी सच ही लगती थी। यह प्रति संस्कृति (काउंटर कल्चर)  का दौर था। जेएनयू में जो बोहेमियनपन था, वह इस काउंटर-कल्चर ही की उपज था। काउंटर कल्चर  का ही एक पक्ष है- दूसरी परंपरा ( अदर ट्रैडीशन) की खोज। संयोग नहीं कि इस नाम की पुस्तक ‘जेएनयू के नामवरजी’ ने ही लिखी। इस पुस्तक में भी, और उन दिनों के जेएनयू में भी, वर्चस्व की संस्कृति का केवल विरोध नहीं था, विकल्प खोजने और रचने की छटपटाहट भी थी। इस अर्थ मे नामवरजी की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ भी खाँटी जेएनयूआइट है।

बहरहाल, प्रतिवाद, प्रतिरोध और विकल्प-रचना की इस विश्वव्यापी संस्कृति के  प्रति अलग-अलग लोगों के अलग-अलग रवैये थे। विश्व-व्यवस्था का अपना तरीका था, विश्वव्यापी  बेचैनी से निपटने का। जैसाकि नामवरजी ने ही एक बार क्लास में कहा था, ‘पूंजीवाद में क्रांति भी बिकती है। चे ग्वेवरा की तस्वीरों वाली कमीजों  से लेकर उनकी डायरियां  तक अमेरिकी बाजार में बहुत लोकप्रिय हैं’। लेकिन इसी व्यवस्था में गुंजाइश निकलती है प्रतिरोध की। प्रतिरोध के लिये पहले चाहिए बोध। संसद में जेएनयू का प्रस्ताव पेश करते समय सरकार के मन में जो भी रहा हो, जी. पार्थसारथि और मूनिस रज़ा जैसे लोगों ने जेएनयू का सपना एक ऐसी यूनिवर्सिटी के रूप में ही देखा जहां बीसवीं सदी के सातवें-आठवें दशक में व्याप्त बेचैनी को  व्यवस्था और विरासत दोनों  के बेहतर बोध में बदला जा सके।

जिन विशेषताओं ने जेएनयू को जेएनयू बनाया, वे आकाश से नहीं टपक पड़ी थीं। बल्कि शायद कल्पना के आकाश में तो वे थीं, उन्हें अरावली की पहाड़ियों पर उतार लाना बड़ा काम था। मुझे तो मूनिस रजा से ठीक से बात करने का भी मौका कभी नहीं मिला, लेकिन उनके विट के कि़स्से कई सुने हैं। ऐसा ही एक कि़स्सा यह है कि शुरुआती दिनों में प्रोफेसरों की किसी गप-गोष्टी में मूनिस साहब नया कैंपस विकसित करने की समस्याओं पर बात कर रहे थे। बोले, ‘भई सब कुछ सिरे से ही शुरु करना होगा। अभी तो आलम यह है कि पहाड़ियों पर उल्लू बोलते हैं’। किन्हीं  प्रोफेसर साहब ने जुमला जड़ा, ‘अच्छा है, अभी तो बस बोलते हैं, कुछ दिनों बाद पढ़ाएंगे’।

“लेकिन आपको तो हम एपॉइंट ही नहीं कर रहे, पढ़ाएंगे कैसे?”- मूनिस साहब की तरफ से नहले पर दहला आया।

आत्म-साक्षात्कार का वह पल उन प्रोफेसर साहब पर कैसा गुजरा होगा, यह कल्पना  आप कर लीजिए।

 

अभी पिछले ही दिनों एक मित्र ने कहा कि जेएनयू में मुझे अब तक परायापन लगता है। जिस यूनिवर्सिटी में मैंने एम. ए. किया, वहां बिल्कुल अपने गाँव जैसा लगता था।

बात ठीक ही है। हां, उनके हिसाब से जो कमजोरी है, मुझे वही जेएनयू की सबसे बड़ी ताकत लगती है।  अंग्रेजी में यूनिवर्सिटी और हिन्दी में विश्वविद्यालय जिस जगह का नाम हो, वहां पहुंच कर भी आपको लगे कि आप अपने गांव या मोहल्ले से बाहर निकल ही नहीं पाए, तो यह चिंता की बात है। आपके लिये भी। यूनिवर्सिटी के लिये भी। जेएनयू का नयापन शुरु में जरूर अटपटा लगता था, कुछ लोगों को शायद ‘पराया’ भी लगता हो, लेकिन जेएनयू की खूबी यह थी कि यह किसी को पराया नहीं  समझती थी। शैक्षणिक संस्थाओं मे नये छात्रों से परिचय करने के लिये ‘रैगिंग’ की विधि से हम सब वाकिफ हैं। अब तो यह बाकायदा अपराध की श्रेणी में है। लेकिन जेएनयू में नये छात्रों के ‘पराएपन’ और अपरिचय को दूर करने के लिये रैगिंग कभी मान्य विधि नहीं रही। नये छात्र जेएनयू में आतंकग्रस्त तुच्छ जनों जैसा नहीं, शब्दशः ‘वीआईपी’ जैसा महसूस करते थे। किसी हद तक अभी भी करते हैं। इस बात का क्या महत्व है, यह मेरे जैसे छोटे शहरों से आए विद्यार्थी भली-भाँति समझते हैं। इस बात का क्या मानवीय मोल है, यह उन लड़के-लड़कियों के मां-बाप से पूछिए जिन्होंने रैगिंग के आतंक और यातना के दबाव में आत्महत्याएं की हैं।

जेएनयू का ‘अपराध’ यह  अवश्य था कि यह अपने गांव की याद दिलाती नहीं, आत्मसजग रूप से ‘कॉस्मोपॉलिटन’ होने का प्रयत्न करती संस्था थी, अपने सदस्यों को भी वैसा ही बनाने का प्रयत्न करती संस्था थी। केवल अंग्रेजी को खुले मन का अकेला प्रतीक उन दिनों के जेएनयू में कभी नहीं माना गया, अंग्रेजियत की बातें करने वाले कितनी भी  करते रहें। हां, यह सही है कि अंग्रेजी के खिलाफ जिहाद को ही लोकतांत्रिक होने का पर्याप्त प्रमाण भी नहीं माना जाता था। लोकतांत्रिक मिजाज इसमें झलकता था कि  जो अंग्रेजी नहीं जानते थे, उनके नाम जेएनयू में नोटिस बोर्ड पर नहीं लगा दिये जाते थे, जैसे कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में आजकल लगा दिये जाते हैं। अंग्रेजी की हो, या किसी और तरह की, असुविधाएं दूर करने का प्रयत्न लोगों के आत्म-सम्मान की चिंता करते हुए ही किया जाता था। कॉस्मोपॉलिटन होने की परख फैंसी अंग्रेजी बोलने  के आधार पर नहीं, कुछ अन्य आधारों पर हुआ  करती थी- इस बात का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण तो वह सम्मान ही है, जो नामवरजी को जेएनयू समु्दाय के हर हिस्से से प्राप्त था और है।

बढ़िया अंग्रेजी न जानने के कारण, कम से कम उन दिनों के जेएनयू में अहसासे कमतरी की संभावना न के बराबर थी, कोई गांव से ही ग्रंथियों की गठरी लेकर चला आया हो, तो बात अलग है। मुझे खुद अपने अंग्रेजी ‘ज्ञान’ के तो कई चुटकुले आज तक याद हैं, लेकिन उनके कारण कभी मेरी खिंचाई की गयी हो, ऐसा कोई प्रसंग याद नहीं, बल्कि हर लड़की दोस्त को ‘गर्लफ्रेंड’ नहीं कहा जाता, यह मुझे बड़े प्यार से मेरे अंग्रेजीदाँ दोस्तों ने ही बताया था। हाँ, जब मैं अच्छी खासी अंग्रेजी बोलने-लिखने लगा था, अध्यापक हो चुका था, तब जरूर छात्रों के एक कार्यक्रम में मेरे अंग्रेजी ज्ञान और लहजे  की खिल्ली, मेरे सामने ही  उड़ाई गयी थी। मेरे छात्र रामचंद्र की व्याख्या के अनुसार, यह शब्द और कर्म दोनों में मेरे बहुत मुखर रूप से  दलित समर्थक होने का ‘दंड’ था।  खैर, यह दंड देने वाले  वे छात्र निश्चय ही ‘क्वींस इंग्लिश’ बोलते रहे होंगे, वह भी ठेठ ‘ऑक्सोनियन’ लहजे में। वे नहीं, तो उनके संरक्षक अध्यापक तो बोलते ही रहे होंगे- ‘नॉन’ को ‘नन’ और ‘बॉडी’ को ‘बडी’ में बदलते हुए।

यह घटना नामवरजी के रिटायरमेंट के बाद की है। 1993 की।

नामवरजी के संबंध अपने सभी अध्यापक साथियों के साथ अच्छे ही नहीं थे। सभी का दिल से  सम्मान भी वे नहीं करते थे। लेकिन मजाल है कि औपचारिक कार्यक्रम तो दूर की बात, अनौपचारिक रूप से भी कोई नामवरजी के सामने किसी अध्यापक साथी की शान में गुस्ताखी कर सके। यही बात उस वक्त के कई वरिष्ठ प्रोफेसरों के बारे में कही जा सकती है। अपनी उपस्थति मात्र से नामवरजी और उन दिनों के जेएनयू के अन्य प्रोफेसर ‘सिर्फ पढ़ाते नहीं सिखाते’ थे, सिखाते हैं। मुझे याद है, प्रो0 शेषाद्रि डीन ऑफ स्टूडेंट्स वेल्फेयर होते थे। एक बार छात्र नेता के धर्म का निर्वाह करते हुए मैंने उनसे कुछ बातें ऊंची आवाज में कह दी थीं। शाम को ही नामवरजी ने तलब कर लिया। इतने सख्त ढंग से वे आम तौर से बोलते नहीं, जितने से उस दिन बोले। हालाँकि जब मैंने अपना पक्ष रखा तो थोड़े शांत हुए। बहरहाल, महत्वपूर्ण तो वह गुरुमंत्र था, जो अंततः प्राप्त हुआ-“ पुरुषोत्तमजी, विनम्रता और दृढ़ता में कोई विरोध नहीं हुआ करता, यह याद रखिये”।

बात चल रही थी, अंग्रेजियत की। अंग्रेजी माध्यम थी जेएनयू में अध्यापन-अध्ययन, राजनैतिक-सांस्कृतिक जीवन की। धीरे-धीरे जब जेएनयू की ही प्रवेश-नीति के कारण हिन्दी पृष्ठभूमि के छात्रों की संख्या बढ़ती गयी, तो स्थिति भी बदलती गयी। लेकिन, किसी को आँकने का, किसी की खिल्ली उड़ाने का जरिया बनने का सौभाग्य अंग्रेजी ज़बान को नामवरजी की पीढ़ी के रिटायरमेंट और जेएनयू के धीरे-धीरे रूपांतरण के बाद ही मिला। उन दिनों तो कामरेड पशुपतिनाथ सिंह अपनी अत्यंत ‘लोकतांत्रिक’ अंग्रेजी के साथ ही ए.आई.एस.एफ के सम्मानित नेता हुआ करते थे। स्पोर्ट्स ऑफिसर टोकस साहब की अंग्रेजी तो किसी भी अंग्रेज को हत्या या आत्महत्या पर उतारू कर  देने के लिये काफी थी- “प्ले, डू नॉट प्ले। वाट माई फादर्स गोज़, वाटएवर गोज़, यौर फादर्स गोज़। यू नो, यौर वर्क नोज़”।

उन दिनों के माहौल को समझे बिना ही कुछ लोग जेएनयू की ‘अंग्रेजियत’ के विरुद्ध जिहाद मुद्रा में रहते थे । ऐसे ही एक सज्जन हम लोगों के किसी जूनियर बैच में पटने से पधारे थे। बात-बात में अंग्रेजी और जेएनयू की अंग्रेजियत को कोसते ये महानुभाव नामवरजी की ही तरह धोती-कुर्ता पहनते थे। इस आधार पर  वे स्वयं को नामवरसिंह द्वितीय मनवाने के फेर में भी रहते थे। हालाँकि हमारे लिये वे ‘जायका’ ही थे।  हम लोग अपने सीनियर पंडित घनश्याम मिश्र का धोती-कुर्ता मंडित और चौधरी रामवीरसिंह तथा मौलाना अनीस का अचकन-चूड़ीदार सज्जित व्यक्तित्व देखे हुए थे। इसलिये इन सज्जन द्वारा बजरिए पोशाक दिये जा रहे सांस्कृतिक वक्तव्य की मौलिकता  पर हमारा कोई ध्यान नहीं था। गोरख पांडे,  आनंद कुशवाहा, शन्ने मियाँ  और रमाशंकर विद्रोही पर ध्यान था तब के जेएनयू का, तो उनकी पोशाक के कारण नहीं, शख्सियत के कारण था।  ध्यान देने या न देने का यह चुनाव ही जेएनयू की ओर से वक्तव्य था। वैसा ही जैसा अष्टावक्र ने जनक की राजसभा में दिया था- ‘हम कपड़े से या चमड़े से नहीं, सामर्थ्य से परखते हैं, इंसान को’।

नामवरजी को भी जेएनयू ने उनके धोती-कुर्ता से नहीं, सामर्थ्य से ही परखा था। नियुक्ति की नहीं, मैं बात परख की कर रहा हूं। नियुक्तियां तो और भी हुईं, और कुछ ‘जायकों’  की भी हुईं। बात नियुक्ति की नहीं, जो सम्मान नामवरसिंह, रोमिला थापर, विपिन चंद्र, योगेन्द्रसिंह आदि को मिला- उसकी है।

लेकिन बड़े-बड़े विद्वान तो और विश्वविद्यालयों में भी  रहे हैं, अभी भी हैं। इसमें ऐसी बड़ी बात क्या है?

जेएनयू  केवल शीर्षस्थ विद्वानों को नियुक्त करके ही तो निश्चय ही जेएनयू नहीं बन गयी। जेएनयू जेएनयू बनी क्योंकि नामवरजी जैसे लोग सचेत भाव से जेएनयू वाले बने, जेएनयू को बनाने वाले बने।

जिन दिनों जेएनयू बन रही थी,  उन दिनों की जेएनयू की सबसे बड़ी तारीफ उस हिकारत में ही छिपी थी, जिसके साथ जेएनयू को ‘सफेद हाथी’ या ( दीन-दुनिया से बेखबर) ‘टापू’कहा जाता था।  जेएनयू को सफेद हाथी कहने वाले नहीं जानते थे कि भारतीय परंपरा में सफेद हाथी एक ही माना गया है- ऐरावत। करोड़ों काले हाथियों के बरक्स एक अकेला सफेद हाथी-ऐरावत।

जेएनयू सचमुच सफेद हाथी था। पचीसों नयी-पुरानी, महान-सामान्य यूनिवर्सिटीज के बीच एक अकेला, अनोखा जेएनयू।

कहने वाले नहीं जानते थे कि व्यंग्य करके भी वे जेएनयू का महात्म्य-वर्णन ही कर रहे हैं। वे बेचारे तो यूरोप के अवज्ञापूर्ण मुहावरे का देशी अनुवाद भर कर रहे थे। ऐरावत को जानते होते या उन हाथियों  के रंग के बारे में सुना होता जो सिद्धार्थ को गर्भ में धारण किए जननी के सपनों में दिखते थे, तो शायद कोई और शब्द गढ़ते। लेकिन उससे भी क्या फर्क पड़ना था। किसी की निंदा को विश्वसनीय बनाने के लिए भी तो उसकी विलक्षणता पर ध्यान देना ही पड़ता है। सो, कहने वाले जो भी कहते, इतना तो जरूर ही कहते कि जेएनयू विलक्षण था। ‘वाइट एलीफैंट’ कह लो, ‘आइलैंड’ कह लो, बता तो यही रहे हो कि ‘है बात कुछ ऐसी…’

क्या थी वह बात?

और क्या था नामवरजी का, उनकी पीढ़ी का योगदान उस बात में?

 

2. व्हाट इज़ टु बी डन?

 

क्यों लिखना पड़ा पिछला वाक्य भूतकाल में? क्यों दर्द सा होता है, इस वाक्य को ‘है’ की बजाय ‘थी’ के साथ खत्म करने में? आज जेएनयू उस बात के कितना करीब है और कितना दूर? और जो भी है, हुआ करे, जेएनयू के बाहर के लोगों को क्या फर्क पड़ना चाहिए? जेएनयू वाले रोते रहें सुनहरे दिनों को, घूमते रहें अपने ‘नास्टेल्जिया’ में- बाकी लोगों को क्या?

हमारे एक मित्र थे, नहीं मित्र नहीं, बस परिचित। यार लोग उन्हें सर्जनात्मक दुष्ट भाव से ‘धारा तीन सौ सतत्तर’ कहा करते थे। कसम से ,मैंने कभी नहीं कहा। मैं तो उन दिनों भी धारा तीन सौ सत्ततर को समाप्त करने का, समलैंगिकों-विषमलैंगिकों-उभयलैंगिकों सबों  के समानाधिकारों का समर्थक था, आज भी हूँ। खैर, ये जो ‘तीन सौ सत्ततर’ के नाम से विख्यात सज्जन थे, ये थे तो जेएनयू में ही, लेकिन इन्हें अपना पुराना विश्वविद्यालय ही सर्वोत्तम लगता था। कहते थे,‘ जेएनयू में ऐसे क्या लाल लटके हैं? लोग बेमतलब में सेंटी होते रहते हैं –जेएनयू, जेएनयू’।

प्रसंगवश, इन सज्जन को धारा तीन सौ सत्ततर का अभिधान देने में ही नहीं, भाषिक सर्जनात्मकता अन्य रूपों में भी अभिव्यक्ति पाती थी। ऊपर जिनका जिक्र आ चुका है, उन कामरेड पशुपति को एक अन्य कामरेड अश्विनी गौड़ यत्नसाधित उच्चारण दोष के साथ,‘पशुपक्षी ’कहा करते थे।

चुनाव के दौरान नारे गढ़ने के लिये ऐसी सर्जनात्मकता बहुत आवश्यक थी। इस मामले में सब पर भारी पड़ते थे- एसएफआई के दादा अबरोल। एसएफआई की ओर से अध्यक्ष पद के लिये खड़े होने वाले उम्मीदवारों के नामों पर नारे गढ़ने में वे उस्तादों के उस्ताद थे। ‘बड़ी लड़ाई, ऊंचा काम-सीताराम सीताराम’; ‘तोड़ेगा सब बाधा बंधन-डी रघुनंदन डी रघुनंदन’ जैसे अमर नारे दादा अबरोल ने ही गढ़े थे। लेकिन सबसे जोरदार चुनौती दादा अबरोल की प्रतिभा के सामने तब आई, जब एसएफआई ने रमेश दधीच को उम्मीदवार बना दिया। आप ही बताइये, ‘दधीच’ को सुर में लाने वाला नारा क्या हो सकता है? लेकिन दादा तो दादा थे- नारा गढ़ा- ‘हमारे बीच, तुम्हारे बीच-रमेश दधीच, रमेश दधीच’।

दादा अबरोल की नारा-प्रतिभा जितनी असंदिग्ध थी, राजनैतिक और बौद्धिक समझ कुछ लोगों के हिसाब से  उतनी ही संदिग्ध। ऐसे संदेहवादी दादा के अपने संगठन एसएफआई में भी कम न थे। इनमें से ही एक थे, स्व0 दिलीप उपाध्याय। दादा की समझ के प्रति अपने तथा बहुत से अन्य लोगों के संदेह को दिलीप उपाध्याय ने दादा की नारा-प्रतिभा को टक्कर देते हुए एक नारे में ही ढाला-‘लाइन लंबी फंडे गोल-दादा अबरोल, दादा अबरोल’।

खैर, यह तो विषयांतर हो गया, प्रकृत प्रसंग यह कि धारा तीन सौ सत्ततर के नाम से मशहूर साहब आज  बहुत याद आ रहे हैं। जहाँ भी हों, सुखी हों, और सोचें कि खुद उनमें कुछ लाल लटकाने में जेएनयू को कामयाबी मिली या नहीं। मैं तो पिछले कई बरसों से यह सोचता रहा हूँ कि क्या दिया जेएनयू ने हमारी पीढ़ी को- क्या थी वह बात जो आज भी नाज करने को प्रेरित करती है? क्या था नामवरजी का खुद का, और उनके जैसे दूसरे अध्यापकों का, और विद्यार्थियों का, कर्मचारियों का  योगदान जेएनयू को ऐसा बनाने में कि उसकी महिमा याद करते भावुक होने में संकोच नहीं होता।

यों तो इस प्रसंग में जेएनयू का इतिहास भी लिखा जा सकता है, और समाजशास्त्र भी। लेकिन फिलहाल  कुछ मजेदार घटनाएं याद करके ही  इस सवाल का जवाब तलाश करें । कोई ‘आउटसाइडर’ कमल कांप्लेक्स पर कुछ बदमाशी करता पकड़ा गया। मेरे जैसे नये-नये आए लोगों को अपने संस्कारों से ही पता था कि ‘स्टूडेंट कम्युनिटी’ ऐसे तत्वों का उपचार किस विधि से करती है। वह सर्वमान्य विधि न भी अपनाई जाए तो इस बदमाश को पुलिस के हवाले तो तुरंत किया ही जाना चाहिए।  लेकिन अद्भुत था यह ‘टापू’, यह ‘सफेद हाथी’। हम नवागतों  के अज्ञान पर काबू करने के लिए सभी संगठनों के कोई न कोई प्रतिनिधि एकाएक प्रकट हो गये। वहीं अनौपचारिक ‘ऑल ऑर्गनाइजेशन मीटिंग’, बल्कि छोटी सी जीबीएम ( छात्र संघ की साधारण सभा) शुरु हो गयी। विमर्श का विषय वही था जिससे कॉमरेड लेनिन ने अपनी उस पुस्तक का शीर्षक लिया है- क्या करें? वाट इज़ टु बी डन? पिटाई का तो खैर सवाल ही नहीं। हिंसा अपने आप में तो क्रांतिकारियों के बीच क्या विवादास्पद  होती , लेकिन एक वामपंथी, क्रांतिकारी समुदाय गंभीर राजनैतिक उद्देश्य के लिए की जाने वाली उचित हिंसा और भीड़ की तुच्छ हिंसा में फर्क करेगा या नहीं? खासकर तब जबकि इस सर्वहारा ( जी, हाँ, इस तथा ऐसे अन्य शब्दों का व्यवहार उन दिनों  के जेएनयू के दैनंदिन जीवन में वाकई होता था!) के अपराध का मूल कारण तो यह  व्यवस्था ही है। उसी बूर्ज्वा/ सेमी बूर्ज्वा, सेमी लैंडलॉर्ड/ कंप्रोडोर बूर्ज्वा  व्यवस्था की दमनकारी बाहु (‘रिप्रेसिव आर्म’) –दिल्ली पुलिस  को कैपस में आने का न्यौता देना क्या व्यवस्था को वैधता देना नहीं होगा?

उस ‘अपराधी’ के चेहरे का भौंचक्कापन मैं कभी भूल नहीं सकता। उसने सपने के सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी साधारण बदमाशी ऐसी गंभीर बहस को जन्म दे देगी। वह तो मन ही मन शायद मना रहा होगा कि यार! जो थप्पड़-लप्पड़ जमाने हैं, जमा कर या पुलिस के हवाले कर मेरा पिंड छोड़ो। उसे नहीं पता था कि वह हर बात को व्यापक सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य में रखने की जेएनयू संस्कृति की गिरफ्त में आ चुका है। इसी सांस्कृतिक आदत के चलते, एक बार जब हैल्थ सेंटर खुलने में आधे घंटे से भी अधिक की देर हो गयी, तो इन दिनों पेरिस में निवास कर रहे और उन दिनों जेएनयू में त्रात्स्कीपंथी सिद्धांतकार  कुं0 विजयसिंह इस निष्कर्ष पर पहुँच गये थे कि भारत में शासक वर्गों का आंतरिक संकट असाध्य दशा तक पहुँच गया है। हैल्थ सेंटर तक जो व्यव्स्था वक्त पर नहीं खोल सकती, वह कितने दिन चलेगी? इलाज न मिलने पर भी, वे इस शुभ संवाद से बहुत देर तक प्रसन्न रहे।

लेकिन जेएनयू कल्चर का अर्थ सिर्फ ऐसी रोचक घटनाओं में ही नहीं, इन बातों में भी खुलता था कि इसी  के चलते जेएनयू में छात्र-संघ के चुनाव मेस में खाने की विविधता जैसे ‘ठोस और वास्तविक’ मुद्दों पर नहीं, बल्कि इस तरह के ‘हवाई मुद्दों’ पर लड़े जाते थे कि भारतीय समाज और विश्वव्यवस्था के बारे में मार्क्स का विश्लेषण अधिक प्रामाणिक है या गाँधी की अंतर्दृष्टियां अधिक सार्थक हैं-और इन दोनों का ही कौन सा ‘पाठ’ अधिक स्वीकार्य है। एक चुनाव में तो स्टालिन बनाम त्रात्सकी ही मुद्दा बना और  डीपी त्रिपाठी और जयरस बानाजी की बौद्धिकता और वाग्मिता  के जौहर के कारण यह चुनाव न भूतो न भविष्यति किस्म का हो गया था।  महिलाओं का सम्मान करने के लिए उस सफेद हाथी को किसी औपचारिक तंत्र की जरूरत नहीं पड़ती थी- अन्य जगहों से आने वाले ‘मर्दानगी’ संपन्न महानुभावों को मर्दानगी दिखाने के तौर तरीकों की बजाय औरतों के साथ तमीज से पेश होने का पाठ यूनिवर्सिटी की फिजा ही सिखा देती थी।

तीखे राजनैतिक विवाद, चतुर रणनीतियां यह सब था, उन दिनों जेएनयू में, लेकिन इस सबके अंतस में थी एक सरस्वती जिसे जेएनयू कल्चर कहा जाता था। किसी के व्यक्तिगत  जीवन पर चटखारे लेना जहाँ परले दर्जे की अशिष्टता मानी जाती थी।  कितने भी गंभीर मतभेद के प्रसंग में शारीरिक समीक्षा की जहाँ  कोई गुंजाइश नहीं थी। एसएफआई को सबसे तगड़ा झटका तभी लगा था जब दो-चार उत्साही कॉमरेडों ने बेदी-दुर्रानी की मशहूर फ्री-थिंकर जोड़ी के साथ मार-पीट कर दी थी।

उन दिनों जेएनयू बतौर एक समुदाय के, जो घोषित करता था,उसे जीने की भी कोशिश करता था। भले ही कितनी भी असंभव या हवाई या हमारे उन परिचित के हिसाब से ‘हास्यास्पद’ और ‘सेंटी’ क्यों न हो ऐसी कोशिश। कथनी-करनी के अवश्यंभावी भेद को जितना हो सके, मिटाने की कोशिश करने वाले समुदाय के किसी सदस्य का अभिमान क्या सचमुच खोखला ही है?

न यह अभिमान खोखला है, न वह जेएनयू संस्कृति हवा में से टपक पड़ी थी। उसे रचा गया था, सचेत भाव से। उसका विस्तार किया जाता था, औपचारिक-अनौपचारिक दोनों ढंगों से। निश्चय ही ‘शासक वर्गों’ ने ही यह स्पेस दिया था कि ऐसा विश्वविद्यालय संभव हो, लेकिन इस स्पेस का उपयोग अरावली की पहाड़ियों पर जेएनयू रचने में जिन्होंने किया, समस्या उनके प्रति भावुक होने में नहीं, बल्कि उनका ऋण भूल जाने में है।

इस संस्कृति ने नामवरजी को बनाया। हम सब लोगों को बनाया। और हमने, हमसे पहले और पीछे वालों ने इसे बनाया। कोई बात तो थी कि छात्रसंघ के चुनावों में हिंसा तो क्या गाली-गलौज तक अकल्पनीय थी। कोई बात तो थी कि छपे हुए पोस्टर लगाना, ज्यादा  पैसे खर्च करना चुनाव में हार जाने का अचूक नुस्खा माना जाता था। कोई बात तो थी कि बिना किसी आरक्षण की धूमधाम के जेएनयू में अद्भुत ‘डाइवर्सिटी’ थी। जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति हर प्रकार की डाइवर्सिटी।

पं0 हजारीप्रसाद द्विवेदी ने याद किया है, एक बार उन्हें सुनना पड़ा था, ‘यूनिवर्सिटी गरीबों के लिए नहीं है, जाओ जाकर ईंटा ढोवो’। जेएनयू में कमजोर आर्थिक या सामाजिक पृष्ठभूमि वालों को दाखिले में तरजीह दी जाती थी। एडमीशन इंडेक्स में ऐसी पृष्ठभूमि वालों को, लड़कियों को, और अंग्रेजी स्कूलों में जो नहीं जा सके, ऐसे लोगों को अतिरिक्त नंबर मिला करते थे।

इसीलिए कहा कि उन दिनों जेएनयू एक सपना था। समावेशी समाज की संभावनाओं का, बौद्धिक साहस की संभावनाओं का सपना। विभिन्न रुझानों के लोग अपने सारे मतभेदों के बावजूद जिस एक चीज को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध थे, उसी चीज को जेएनयू कल्चर कहते थे। इस कल्चर में प्रेम का नहीं, हिंसा का व्यवहार लज्जाजनक माना जाता था। लड़के-लड़कियों के साथ-साथ  घूमने, गपियाने और इश्कियाने से नहीं, हमारी संस्कृति किसी को गरियाने या  जाति-धर्म के आधार पर आँकने या हाथापाई पर उतारू होने से खतरे में पड़ती थी।

वे दिन गये। गये दिन लौटा नहीं करते। सवाल यह है कि जो दिन आए वे बेहतर थे या बदतर? सवाल यह भी है कि जेएनयू की विशिष्टता को समझने की बजाय, अन्य विश्वविद्यालयों को उस विशिष्टता  तक लाने  की बजाय ऐसा क्योंकर हुआ कि उस विशिष्टता को समाप्त करने में स्वयं जेएनयू के ही कुछ लोग सक्रिय हो गये। जिस जेएनयू में विभागों को स्वायत्तता बतौर अधिकार के मिली हुई थी, वहीं जाने-माने विद्वानों को कुलपतियों की सनकों के कारण इस्तीफे क्यों देने पड़े? जो एडमीशन पॉलिसी सारे देश के लिये मिसाल बन सकती थी, उसे छोड़ समकालीन ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ के कोरस में जेएनयू वाले भी क्यों शामिल हो गये? जिस छात्र आंदोलन से सारा देश सीख सकता था, वह कुछ छात्रों और कुछ प्रशासकों के अहंकारों के टकराव में घास की तरह पिस क्यों गया? 1983 में  जरा सी बात से शुरु हुआ यह टकराव जेएनयू को सदा के लिये बदलने वाला तूफान बन गया था। एक दिन मैंने नामवरजी से कहा था, ‘श्रीवास्तव साहब इतना अड़ियल रवैया क्यों अपनाए हुए हैं? स्टूडेंट्स की इतनी सी बात मान क्यों नहीं जाते?’

नामवरजी की आवाज में तीखापन कम अवसरों पर सुना है। हर स्थिति में सम स्वर में बात करने की कला वे बखूबी जानते हैं, लेकिन उस दिन था तीखापन आवाज में। बोले, ‘ स्टूडेंट्स  की क्या नाक कटी जाती है? बदतमीजी के लिये माफी क्यों नहीं माँग सकते?’

मुझे अच्छा नहीं लगा, लेकिन बात नामवरजी की ही सही थी। आवाज का तीखापन जेएनयू संस्कृति के भविष्य की चिंता से ही जन्मा था। वे उसके निर्माताओं में से हैं। समझ रहे थे कि खतरा  कितना गहरा और कितना दूरगामी है।  उस आंदोलन की परिणति कुलपति के घर पर कई दिनों तक चलने वाले घेराव और फिर धर-पकड़ और अंततः जेएनयू में दूरगामी बदलावों में हुई। सच तो यह है कि 1983 के बाद जेएनयू के इतिहास का जो अध्याय शुरु हुआ, उसमें जेएनयू के धीरे-धीरे  बदलते जाने की, खुद पर नाज करने वाले ‘द्वीप’ स्वभाव को छोड़ कर  धारा के  साथ तैरने को व्याकुल होते  जाने की  ट्रैजी-कामेडी ही लिखी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में  जेएनयू ‘मुख्य धारा’ का अंश बनता ही चला गया है। रैगिंग और ईव-टीजिंग की ‘मुख्य धारा सुलभ’ घटनाएं जेएनयू में भी घटने लगी हैं। छात्रों, अध्यापकों और कर्मचारियों के चुनाव जाति जैसे ‘ठोस’ आधारों पर होने लगे हैं। लाइब्रेरी के एक रीडिंग रूम का अनौपचारिक नाम ही ‘धौलपुर हाउस’ पड़ गया है।

आशा है कि अब धारा तीन सौ सत्ततर जैसे और मेरे उन ग्रामस्मृतिलीन मित्र जैसे लोग  जेएनयू से ज्यादा अपनापा महसूस करते होंगे। खैर।

 

3. मुखामुखम.

 

सात अक्तूबर 1992 का दिन मेरे जीवन के सबसे यादगार दिनों में से एक है। मैंने दो-चार दिन पहले अपना लेख ‘भक्ति संवेदना: काव्य और शास्त्र का मुखामुखम’ नामवरजी को पढ़ने के लिए दिया था। इसी में मैंने भक्ति के काव्योक्त और शास्त्रोक्त रूपों को, उनके परस्पर मुखामुखम को  समझने का प्रस्ताव किया है।  आज शाम उस पर बात करने जाना था, उनकी राय जाननी थी। पहुँचा तो हस्बमामूल गुरुदेव ने स्वयं ही दरवाजा खोला। मैं कुछ कहूं, इसके पहले ही, किवाड़  फेरते हुए बोले, “पुरुषोत्तमजी लेख तो आपने ऐसा लिखा है कि आपके चरण छूने की इच्छा होती है”! मुझे काटो तो खून नहीं। अपने गुरुदेव की मारक  व्यंग्य-क्षमता से अवगत था, खुद शिकार भी हो चुका था( इस घटना के बाद भी हुआ), बरबस मुँह से निकला, “डॉक सा’ब इतना ही खराब है, तो सीधे कह दीजिए। इतना तीखा सरकाज्म मत कीजिए, प्लीज”।

“मैं सरकाज्म नहीं कर रहा, ठीक कह रहा हूँ। अद्भुत लेख है। नारद के भक्ति-सूत्रों की ऐसी रीडिंग आज तक किसी ने नहीं की है। भक्ति-बोध का उन्नीसवीं सदी के नवजागरण से संबंध भी आपने बहुत सटीक ढंग से रेखांकित किया है, और पंडितजी की सीमाएं भी बिल्कुल ठीक दिखाई हैं। सबसे बड़ी बात यह कि इस लेख से भक्ति को स्वायत्त वैचारिक उपक्रम के रूप में पढ़ने की राह खुलती है”।

इस आश्वस्ति के साथ मेरे होश वापस लौटे और फिर काफी देर तक उस लेख के बहाने भक्ति-संवेदना और नवजागरण से जुड़ी समस्याओं पर बात होती रही।

सत्रह साल हो चले उस शाम को, उसका रोमांच तो जस का तस है ही, बीच-बीच में, इस व्यक्तिगत रोमांच से आगे जाकर भी नामवरजी द्वारा दी गयी उस अभूतपूर्व शाबाशी का अर्थ समझने की कोशिश करता रहता हूं।

मैं था क्या उस वक्त? नामवरजी का ऐसा विद्यार्थी, जो बकौल डॉ0 वीर भारत तलवार के, उनकी सबसे ज्यादा डाँट खाता था। उनके विभाग का जूनियर मोस्ट फैकल्टी मेंबर और एक ऐसा लेखक जो था तो कवि, लेकिन ‘उदीयमान’ हो रहा था बतौर आलोचक के। एक ऐसा हिन्दुस्तानी जिसकी  रुचि हिन्दी साहित्य के इतिहास में जगह बनाने से ज्यादा हिन्दू और अन्य प्रकारों की सांप्रदायिकता से संघर्ष करने में थी। जिसे हितचिन्तक सलाह भी दिया करते थे कि इन ‘फालतू’ के कामों में ज्यादा वक्त देने से ज्यादा अच्छा है कि साहित्यजगत में उठा-बैठा जाए।

इस मामले में भी नामवरजी दूसरे साहित्यकारों से  अलग  ही थे। मैं दिलीप सीमियन, भगवान जोश, सुमन,  जमाल किदवई, अरुणकुमार, रविकांत, वृंदा, अमर जैसे अनेक मित्रों के साथ ‘सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलन’ ( एसवीए)  नाम के संगठन में  काम करता था। यह संगठन भी अपने ढंग का एक ही था। खैर। तो, 1989 में हम लोग बहादुर शाह जफर मार्ग पर एक्सप्रेस बिल्डिंग के पास के मैदान में सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में कुछ दिनों के सांकेतिक उपवास पर बैठे थे। प्रेसनोट तो हमने जारी किया था, लेकिन किसी भी ‘महत्वपूर्ण’ व्यक्ति को अलग से आमंत्रित नहीं किया था कि आकर हमारे धरने-उपवास की शोभा बढ़ाए या हमारा उत्साहवर्धन करे। एसवीए के काम करने के अंदाज में स्वाभाविक रूप से वही बांकापन था, जो उसके अधिकांश कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत स्वभाव का अनिवार्य अंश था।

लेकिन सांप्रदायिकता के खतरे से आशंकित और चिंतित केवल हम एसवीए वाले थोडे़ ही थे। हमें अपनी हर गतिविधि में बहुत से लोगों का समर्थन और सहयोग मिलता था। इस उपवास में भी रोज बहुत से लोग आते थे। शाम को तो मेला सा लग जाता था। प्रेस के मित्र भी बहुत सहयोग कर रहे थे, लेकिन यह बात अपनी जगह कि हम ‘निमंत्रित’ किसी को नहीं करते थे। बिना निमंत्रण के ही एक दिन स्व0 वी.पी. सिंह भी आए थे, और मैंने, दिलीप ने अपनी आदत के मुताबिक उनकी भी क्लास ले डाली थी। प्रो0 रणधीरसिंह, प्रो0 विपिनचंद्र, प्रो0 धीरूभाई शेठ, कृष्णकुमार, दिलीप पाडगांवकर, जावेद अख्तर,  अरविन्द नारायण दास- बुद्धिजीवियों में से  ये कुछ नाम हैं जिनका उस उपवास  में और एसवीए की अन्य गतिविधियों में भी रुचि लेना याद है। उस उपवास के दौरान  रणधीरसिंहजी ने जिस वात्सल्य से हम में से हरेक के सर पर हाथ फेर कर आशीर्वाद दिया था, वह मेरी अमिट यादों में से एक है।

नामवरजी एक दिन दोपहर में आए। सच यही है कि मैं ही नहीं, बाकी सब लोग भी उन्हें वहां देख कर चकित रह गये थे। आखिरकार यह तो हिन्दी जगत के बाहर भी विख्यात है ही कि नामवरजी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में जाते हैं तो अध्यक्षता करने! और यहां वे मौजूद थे बिना किसी खास न्यौते तक के। अपना समर्थन जताने और “पुरुषोत्तमजी, दिलीप…साथ ही अन्य उपवासियों का हाल-चाल जानने के लिए”। मैंने आत्मविडंबना ओढ़ते हुए कहा था, ‘डॉक सा’ब माफ करेंगे, साहित्यिक काम कुछ खास नहीं हो पा रहा है, आजकल”। बोले, “ फासिज्म से लड़ने से बड़ा साहित्यिक काम इस घड़ी और क्या है, पुरुषोत्तमजी”। मैंने कहा, “आप ही लोगों की प्रेरणा है”।

जवाब  में जो उन्होंने कहा, वह रोमांचक था, साथ ही  दायित्व-बोध की स्मृति बनाए रखने वाला भी। तब भी था। अब  भी है। मेरी बात के जवाब में बस अकबर इलाहाबादी का मिसरा दोहरा दिया, “ अरे नहीं ! हमारी तो बातें ही बातें हैं, सैय्यद काम करता है”। मेरे मुँह से तो बोल ही नहीं फूटा। कारण था। लोगों को तब भी  लगता था कि मैं नामवरजी के बहुत निकट हूँ, वास्तविकता यह है कि मैं उनसे डरता था, अब भी डरता हूं- न जाने कब अपने प्रसिद्ध व्यंग्य-बाणों में से एक इधर रवाना कर दें। या सीधे-सीधे ही हड़का दें। मुलाकातें भी बहुत कम होती थीं। और जो होती थीं, शुद्ध औपचारिक, एकेडमिक। अकबर इलाहाबादी के मिसरे के जरिए दी गयी यह शाबाशी जितनी औचक थी, अपनी चुप्पी उतनी ही स्वाभाविक। नहीं?

इसके बाद बातचीत की कमान हमारे ‘प्रिंसिपल साहब’  दिलीप ने सँभाली, फंड का डिब्बा भी नामवरजी के सामने रखने से ‘प्रिंसिपल साहब’ नहीं चूके। नामवरजी ने कुछ योगदान किया। बहुत देर बैठे रहे-युवजनों से बतियाते रहे।

ये दो शाबाशियां मेरे लिए यादगार हैं। स्वाभाविक है। अपने लेखन और समाजकर्म  दोनों की नामवरजी द्वारा ऐसी सराहना किसके लिये यादगार नहीं हो जाएगी? लेकिन ये शाबाशियां महत्वपूर्ण इसलिए  हैं कि ये स्वयं नामवरजी के व्यक्तित्व के बारे में भी कुछ जताती हैं। कुछ लोगों का कहना है  कि नामवरजी शक्ति-संपन्न लोगों को आसमान पर चढ़ा देते हैं। बात कभी-कभी सही भी लगती है। लेकिन  फिर से कहूं, ये मार्मिक  शाबाशियां पाने वाला व्यक्ति न कोई बड़ा अफसर था, न कोई सत्ताधारी। 1989 में, वह एक नाकुछ से कॉलेज में हिन्दी पढ़ाता था, और 1992 में नामवरजी का जूनियर मोस्ट कलीग था, बस।

बतौर अध्यापक के उनके मूल्यांकनों की  प्रामाणिकता हम लोगों ने तो हमेशा निर्विवाद रूप से विश्वसनीय पाई। मुझे हमेशा अच्छा ग्रेड देते थे, लेकिन मेरे ही एक पर्चे पर टिप्पणी की थी, ‘घास सी छील कर रख दी है। परचा लिखने का सलीका सुमनजी से सीखिए’। मैंने यह बात गाँठ बाँध ली, और अन्य मित्रों को भी बँधवाई। समीर तो मूलतः कवि थे और हैं, बाकी जो कुछ भी वे हैं,  भूलतः ही हैं।  नामवरजी रूसी रूपवाद पढ़ा रहे थे। श्कोलोव्सकी के बारे में परचा लिखना था। समीर परचा लिखते समय भी कविया जाता था, इसलिए जमा करने के पहले परचा मुझे दिखा लिया  करता था। इस परचे का आरंभ कुछ इस प्रकार हो रहा था, ‘मैं मुंडेर पर पाँव लटकाए बैठा था, कहीं चिड़िया बोल रही थी’। मैंने टिप्पणी की, ‘ यह परचा नामवरजी को दिया, तो मुंडेर से ऐसे गिरोगे कि न चिड़िया बोल पाएगी, न चिड़ा’। परचा कविता की बजाय गद्य में लिखा गया और फिर नामवरजी को दिया गया।

नामवरजी के  व्यक्तित्व में ‘अनप्रिडक्टिबिलिटी’ भी गजब की है। ‘संस्कृतिः वर्चस्व और प्रतिरोध’ का लोकार्पण वी. पी. सिंह ने किया था। नामवरजी जो करते हैं, वही कर रहे थे-अध्यक्षता। अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने किताब और लेखक दोनों को धोकर रख दिया। उस किताब में मेरी केन्द्रीय चिन्ता यह थी कि नफरत की राजनीति के बरक्स प्रेम की राजनीति की संभावनाएँ टटोलने में वामपंथी बौद्धिक विफल क्यों रहे? अस्मिता की राजनीति के प्रति सहानुभूति के साथ विचार करते हुए ही कुछ चेतावनियां भी इस किताब में दी गयी थीं। नामवरजी ने इन बातों की काफी खिल्ली उड़ाई। यह बात और है कि आज तेरह साल बाद ‘संस्कृतिः वर्चस्व और प्रतिरोध’ में की गयी भविष्यवाणियां सही और दी गयी चेतावनियां सार्थक ही सिद्ध हुईं हैं। मैं नहीं मानता कि नामवरजी जैसे व्यक्ति को ‘संस्कृतिः वर्चस्व और प्रतिरोध’ के तर्क और सरोकार से सचमुच कोई असहमति हो सकती थी। लेकिन फिर भी किताब को खारिज कर दिया? क्यों? यह केवल कोई व्यक्तिगत समस्या थी, या इसका संबंध हिन्दी बौद्धिकता की व्यापकतर व्याधियों से है?

इस बात की विस्तृत चर्चा कहीं और, कभी और करूंगा। यहां तो इतना ही कहना है कि कई बार नामवरजी तात्कालिक सरोकारों के दबाव में बड़े सवालों की उपेक्षा कर जाते हैं। अब याद नहीं पड़ता, हो सकता है कि 1995 में गुरुदेव किसी कारण मुझसे खिन्न रहे हों, और इसी खिन्नता ने उन्हें मेरी खिंचाई के लिये प्रेरित किया हो। ऐसे चमत्कार नामवरजी अन्य लोगों के साथ भी कर चुके हैं। सच कहूं, मैं आज तक नामवरजी के व्यक्तित्व की इस विशेषता को समझ नहीं पाया हूं। इस तरह का व्यवहार उनसे करवाने वाली कौन सी ग्रंथियां हैं? नहीं जानता।

बहरहाल, मैं तो जेएनयू का और जेएनयू के नामवरजी का कृतज्ञ ही हूँ। नौकरी दिलवाने के लिये नहीं, ज्यादा बड़ी बातों के लिये। जैसाकि उनके साठ साल के होने पर लिखा था, ‘सिर्फ पढ़ाने के लिये नहीं, सिखाने के लिये’।

1982 में जब सुमन द्वारा धकिया कर रामजस कॉलेज में इंटरव्यू देने के लिये भेजा गया था, तब न मैंने नामवरजी से कुछ कहा, न उन्होंने किसी से कुछ कहा। अपना तो प्रण था कि दस इंटरव्यू  तो अपने बूते ही देंगे। न हुआ तो ग्यारहवें इंटरव्यू के लिये जाने के पहले गुरुदेव से बात करेंगे। भगवान की दया से जरूरत ही नहीं पड़ी। उस चयन समिति की अध्यक्षता गवर्निंग बॉडी के उपाध्यक्ष रामकँवर गुप्ता कर रहे थे, जिनसे मेरी भेंट न इंटरव्यू के पहले हुई थी, न बाद में कभी हुई। विभागाध्यक्ष प्रो0 निर्मला जैन थीं, और उनके साथ थे प्रो0 रामदरश मिश्र। मेरी नियुक्ति से कुछ लोग आहत हुए। डीयू के योग्य, योग्यतर, योग्यतम उम्मीदवारों पर इस जेएनयूआइट को वरीयता देकर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की ‘परंपरा’ तोड़ दी गयी थी। कुछ ऋषियों ने विभिन्न प्रकार की कल्पसृष्टियाँ भी निर्मित एवं प्रचारित कीं। निर्मलाजी ने अपने विख्यात स्वभाव के अनुसार ‘जनसत्ता’ के  संवाददाता से कह दिया, ‘जिस लड़के को मैंने रामजस में नियुक्त किया है, वह कई प्रोफेसरों को पढ़ा सकता है’। याने अपन पहले दिन से ही ‘चर्चित’ होते भए। खैर।

रामजस कॉलेज का वातावरण क्या पूरा ‘अद्भुत, अनुपम,मनोहर बाग’ था। लिख सका तो कभी उसके बारे में उपन्यास लिखूंगा। आशा है कि ‘राग दरबारी’ का ‘छंगामल इंटर कॉलेज’ उन दिनों के रामजस के आगे फीका पड़ जाएगा। कुछ वर्षों में हालत यह हो गयी कि मैंने नौकरी छोड़ देने का मन बना लिया। राजेन्द्र माथुर मेरे लेख नियमित रूप से  नवभारत टाइम्स में छापते थे, संपादकीय विभाग में खपा लेने को भी राजी हो गये।

लेकिन मैंने आईसीसीआर की विदेश में हिन्दी अध्यापन योजना में भी एप्लाई किया था। माथुर साहब से बात करने के बहुत पहले। हमारे बेटे ऋत्विक के जन्मोत्सव में आए नामवरजी को मैंने इस बारे में बताया। मुझे विदेश जाने के बारे में अपनी स्वीकृति देनी थी। नामवरजी ने कहा, ‘कोई जरूरत नहीं। तुम्हें जेएनयू आना है’।

रामजस अझेल हो चला था। आईसीसीआर को मना कर  चुका था। जेएनयू का कुछ पता नहीं लग रहा था।  इसीलिये माथुर साहब से बात की थी। उन्होंने हाँ तो की, साथ ही याद दिलाया, ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’। लेकिन रामजस की शहनाई से तो कैसे भी ढोल अच्छे ही होने  थे- दूर के या पास के। इसी बीच जेएनयू का इंटरव्यू कॉल आ गया। थोड़ी देर से ही सही, जेएनयू वापस आने का अवसर मिला। नामवरजी की बात सही साबित हुई।

 

4.स्वधर्म और सुमति।

 

आलोचना की बजाय रचनात्मक आलोचना लिखने के विरुद्ध ‘पॉलिमिक्स’ करते हुए नामवरजी ने गीता की उक्ति याद की हैः “स्वधर्मे निधनं श्रेय, परधर्मो भयावह”। आलोचना कुछ और बनने का प्रयत्न करे, यह हीनता-ग्रंथि है। उसे आलोचना ही होना चाहिये- इति आलोचक नामवरसिंह उवाच।

बहुत पहले विश्वविद्यालयों में साहित्य शिक्षण पर उन्होंने ‘आलोचना’ में एक परिसंवाद आयोजित किया था। अपनी टिप्पणी में, वहां भी ‘स्वधर्म’ की बात की थी। विश्वविद्यालय में एक ‘विषय’ बनने के चक्कर में साहित्य अपने बहुमुखी, संवादधर्मी स्वभाव से हाथ धो बैठता है। इस स्वभाव की वापस प्रतिष्ठा ही विश्वविद्यालयों में साहित्य पढ़ाने वालों की सबसे बड़ी चुनौती है। एक सीमित विषय नहीं, साहित्य समूचे जीवनानुभव के साथ मुखामुखम है, इसलिये औपचारिक रूप से साहित्य का अध्ययन-अध्यापन करने वालों को जीवन के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करने वाले विषयों से प्रामाणिक संवाद करना ही होगा।

जोधपुर से लेकर जेएनयू तक नामवरजी के पढ़ाने और पढ़ाई को नियोजित करने के मूल में साहित्य के स्वधर्म-बोध से उत्पन्न यह मूलभूत प्रतिज्ञा ही है।

उसी टिप्पणी में, विश्वविद्यालय ही नहीं, समूची पूंजीवादी व्यवस्था का वर्णन नामवरजी ने ‘पुराणों की भाषा’ में किया था-‘यह ऐसी व्यवस्था है, जिसमें पानी ने बहना और आग ने जलना त्याग दिया है, गरजकि हर वस्तु ने अपना धर्म छोड़ दिया है’।

स्वधर्म!

बतौर अध्यापक और आलोचक के, नामवरजी का सारा जीवन ‘स्वधर्म’ की पुनःप्रतिष्ठा के लिये संघर्ष का जीवन रहा है। सफलता हमेशा नहीं मिली है। कई बार स्वयं उन्होंने ही स्वधर्म से विचलन भी किये हैं। वे स्वयं कहते हैं, ‘बार बार हार मैं गया’। मुझे लगता है कि कई बार वे स्वयं से ही हारे हैं। उनकी अद्वितीय  संभावनाएं उनके वास्तविक जीवन के ‘व्यावहारिक’  दबावों से हारी हैं। यह विडंबना उनकी ही नहीं, हम में से किसी की भी  हो सकती है।

‘बार बार मैं हार गया’ – यह आत्मस्वीकृति है। ऐसी नहीं कि कोई बगलें बजाने लगे, बल्कि ऐसी जिससे ‘स्वधर्म’ की स्मृति भी रखना सीखे, और विचलन से बचना भी। अपनी संभावनाओं को ‘व्यावहारिक’ दबावों से न हारने देना सीखे। नामवरजी के बारे में सोचता हूँ, तो अपने लिये यही सीख हासिल होती है।  एक बार फिर से बाइस साल पहले लिखे अपने लेख का शीर्षक याद करूं- ‘वे पढ़ाते नहीं, सिखाते हैं’। सजग रूप से भी, अनजाने भी। अपनी उपलब्धियों से भी-असफलताओं से भी। अपनी संभावनाओं से भी, विवशताओं और दुर्बलताओं से भी।

ठीक वैसे ही, जैसे उनका जेएनयू सिर्फ पढ़ाता नहीं, सिखाता था, सिखाता है। असफलताओं से भी। सफलताओं से भी। ‘द्वीप’ रह कर भी सिखा रहा था- और इन दिनों  ‘मुख्य धारा’ के साथ  बह कर भी  सिखा रहा है।

 

सौभाग्य था मेरा कि इस द्वीप पर, उन दिनों  पहुंचा, जबकि वह द्वीप ही था।  वह सन सत्ततर की गर्मियों की एक दोपहर थी।  जेएनयू पहुंच कर मुकाम किया गंगा होस्टल । कमरा नं0 137।  आज के जेएनयू वाले कृपया न अविश्वास से मुस्कराएं न ईर्ष्या  में जलें। ‘काउंटर कल्चर’ के उन दिनों में भी जेएनयू इतना उदार तो नहीं था। गंगा लड़कों का होस्टल हुआ करता था। कमरा अली जावेद का था- जिसका उपयोग हम जैसों की सराय के रूप में ही ज्यादा  होता था। जावेद ने ही उसी दिन या शायद अगले दिन कमल कांप्लेक्स के गीता बुक सेंटर में किताबें पलटते नामवरजी को और फिर विपिन चंद्र को दिखाया था-‘ देखो वो रहे…’

सन सत्ततर की उस दोपहर के बाद के दिन मेरी जिन्दगी के सबसे रोमांचक दिन हैं।

 

मई 2001 में  यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, पर्थ जाने का सुयोग हुआ। सुमन वहाँ एम.बी.ए. की पढ़ाई कर रहीं थीं। मैं एक महीने के लिये, बच्चों को साथ लेकर गया था। कैंपस में घूमते हुए, एक दिन हम लोग पहुंच गये विन्थ्रॉप हॉल। बहुत खूबसूरत गॉथिक इमारत, वेनेशियन ग्लॉस की खिड़कियाँ- और उन पर ओल्ड टेस्टामेंट में वर्णित, परमात्मा द्वारा मनुष्य को कृपास्वरूप दी सुमतियों की छवियां- सूझ-बूझ, साहस, बुद्धि, संवेदनशीलता और ज्ञान। लेकिन  ओल्ड टेस्टामेंट ( इजाया 11.2)  में बताई गयी सुमतियों की  संख्या तो  सात थी। बाकी दो कहां गयीं? उनकी छवियां क्यों नहीं बनाईं  कलाकार ने? जाहिर है कि जानबूझ कर ही नहीं बनाईं। लेकिन क्यों?

विन्थ्रॉप हॉल का निर्माण नेपियर वाल्टर ने 1931 में किया था। कई बरसों तक तो किसी ने उनसे पूछा ही नहीं कि आपने दो सुमतियां क्यों छोड़ दीं। आखिरकार 1959 में तत्कालीन वाइस-चांसलर ने जवाब तलब कर ही लिया। वाल्टर ने लिखा, “ हाँ, दो सुमतियां मैंने जानबूझ कर ही छोड़ी हैं, क्योंकि मेरी समझ से किसी यूनिवर्सिटी की परिकल्पना से  उनका कोई लेना-देना  है ही नहीं- ‘ धार्मिक और यौनपरक पवित्रता ( पाइटी)’ और ‘भगवान का भय ( फीयर ऑफ गॉड)” ।

वास्तुकार का यह सीधा, सार्थक उत्तर, बौद्धिक साहस और संवेदनशीलता का यह घोषणापत्र  पढ़ कर सचमुच आँखें भीग गयीं थीं।

अपने जेएनयू ने ऐसी कोई औपचारिक  घोषणा तो कभी नहीं की। लेकिन अपने होने भर से यह बता जरूर दिया  कि यूनिवर्सिटी का स्वधर्म निर्भीकता और प्रश्नव्याकुलता है, संवेदनशीलता है, ज्ञान की साधना है, परमात्मा का डर दिखाकर खोखली पवित्रता का आरोपण करना नहीं।

उस जेएनयू का विद्यार्थी जो हो, जिन्होंने उस जेएनयू को बनाया, और जिन्हें उसने बनाया ऐसे नामवरजी का विद्यार्थी जो हो, उस मनुष्य को ‘स्वधर्म’ का निर्वाह तो करना ही होगा।

आशा है, कर सका। आशा है, कर सकूंगा।

यह भी आशा है कि नामवरजी द्वारा जीवन की सेंचुरी बनाने के अवसर पर चीयर-अप करने वालों की भीड़ में, मैं भी कहीं खड़ा होऊंगा।

आमीन!

 

रहनुमा जैसा मैं रचता…

रहनुमा जैसा मैं रचता…

उपन्यास लिख रहा हूँ, पता नहीं रहनुमा रचूँगा या नहीं, रचना चाहूँगा भी या नहीं। लेकिन इतना तय है कि ‘रहनुमा जैसा मैं रचता’  इस वाक्य में अधूरापन है, इसे पूरा करता है यह वाक्य कि रहनुमा जैसे मैं रचता।

यह जरूर है कि उपन्यास लिखे जाने में, यहाँ बात करने में अनुभव और उनकी स्मृतियाँ बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इन स्मृतियों ने ‘अकथ कहानी प्रेम की…’ के सवालों से जूझने बल्कि सवालों को पूछने में भी भूमिका निभाई है। यादें और वे तेजरफ्तार बदलाव जो रोज मेरी यादों में जगह बना रहे हैं, मुझे अब उपन्यास  लिखने को कह रहे हैं। अखिलेश ने, एक बार मुझसे बात करते हुए,  ‘अकथ’ को अपने आपको खोजती किताब कहा था। उपन्यास उस खोज का अगला चरण है, और दरपेश सवाल उपन्यास के बारे में, खुद अपने बारे में सोच-विचार का बहाना है। सवाल वही कि मैं रचता तो कैसा रचता रहनुमा, कैसे रचता रहनुमा।

तुलसीदासजी ने मानस की शुरुआत खलवंदना से की है, अपन खलवंदना करें न करें, काल-वर्णना तो करनी ही होगी। काल याने बीतता समय, बल्कि भर्तृहरि की मार्मिक चेतावनी याद करें तो वह समय जिसमें हम बीत रहे हैं—कालो न यातो वयमेव याता:।

यह ऐसा काल है जिसमें साझे सपनों का अकाल  है। ऐसा वक्त है जब पहचानें आगे आ गयी हैं सपने पीछे छूट गये हैं, जो सपने हैं भी वे एक दूसरे से टूट गये हैं। अलग अलग पहचानें अलग अलग सपने। औरत का सपना अलग, दलित का अलग, अश्वेत का सपना अलग, मजदूर का अलग। जितनी पहचानें उतने सपने। जितने सपने उतने संघर्ष और आपस में वास्ता कोई नहीं या बस कहने भर को। एक तरफ है खगोलीकरण की वास्तविकता और दूसरी तरफ मुक्ति की, बेहतर दुनिया की लालसा, लेकिन इन दोनों के बीच संबंध बना पाने की कल्पना कमजोर पड़ती जा रही है।

यथार्थ को भी उसकी पूरी जटिलता में हम कितना देख पा रहे हैं, पता नहीं, लेकिन यह तो बहुत गहरे में लगता है कि  सपने जो देखा करती थीं, वे आँखें ही शायद हमने खो दी हैं, और सुधी जन आँखों को इस तरह खो देने का उत्सव मना रहे हैं। रोमन सिटीजनों के निर्देश पर उनके लिखी स्क्रिप्ट पर ग्लेडियेटर एक दूसरे के प्राण ले लेने तक लड़ रहे हैं, यह भूल कर कि लड़ाई असल में उस स्क्रिप्ट के खिलाफ होनी चाहिए जिस पर उनसे एक्ट कराया जा रहा है। और थ्योरी बताने वाले थ्योरी बता रहे हैं कि उचित यही है कि हर कोई अपनी पहचान की लड़ाई आप लड़े, स्थानीय संघर्ष करे—क्योंकि महावृत्तांत- ग्रांड नैरेटिव- तो सारी मुसीबत की जड़ ठहरा। सो, ग्लेडियटरों के बहते खून को देख कर चिल्ला रहे  खूंख्वार रोमनों  की मदोन्मत्त शाबाशियों में सुधी जन स्वर मिला रहे हैं, उत्सव मना रहे हैं,  किलक किलक कर घोषणा कर रहे हैं कि देखो जी देखो वो हुआ महावृत्तांत का अंत।

अब जिसे लड़ना है, अपनी पहचान की लड़ाई आप लड़े, किसी को हक नहीं कि किसी और की ओर से बोलने की जुर्रत कर सके। बड़े संघर्ष वहम हैं, व्यक्ति और नागरिक जैसी बातें तो बस बातें हैं, बातों का क्या, इन बातों में पड़ने की बजाय महावृतांत के अंत की खरीददारी में ही  समझदारी है। और समझदार को चाहिए कि बृहद कल्पनाओं के चक्कर से निकल कर अपनी जगह पर रहे, और वहीं करे जो भी करना है। याने अन्याय का अंत हो न हो इतिहास का अंत तो हो ही गया,  व्यवस्था बदले न बदले,  बदलाव की बात का मतलब तो ही बदल ही गया। यह कोई छोटा बदलाव है जी?

इस अंतोत्सवकारी किलक को सुना जा रहा है, इस किलक में लोग अपने अनुभवों की गूँज सुन पा रहे हैं ऐसी स्थिति बनने में  इस सचाई का योगदान नहीं नकारा जा सकता कि ईसापूर्व रोमन इतिहास के ग्लेडियटर स्पार्टाकस को रहनुमा के रूप में रचने बीसवीं सदी के हावर्ड फास्ट को अहसास हुआ कि  जिस सपने पर भरोसा कर उन्होंने अपना स्पार्टाकस रचा था, वह सपना सपना नहीं दु:स्वप्न साबित हुआ। जिस  देवता पर भरोसा किया था, उसने छल किया- दि गॉड दैट फेल्ड…

इस छल से उत्पन्न पीड़ा ने ही  अंतपुराण को प्रामाणिकता दी है। लेकिन न भूलें कि इस  अंतपुराण ने जहाँ व्यवस्थित रूप से वाणी पाई, जहाँ ग्रांड नैरेटिव के अंत का उत्साह अपनी तार्किक परिणति याने इतिहास के अंत की घोषणा में बदला, उस बयान में सारी चमक के बावजूद यह कसक भी थी कि तरह तरह के अंतों के बाद, इतिहास के अंत के बाद, आदमी और कुत्ते में ज्यादा फर्क नहीं रह जाने वाला है। न भूलें फ्रांसिस फुकुयामा की मशहूर किताब का पूरा नाम– दि एंड ऑफ हिस्ट्री एंड दि लास्ट मैन- इतिहास  का अंत और अंतिम मनुष्य…और याद करें, मनुष्य के लिए ‘इतिहास के अंत’ की उपलब्धि के बारे में फुकुयामा का यह दो टूक कथन-

 

“वे (मनुष्य मात्र) आर्थिक गतिविधियों के जरिए अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर लेंगे,लेकिन किसी संग्राम में अपने प्राण दाँव पर नहीं लगाएंगे। दूसरे शब्दों में वे फिर से उसी तरह पशु बन जाएंगे, जैसे कि इतिहास के आरंभ में थे। कुत्ते को रोटी मिल जाए तो वह सारा दिन धूप में सोता रह  सकता है, उसे परवाह नहीं कि दूसरे कुत्ते उससे बेहतर हालत में हैं या कहीं दूर दुनिया में किसी कुत्ते का शोषण हो रहा है”। ( दि एंड ऑफ हिस्ट्री एंड दि लास्ट मैन, पेंग्विन, लंदन, 1992, पृ. 311).

 

मैं अपने उपन्यास में रहनुमा रचूँ या न रचूँ, मनुष्य के कुत्ताकरण का उत्सव नहीं मना  सकता। रहनुमा रचा तो ऐसा रचूंगा, ऐसे रचूंगा कि वह मनुष्य के कुत्ते में बदल जाने की नियति की पड़ताल कर सके, उससे टकरा सके। राह दिखा सके या न दिखा सके, इतना जता सके कि इतिहास कूड़े का  ढेर नहीं कि जिस पर पर चढ़ कर बाँग दे कोई भी  मुर्गा और बन जाए मसीहा। इतिहास बंद गली का आखिरी मकान भी नहीं कि जहाँ पहुँच कर हम गठरी पटक कर पसर जाएं कि लो पहुँच गये इतिहास के अंत तक।

मेरा रचा रहनुमा रहनुमा होगा, केवल प्रतिनिधि नहीं। अपने वक्त की एक गौरतलब बात यह भी है  कि नेता और प्रतिनिधि पर्यायवाची मान लिये गये हैं। मान लिया गया है कि हमारी  इच्छाओं को जो कह दे, उनके लिए जो कुछ कर दे वह हमारा नेता है। रिप्रेजेंट करने और लीड करने में फर्क भुला दिया गया है,  और रिप्रेजेंट भी वही करे जो मेरे जैसा हो मेरी बिरादरी, मेरी पहचान मेरी आइडेंटिटी का हो। मेरी सांस्कृतिक पहचान और उसमें भी वही जो मेरा मन हो, मेरी इकलौती पहचान है।  तो जब मेरा प्रतिनिधित्व ही मेरा नेतृत्व है तो होना तो यही है, होना तो यही था कि

 

चलता हूं थोड़ी दूर, हर इक तेज रौ के साथ

पहचानता नहीं हूं अभी, राहबर को मैं

शाइर को जो कसक है रहनुमा को न पहचानने की, उस कसक को शब्द देने में ही उस सवाल का जबाव मिलने की मुझे उम्मीद है जो दिये गये विषय-‘रहनुमा मैं जैसा रचता’-  में मैंने जोड़ा है- रहनुमा मैं जैसे रचता…कोशिश करेगा मेरा उपन्यास कि रौ, राह और राहबर, रहनुमा के आपसी रिश्तों की पड़ताल कर सके…राहरौ और राहबर में फर्क कर सके। मैं ध्यान रखूंगा कि रहनुमा बनाने के चक्कर में उस पात्र को अपनी मनचीती सोच का निर्जीव प्रतीक न बना दूँ, मनुष्य का झंडाकरण न कर दूँ। रहनुमा हो या मसीहा, मनुष्य अंतत: मनुष्य है—उसे रहनुमा बनाने के चक्कर में उसकी मनुष्यता की छुट्टी कर देना काफी अमानुषिक हरकत है, जिससे बचना चाहिए उपन्यास में भी, उपन्यास के बाहर भी। अपने रचना-संसार में प्रजापति मैं भले ही होऊं, ‘यथारोचते’ की महिमा मुझे भले ही हासिल हो, लेकिन उस महिमा की भी मर्यादा है। रहनुमा रचूंगा या नहीं पता नहीं लेकिन कोशिश रहेगी कि किसी भी पात्र को रचते समय महिमा और मर्यादा का संतुलन बना रहे।

इतिहास और महावृत्तांत के अंत के उत्सव मनाने का नहीं, यह समय, यूरोकेंद्रित आधुनिकता की अहम्मन्यता को चुनौती देती, परस्पर संवादरत आधुनिकताओं और उनसे संभव हो सकने वाले नये यूनिवर्सलिज्म की खोज का;  नये महावृत्तांत की खोज और बखान का समय है। मेरा रचा रहनुमा इस चेतना से ही उत्पन्न होगा।  अपने देश के संदर्भ में  वह राज नॉस्टेल्जिया के इलीट रूपों से भी टकराएगा और पॉलिटिकली करेक्ट रूपों से भी क्योंकि वह जानेगा कि आधुनिकता कोई वायरस नहीं जो यूरोप में पैदा हो कर फैलता चला गया। वह जानेगा कि चीनियों को लाइलाज अफीमची, अफ्रिकियों, आज्तेकों और इंकाओं  को जन्मजात असभ्य बल्कि अमानुष और भारतीयों को सतत रूप से जड़, विधवादाहक लोगों के रूप में इतिहास देवता ने नहीं उपनिवेशवाद के राक्षस ने गढ़ा  है।  वह जानेगा कि  उपनिवेशवाद की सबसे बड़ी सफलता यही है कि भारत जैसे देश में  राज नॉस्टेल्जिया केवल ‘प्रतिक्रियावादियों’ का ही अग्निभक्षी क्रांतिकारियों का भी प्रिय शगल है। वह जानेगा कि  गलत रिसर्च करना कैसे सिखाया जाता है और सही रिसर्च करना कैसे सीखना पड़ता है।

और सबसे बड़ी बात यह कि मेरे सोचे किसी पात्र को रहनुमा बनाएगी वह हिम्मत कि वह  गाँधी की तरह घोर अलोकप्रिय फैसले ले सके;  कह सके कि एक चौरी-चौर कांड काफी है  देशव्यापी आंदोलन को वापस ले लेने के लिए। जो अपने नैतिक संकट और विफलता-बोध को छुपाने की बजाय उससे टकरा सके, अपने साथियों को न्यौता दे सके कि वे भी टकराएं उस नैतिक संकट से, और जो आएं उन्हें साथ लेकर निकल सके उन सवालों के जबाव खोजने – ‘जो अब तक पूछे ही नहीं गये’।

लोकवृत्त के बारे में…

अंग्रेजी में पब्लिक स्फीयर; हिन्दी में लोक-वृत्त।

अपनी प्रिय मित्र फ्रांचेस्का ओरसिनी की पुस्तक ‘दि हिन्दी पब्लिक स्फीयर 1920-1940’  का हिन्दी अनुवाद देख कर बहुत खुशी हुई। नीलाभ द्वारा किया गया  यह अनुवाद ‘हिन्दी लोकवृत्त 1920-1940’ शीर्षक से वाणी प्रकाशन ने 2011 में छापा है।

जहाँ तक मेरी जानकारी है, ‘पब्लिक स्फीयर’ के लिए ‘लोकवृत्त’ शब्द का प्रयोग पहले-पहल मैने ही किया था।  फ्रांचेस्का की किताब अंग्रेजी में 2002 में छपी थी, उसके रिव्यू के बहाने, मैंने ‘आलोचना’ ( अक्टूबर-दिसंबर, 2003) में एक लेख लिखा था- ‘लोकवृत्त हिन्दी भाषा का या हिन्दी प्रदेश का?’

देख कर कुछ अजीब सा लगा कि  हिन्दी अनुवाद के लिए लिखी गयी भूमिका में फ्रांचेस्का ने लिखा है, “ पब्लिक स्फीयर के लिए एक सटीक हिन्दी शब्द ढूँढना मुश्किल रहा”। यह मुश्किल अनुवाद में जाहिर भी हो जाती है, किताब के नाम में पब्लिक स्फीयर के लिए ‘लोकवृत्त’ शब्द  है तो किताब की शुरुआत में ‘जनपद’। चौथे अध्याय में पब्लिक स्फीयर ‘हिन्दी की दुनिया’ बन गया है तो पाँचवें में ‘पॉलिटिकल  स्फीयर’ का अनुवाद ‘राजनैतिक क्षेत्र’ किया गया है।

2003 में लिखे गये अपने रिव्यू-आर्टिकल के शुरु में ही मैंने पब्लिक स्फीयर के लिए सटीक हिन्दी शब्द खोजने की मुश्किल पर कुछ विचार किया था। सूचना दी थी कि 1996 में लिखित लेख- ‘हिन्दी प्रदेश का वैचारिक संकट…’ में मैंने पब्लिक स्फीयर के लिए ‘लोकमानस’ शब्द का प्रयोग किया था, “ जो निश्चय ही अपर्याप्त था”।

आगे तो बेहतर यही है कि मैं ‘लोकवृत्त: हिन्दी भाषा का या हिन्दी प्रदेश का’ लेख के वे हिस्से यहाँ पेश कर दूँ जो बात को साफ करने में सहायक हो सकते हैं— जिन की दिलचस्पी हो, वे मित्र, जिज्ञासु पाठक पूरा लेख ‘आलोचना-  सहस्राब्दी अंक पंद्रह’, अक्टूबर-दिसंबर, 2003 ( पृ.113-125) में पढ़ ही सकते हैं-

“ …इन दिनों हिन्दी में पब्लिक स्फीयर-सार्वजनिक संसार- की कुछ चर्चा अकादमिक हलकों में हो रही है। हिन्दी के संदर्भ में ‘पब्लिक  स्फीयर’ की बात व्यवस्थित रूप से शुरु करने का श्रेय फ्रांचेस्का ओरसिनी को जाता है।…उनकी पुस्तक प्रकाशित होने के बाद कई जगहों पर, हिन्दी के संदर्भ में ‘पब्लिक स्फ़ीयर’ और पब्लिक डोमेयन की चर्चा सुनाई पड़ने लगी है।

 

“आमतौर से पब्लिक स्फ़ियर के लिए हिन्दी में सार्वजनिक क्षेत्र या  जनपद शब्द का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि यह लेख ‘लोकवृत्त’ शब्द का प्रयोग कर रहा है। क्यों? एक तो यही कि सार्वजनिक क्षेत्र हिन्दी में पब्लिक सेक्टर के लिए रूढ़ हो चुका है, और जनपद डिस्ट्रिक्ट के लिए। ग़ैर-जरूरी बिगूचन ( कन्फ्यूजन) से बचने के लिए बेहतर होगा कि हम पब्लिक स्फ़ियर के लिए किसी अन्य पद का प्रस्ताव करें। तो, फिर ‘लोकवृत्त’ ही क्यों?” ( पृ. 113)

इसके बाद यूरोप में पब्लिक और प्राइवेट की धारणाओं के उदय और हैबरमास की पब्लिक स्फियर संबंधी विवेचना की संक्षिप्त चर्चा करने के बाद मैंने लिखा था-

“पब्लिक स्फ़ियर में स्वयं पब्लिक का जो ‘संरचनात्मक रूपांतरण’ निहित है, ‘लोकवृत्त’ उस तक पहुँचने में हमारी सहायता करता है। अंग्रेजी के पब्लिक की ही तरह ‘लोक’ का पारंपरिक संबंध पदानुक्रमपरक मर्यादा से रहा है। इसी मर्यादापरक ( और ‘नॉर्मेटिव’ अर्थ) में आचार्य शुक्ल ने ‘लोकधर्म’ और ‘लोकमंगल’ शब्दों का प्रयोग किया था। इस मर्यादा से तर्कपूर्ण ज़िरह और उसके कारण उत्पन्न परिवर्तनों का संकेत  करना जरूरी है। यह ज़िरह आचार्य शुक्ल के पहले ही शुरु हो गयी थी और उनके बाद भी चलती रही। यह ज़िरह जिस क्षेत्र में हो रही थी, और जिस ढंग से हो रही थी, उसमें ‘लोकधर्म’ शब्द का  आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा शुक्लजी से सर्वथा भिन्न, बल्कि विपरीत अर्थ में प्रयोग ध्यान देने योग्य है। जहाँ आचार्य शुक्ल के लिए ‘लोकधर्म’ ‘आर्यधर्मानुमोदित वर्णाश्रम धर्म’ है, वहीं आचार्य द्विवेदी ‘लोकप्रचलित’  विश्वासों को ही नहीं ‘अंधविश्वासों’ को भी ‘लोकधर्म’ की परिभाषा मे ले आते हैं। इतिहासकारों के बीच प्रचलित शब्दावली याद करें तो आचार्य शुक्ल का ‘लोकधर्म’ ‘ग्रेट ट्रैडीशन’ को व्यंजित करता है, और आचार्य द्विवेदी का ‘लोकधर्म’ ‘लिटिल ट्रैडीशन’ को। आचार्य शुक्ल ‘लोकधर्म’ शब्द का प्रयोग ‘नॉर्मेटिव’ ढंग से करते हैं, आचार्य द्विवेदी ‘डिस्क्रिप्टिव’ ढंग  से।

“ लोकधर्म शब्द के बारे में यह ‘संवाद’ संकेत करता है—‘लोक’ शब्द की व्याप्ति और सांस्कृतिक संदर्भवानता की ओर। ‘सार्वजनिक’ के बरक्स, ‘लोक’ सिर्फ राजनैतिक-प्रशासनिक नहीं, सांस्कृतिक आशय से संपन्न शब्द है। इसका संकेत मनुष्य की सभी इहलौकिक गतिविधियोंकी ओर जाता है—लोकमर्यादा की अवधारणा का रूपांतरण तार्किक और इहलौकिक गतिविधियों का ही परिणाम है। ‘पब्लिक स्फ़ियर’ स्वयं पब्किल की अवधारणा में आए रूपांतरण से जुड़ा है, यह हमने देखा। किसी भी समाज में ‘पब्लिक’ मर्यादा की एक पारंपरिक अवधारणा होती ही है- और पब्लिक स्फ़ियर का उदय उस अवधारणा के रूपांतरण का कारण भी है, परिणाम भी। हिन्दी भाषा की सांस्कृतिक चेतना में ऐसी मर्यादाएं ‘लोकमर्यादाएं’ हैं, उनका पालन ‘लोकधर्म’ है: इन मर्यादाओं से जिरह करना किसी के लिए लोकनीति हो सकता है तो किसी के लिए ‘लोक-विरोध’ या ‘लोक-विद्वेष’ । कहने का आशय यह कि परंपराप्राप्त, शासक संरक्षित, ‘सार्वजनिक शुभ’ के अर्थ में लें, या निजता संपन्न नागरिकों के पारस्परिक संवाद से अर्जित ‘सामान्य शुभ’ के अर्थ  में—इस प्रसंग में ‘पब्लिक’ का सही प्रतिशब्द ‘लोक’ है न कि ‘सार्वजनिक’ या ‘जनपद’।

“इसलिए ‘पब्लिक स्फ़ियर’ के लिए ‘लोकवृत्त’ शब्द का प्रयोग अधिक तर्कसंगत और सार्थक है”।

2003 में प्रकाशित लेख की इस याद-दिहानी से, उम्मीद है कि “पब्लिक स्फीयर के लिए एक सटीक हिन्दी शब्द” खोजने में जो मुश्किल  फ्रांचेस्का और उनकी किताब के  अनुवादक के सामने आई, वह दूर हो सकेगी।

 

अटलान्टा की तीर्थयात्रा….

अटलांटा की तीर्थयात्रा

चौबीस नवम्‍बर की सुबह । पिछले पांच दिनों से मौसम अनपेक्षित रूप से चमकीला रहा है । साल के इन दिनों में अटलांटा के लोग ऐसी चमकीली धूप की उम्‍मीद नहीं करते, ये तो रिमझिम के दिन हैं । अमेरिका के उत्‍तरी हिस्‍सों में तो बर्फ पड़नी शुरू भी हो गई-लेकिन यहां इस दक्षिणी राज्‍य जॉर्जिया के महानगर अटलांटा में धूप चमक रही है-पिछले पांच दिनों से । आज चौबीस नवम्‍बर को जैसे प्रकृति ने भूल-सुधार किया-तड़के से ही हलकी-हलकी बूंदें पड़ रही हैं । बीच-बीच में बौछारें भी । जो हो, किंग सेंटर तो जाना ही है ।

कई महीने पहले जब अमेरिकन अकेडमी ऑफ रिलीजन की सालाना बैठक में शामिल होने, पर्चा पढ़ने का निमन्‍त्रण मिला था-तभी से उत्‍सुकता के साथ-साथ मन में तीर्थयात्री की सी श्रद्धा भी व्‍यापती रही है । उत्‍सुकता समानधर्मा अध्‍येताओं के साथ मुलाकातों की और श्रद्धा मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) की जन्‍मस्‍थली-कर्मस्‍थली की यात्रा कर पाने के अवसर की । वह अवसर आज सामने है । कबीर की कविताओं का श्रेष्‍ठतम अंग्रेजी अनुवाद करनेवाली, कबीर की समर्पित अध्‍येता लिंडा हैस साथ हैं । हम लोग मार्टिन लूथर किंग सेंटर जा रहे हैं । सेंटर माने उन कई भवनों का संकुल-जिनसे किंग का संबंध था; उनका चर्च, उनका घर, दूसरे चर्च, संग्रहालय । उस इमारत की दीवार पर ही लिखे हैं किंग की प्रसिद्ध ‘आई हैव ए ड्रीम’ स्‍पीच के ये शब्‍द : “मैं सपना देखता हूँ कि एक दिन मेरे चार नन्‍हें-मुन्‍नों की परख उनके रंग के आधार पर नहीं, उनके चरित्र के आधार पर की जाएगी ।” यह विश्‍वविख्‍यात भाषण मार्टिन लूथर किंग ने 28 अगस्‍त, 1963 को वाशिंगटन में ढाई लाख लोगों की सभा में दिया था । संग्रहालय में इस भाषण का टेप चल रहा था-लिंडा को रोमांच हो आया-जो उनकी आंखों के पानी में झलक रहा था-“पता है, पुरुषोत्‍तम ! मैं थी वहां…उन लाखों लोगों में एक-किंग का सपना सुनती हुई, देखती हुई ।”

संग्रहालय के स्‍वागत कक्ष में एक अद्भुत पेंटिंग थी-स्‍वागती की टेबल के ऐन ऊपर । महात्‍मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग दोनों एक साथ । पेंटर ने जैसे इतिहास के तथ्‍य की उपेक्षा कर उसके नैतिक सत्‍य को सजीव कर दिया था । क्‍या हुआ जो ये दोनों अहिंसा साधक कभी एक-दूसरे से नहीं मिले-वे थे तो एक ही राह के राही । गांधीजी की ऐसी दूसरी तस्‍वीर मैंने नहीं देखी-इसमें वे किंग की ही तरह अश्‍वेत-नीग्रो (!) दिखते हैं, और कुछ ऐसा है रेखांकन में कि बरबस मेरे मुंह से निकला-“ही लुक्‍स लाइक ऐन एंग्री ब्‍लैक मैन ।” क्रुद्ध अश्‍वेत के रूप में गांधी !

मार्टिन लूथर किंग का जन्‍म 15 जनवरी, 1920 को अटलांटा में हुआ था । सीनियर किंग पादरी थे, और उनके यशस्‍वी पुत्र का पादरी बनना भी तय ही था । उन्‍होंने बाकायदा धर्मशास्‍त्र का अध्‍ययन किया और बोस्‍टन यूनिवर्सिटी से थ्‍योलॉजी के पी.एच-डी. होकर लौटे । 1954 में वे पादरी नियुक्‍त हुए । अगले ही साल, बीसवीं सदी के अमेरिकी इतिहास की वह यादगार घटना घटी । रोज़ा पार्क नामक अश्‍वेत महिला ने रंगभेद के विरूद्ध एक छोटा-सा विद्रोह कर दिया-इस छोटे-से विद्रोह ने अमेरिका के दक्षिणी राज्‍यों में चले आ रहे रंगभेद को अमेरिकी लोकतंत्र पर सबसे बड़े प्रश्‍नवाचक में बदल डाला । रोज़ा पार्क ने सिटी बस में, अश्‍वेतों के लिए आरक्षित पिछले हिस्‍से में बैठने से इनकार कर दिया था-इस इनकार ने नागरिकों के समानाधिकार आन्‍दोलन के बहुत प्रचंड आन्‍दोलन की जरूरत को पुरजोर ढंग से रेखांकित कर दिया ।

उन्‍नीसवीं सदी में, अब्राहम लिंकन ने दासता को एक व्‍यापारिक संस्‍था के रूप में तो समाप्‍त कर दिया था; दासों की खरीद-बिक्री पर तो रोक लगा दी थी; लेकिन नस्‍ल और रंग पर आधारित भेद-भाव और सामाजिक अन्‍याय जारी रहा । अमेरिका के दक्षिणी राज्‍यों में तो इस नस्‍ल भेद की शक्‍ल बहुत ही बदसूरत थी । छिट-पुट विरोध भी होता रहता था- लेकिन रंगभेद को सामाजिक स्‍वीकृति ही नहीं, कानूनी मान्‍यता भी प्राप्‍त थी । बस में, अश्‍वेतों के लिए अलग किए गए पिछले हिस्‍से में जाने से इनकार करके रोज़ा पार्क ने इस स्‍वीकृति और मान्‍यता को चुनौती दे डाली ।

रोज़ा पार्क के इस इनकार से जो आन्‍दोलन उत्‍पन्‍न हुआ, मार्टिन लूथर किंग जल्‍दी ही उसकी अगली कतार में आ गए । नस्‍लभेद विरोधी आन्‍दोलन के ही नहीं, समता और न्‍याय के विश्‍वव्‍यापी आन्‍दोलन के प्रवक्‍ताओं में भी उनकी गिनती पहली पाँत में होने लगी । उनके समर्थकों और विरोधियों को जो बात सबसे अजीब लगी- वह थी अहिंसा पर उनकी अडिग आस्‍था । जॉन एच. फ्रैंकलिन का कहना है, “अहिंसा में किंग का विश्‍वास शायद पहले से ही था, लेकिन 1957 में उनकी भारत यात्रा और जवाहरलाल नेहरू से उनकी मुलाकात ने इस आस्‍था को अडिग निश्‍चय का रूप दे दिया ।”

किंग की मृत्‍यु के लगभग पैंतीस साल बाद, आज यह कहना गलत न होगा कि अहिंसा सचमुच न केवल जनान्‍दोलन के लिए सहायक रणनीति, बल्‍कि वास्‍तविक परिवर्तन की शर्त भी है ।गांधीजी को लगभग शब्‍दश: प्रतिध्‍वनित करते हुए किंग ने अपने अन्‍तिम भाषण में जो सच्‍चाई बयान की, उस पर आज शायद उतनी बहस न हो जितनी कि पैंतीस साल पहले हुई थी । किंग ने कहा, “बरसों से हम मनुष्‍य युद्ध और शान्‍ति की बातें करते आए हैं, लेकिन अब सिर्फ बातों से नहीं चलेगा । अब दुनिया के सामने मसला अहिंसा या हिंसा के बीच चुनाव करने का नहीं, बल्‍कि अहिंसा या सर्वनाश (नॉन वायलेंस ऑर नॉन एग्‍जिस्‍टेंस) के बीच चुनाव करने का है ।” दो टूक शब्‍दों में बयान की गई यह सच्‍चाई केवल किंग सेंटर के कोने-कोने में ही नहीं, दुनिया-भर के कोने-कोने में उकेरी गई, गूंजती हुई प्रतीत होती है- अहिंसा या सर्वनाश !

अहिंसा के रास्‍ते की मुश्‍किलें और मोहभंग किंग के आन्‍दोलन को भी झेलने पड़े । अहिंसा और हृदय-परिवर्तन का रास्‍ता सदा सफलता की ओर नहीं जाता । भारत का विभाजन और उसके साथ हुई हिंसा इसका विकट प्रमाण है । नस्‍लभेद विरोधी आन्‍दोलन की अहिंसात्‍मक रणनीति के सामने भी समस्‍याएं आईं । 1966 में किंग की शिकागो यात्रा बहुत कामयाब नहीं रही- सिविल नाफरमानी की रणनीति बहुत से श्‍वेतों का हृदय परिवर्तन करने की बजाय, उनके हिंसक क्रोध को और भी बढ़ाने लगी । स्‍वयं अश्‍वेतों में अहिंसा को लेकर असन्‍तोष पहले से था, वह भी अभिव्‍यक्‍त होने लगा ।

हिंसा-अहिंसा की समस्‍या अन्‍तत: नैतिकता की समस्‍या है- और इसीलिए इसके सन्‍दर्भ में गम्‍भीर विमर्श और खुला संवाद जरूरी है । व्‍यवस्‍था में अन्‍तर्निहित, अव्‍यक्‍त हिंसा का सामना क्‍या सचमुच हृदय-परिवर्तन पर भरोसा करके किया जा सकता है ? मनुष्‍य के स्‍वभाव की दृष्‍टि से देखें तो क्‍या आक्रामकता भी उसका वैसा ही अंश नहीं, जैसा कि करुणा ? असली समस्‍या क्‍या शक्‍ति की नहीं ? क्‍या हिंसा शक्‍ति की ही एक अभिव्‍यक्‍ति नहीं ? और क्‍या शक्‍ति की साधना मनुष्‍य का स्‍वभाव नहीं ?

यह वाजिब प्रश्‍न है । इसी मूल प्रश्‍न से आरम्‍भ कर नीत्‍शे ने ईसाइयत को ‘सेंटीमेंटल’ कहकर रद्द कर दिया था । सवाल वाजिब है- लेकिन क्‍या नीत्‍शे का और उनसे प्रभावित बहुत से विचारकों का खोजा गया जवाब भी वाजिब है ? आक्रमकता- माना कि मनुष्‍य की प्रकृति का अंग है तो क्‍या उसे मानवीय संस्‍कृति का आधार भी होना चाहिए ? सच पूछें तो सही सवाल यही है । क्‍या हम मनुष्‍य सिर्फ प्रकृति का विकास भर हैं या संस्‍कृति का परिणाम भी ? और परिवर्तन की, या अपनी बात कहने की जो विधि हिंसा के रास्‍ते गुजरती है, क्‍या वह किंग की इस चेतावनी की उपेक्षा कर सकती है : ‘अहिंसा या सर्वनाश !’ परिवर्तन का जो स्‍वप्‍न हिंसा पर ही आधारित हो, वह क्‍या सचमुच दूरगामी परिवर्तन को सम्‍भव कर सकता है ? गांधी और किंग के सामने इस प्रश्‍न का उत्‍तर स्‍पष्‍ट था- सारे खतरों और सारी असफलताओं के बावजूद । उनके स्‍वप्‍न का आधार था- अहिंसा में अडिग विश्‍वास !

हमारा समय स्‍वप्‍नहीनता का समय है- फिर भी लोगों के अपने छोटे-छोटे सपने तो हैं ही । उन सपनों में क्‍या नैतिक है, क्‍या अनैतिक ? हिंसा और अहिंसा अथवा अहिंसा और सर्वनाश के चुनावों में किस चुनाव के साथ जाते हैं हमारे सपने ? यह सवाल हमारे लिए है और हममें से हरेक को इसका जवाब खुद ही तलाशना होगा- खुद ही तराशना होगा । जिन्‍होंने अपने जवाब तलाशे और जिए, उनसे संवाद करके हम सीख सकते हैं, लेकिन जूझना तो खुद ही होगा ।

गांधीजी की तरह किंग भी गहरे धार्मिक व्‍यक्‍ति थे । गांधीजी की तरह वे धर्मविश्‍वास का सिर्फ ‘मुहावरे की तरह उपयोग’ नहीं करते थे, उसे जीते थे । उनके लिए धर्म एक प्रदत्‍त सत्‍य था, लेकिन उस सत्‍य से संवाद करने का तेजस्‍वी ढंग उनके धर्मविश्‍वास को नया अर्थ दे देता है वे बिना कोई घोषणा किए, अन्‍यायपूर्ण व्‍यवस्‍था का समर्थन करती धर्मसत्‍ता से जा टकराते हैं । धर्म द्वारा किए जानेवाले दावों को, आध्‍यात्‍मिक तृप्‍ति के वादों को वे एक नई जमीन पर ले जाते हैं । धर्म अगर सचमुच प्रेम करना सिखाता है, वैर पालना नहीं, तो यह प्रेम केवल अपने या अपने जैसों के प्रति कैसे सीमित हो सकता है ? आत्‍म की कोई भी अभिव्‍यक्‍ति अन्‍य के प्रति वैर या विद्वेश पर कैसे आधारित हो सकती है ?

वहां किंग सेंटर में किंग की शिकागो यात्रा की फ़िल्‍म दिखाई जा रही है । एक श्‍वेत युवती किंग को गाली दे रही है- किंग उसकी ओर बढ़ते हैं- ‘तुम्‍हारे जैसी सुन्‍दरी युवती, तुम्‍हारे जैसी सुसंस्‍कृत युवती ऐसी भद्दी जुबान कैसे बोल सकती है ? तुम बात करो न मुझसे- गाली क्‍यों ? वह युवती जब शरमाती हुई किंग से हाथ मिला रही है । किंग के होंठों पर मुस्‍कान है- और यह फ़िल्‍म देखनेवालों की आंखों में … ।

किंग अन्‍तिम बार 3 अप्रैल, 1968 के दिन टेनेसी में बोले । दूसरे ही दिन उन्‍हें गोली मार दी गई । आत्‍मविश्‍वास और आस्‍था का अद्भुत दस्‍तावेज है किंग का यह अन्‍तिम भाषण-‘आई हैव बीन टू माउंटेन टॉप ।’ पर्वत शिखर से देखा है मैंने- परमात्‍मा ने दिखाया है मुझे- एक दिन हम पहुंचेंगे उस ‘प्रॉमिस्‍ड लैंड’ में जहां लोगों की परख उनके जन्‍म से नहीं, उनके कर्म से होगी- ‘भले ही मैं साथ न होऊं ।’ और दूसरे ही दिन … ।

किंग ने अपनी भारतयात्रा के दौरान कहा था, “दिल्‍ली आया हूँ यात्री की तरह, गुजरात जाऊंगा तीर्थयात्री की तरह ।” यह 1957 की बात है । तब मार्टिन लूथर किंग के लिए गांधी का जन्‍मप्रदेश तीर्थस्‍थल था- आज के गुजरात में हिंसा से पीड़ित लोगों को साबरमती आश्रम तक में शरण नहीं मिल पाती । संग्रहालय के गांधी-कक्ष से गुजरते हुए बार-बार किंग की कही यह बात याद आती रही । लिंडा हैस को याद दिलाया किंग का यह कथन और हम दोनों के ही शब्‍द जैसे कुछ देर के लिए चुक गए ।

संग्रहालय की श्रद्धांजलि पुस्‍तिका में पैट्रिस मैतियर नाम के किसी यात्री की श्रद्धांजलि है- जो हम से बस दो ही दिन पहले बाईस तारीख को वहां आया था । इस श्रद्धांजलि में न केवल इस अश्‍वेत तीर्थयात्री की निजी श्रद्धा है, बल्‍कि किंग के कारण जो फर्क आया, उसका लाजवाब मूल्‍यांकन भी । पैट्रिस ने लिखा है, ‘डॉ किंग, जो कुछ आज हूँ, आप ही के कारण । मेरी सबसे अच्‍छी दोस्‍त श्‍वेत है, और जो हालत आपके समय में थी, वैसे आज होती तो मैं उसे पास भी न फटकने देता । जो कुछ आपने किया, उसके लिए आभार । मुझे खुशी है कि आज मैं अलग-अलग नस्‍लों के लोगों से मिल सकता हॅूं । यह एक नया ही तजुर्बा है सीखने का । बस और क्‍या कहूँ, सिवा इसके कि आपसे प्‍यार है और आपकी बहुत याद आती है ।’

तीर्थ का शाब्‍दिक अर्थ है- जलस्‍थल । जल के साथ पवित्रीकरण का सम्‍बन्‍ध मनुष्‍य की कल्‍पना ने हजारों साल पहले जोड़ा था । सेमेटिक धार्मिक परम्‍परा में तो इस सम्‍बन्‍ध का अपना विशिष्‍ट ऐतिहासिक अर्थ था- जेरुसलम के प्राचीन मन्‍दिर में उपासक पवित्रता प्राप्‍त करते थे बलिपशु के रक्‍त से । जॉन द बैपटिस्‍ट अपने शिष्‍यों को बपतिस्‍मा- पवित्रीकरण- प्रदान करते थे- जल से । यह एक नई धर्मदृष्‍टि का, एक नई पवित्रता का प्रस्‍ताव था । नजारथ के अशान्‍तचित्‍त युवक जीसस को जॉन ने नदी के जल से ही बपतिस्‍मा दिया था । यह बात और है कि बाद में जीसस के चर्च ने ‘पवित्रता’ के लिए न जाने कितने मनुष्‍यों का रक्‍त बहाया ! बहरहाल, तीर्थयात्रा का अर्थ है जल के सम्‍पर्क से पवित्र होना ! रक्‍त की बजाय जल से बपतिस्‍पा लेना ।

डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर की तस्‍वीरों, मुद्राओं, भंगिमाओं और शब्‍दों के बीच से गुजरते, ‘आई हैव ए ड्रीम’ स्‍पीच की श्रोता लिंड हैस के पवित्र रोमांच को छूते, पैट्रिस मेतियर के मार्मिक शब्‍दों को पढ़ते, क्रुद्ध अश्‍वेत के रूप में उकेरे गए गांधी को देखते जो पानी अनजाने ही आंखों में भरने लगा था- वह पवित्र के पास होने की कृतज्ञता का जल था । बपतिस्‍मा का जल । तीर्थ का जल ।